ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ?

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ?
ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ?

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ?

रात्रि के अन्तिम प्रहर के तत्कालबाद का समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिये सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना
चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है। ब्रह्म मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अन्तिम प्रहर अर्थात प्रातः 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है।


“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी।” (ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

सिख मत में इस समय के लिये बेहद सुन्दर नाम है- ‘अमृत वेला’ ईश्वर भक्ति के लिये यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिये यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है।

पौराणिक महत्व – वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुँचे। जहाँ उन्होंने वेद मंत्रो का पाठ करते माता सीता को सुना, शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-

वर्णं कीर्ति मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति ।
ब्राह्म मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥

अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुन्दरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुन्दर हो जाता है।

ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति :- ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। प्रकृति हमें सन्देश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिये। वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।

प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीरः ॥ – ऋग्वेद-1/125/1

अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है इसीलिये बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।

यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा।
सुवाति सविता भगः॥ – सामवेद-35

अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिये। इसके बाद भगवान की उपासना करना चाहिये। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और सम्पत्ति की वृद्धि होती है।

उद्यन्त्सूर्य इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे। – अथर्ववेद- 7/16/2

अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।

व्यावहारिक महत्व :- व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शान्त और स्थिर रहता है।

जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या प्रातः 3 से 5 :- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगु‌ना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना। इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है।

प्रातः 5 से 7 इस समय जीवनी-शक्ति

विशेष रूप से आन्त में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिये। सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

प्रातः 7 से 9 इस समय जीवनी-शक्ति

विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।

प्रातः 11 से 1 इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है।

दोपहर 12 बजे के आस-पास मध्याह्न-

संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिये भोजन वर्जित है। इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है।

दोपहर 1 से 3 इस समय जीवनी-शक्ति

विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिये। इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है।

दोपहर 3 से 5 इस समय जीवनी-शक्ति

विशेष रूप से मूत्राशय में होती है। 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।

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