विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ

विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ

विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वहाँ सब कुछ कितना शान्त है, बल्कि इससे होती है कि सरकार विरोध की आवाज को कितना सुनती है? आजादी की लड़ायी से लेकर आज तक, अपनी बात खुलकर कहना हमारे लोकतंत्र की नींव रहा है। जैसे कि…

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गोवत्स द्वादशी

गोवत्स द्वादशी

गोवत्स द्वादशी : भारतीय संस्कृति में पर्व एवं उत्सव जीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को वंशानुक्रम से प्रवाहित करने के सशक्त माध्यम रहे हैं। इन पर्वो का महत्त्व धार्मिक अनुष्ठानों के साथ उन जीवन के आदर्शों में भी निहित है, जिन्हें वे समाज के समक्ष प्रतिष्ठित करते हैं। गोवत्स द्वादशी ऐसा ही पर्व…

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ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ?

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ?

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परम्परा क्यों ? रात्रि के अन्तिम प्रहर के तत्कालबाद का समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिये सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति…

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‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा मनमोहन वैद्य जी “वैष्णव जन तो तेणे रे कहिये, जे पीड़ पराई जाणे रे”। दूसरों की पीड़ा की अनुभूति कर उन्हें उस पीड़ा से मुक्त करने के सहज कर्म को ‘धर्म’ कहा गया है। राजा रंतिदेव का प्रसिद्ध वचन है – “मुझे न राज्य…

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सेवाज्ञ संस्थानम् : अँधेरे में जगमगाता एक दीपक

सेवाज्ञ संस्थानम् : अँधेरे में जगमगाता एक दीपक

सेवाज्ञ संस्थानम् : अँधेरे में जगमगाता एक दीपक लखनऊ। यदि मन में कुछ करने का संकल्प हो, लक्ष्य स्पष्ट और दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो बिना संसाधनों के भी सफलता मिल सकती है। इस तथ्य को सत्य सिद्ध किया है सेवाज्ञ संस्थानम् के संस्थापक आशीष कुमार ‘आशु’ ने। सेवाज्ञ संस्थानम् सेवा के क्षेत्र में कार्य…

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पितृपक्ष और उसका महत्व

पितृपक्ष और उसका महत्व

पितृपक्ष और उसका महत्व पितृपक्ष… क्या आपने कभी सोचा है कि वर्ष में एक ऐसा पक्ष क्यों आता है, जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके लिए तर्पण करते हैं और श्राद्ध करते हैं? क्या यह केवल हजारों वर्षों से चली आ रही कोई धार्मिक परम्परा है, या इसके पीछे भी कोई कारण…

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पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा

पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा

पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा मनुष्य जब अपने अस्तित्व की ओर दृष्टि डालता है, तब उसके सम्मुख एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है मैं कहाँ से आया हूँ? शंकराचार्य कहते हैं कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः… इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य को अपने माता-पिता तक ले जाता है। माता-पिता से पूर्व वह अपने पितामह और मातामह तक…

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वामनावतार : शक्ति का संस्कार

वामनावतार : शक्ति का संस्कार

वामनावतार : शक्ति का संस्कार भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक चेतनत्त्व पटल पर भगवान वामन का स्वरूप केवल दशावतार रूपी परम्परा में एक धार्मिक दृष्टि तक ग्रहण करना उनके व्यक्तित्व की व्यापकता एवं विराटता को सीमित कर देना प्रतीत होता है। वामन अनुकृति के अन्तर्गत भारतीय मनीषियों ने स्व मेधा से सत्ता, सामर्थ्य, विनम्रता, आत्मसंयम एवं लोककल्याण…

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भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारत माता मन्दिर की संकल्पना भारतीय सनातन परम्परा में संन्यास का उदेश्य बनविता याला की साधना का साथ-साथ लोक-कल्याण और राष्ट्र-धर्म का सम्वर्धन रहा है। आधुनिक युग में इस संन्यासी परम्परा को राष्ट्र-साधना के दिव्य अनुष्ठान में रूपान्तरित करने वाले मूर्धन्य मनीषियों में पद्मभूषण पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज का नाम अग्रगण्य है। स्वामी…

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सनातन द्रोह की विकृत राजनीति

सनातन द्रोह की विकृत राजनीति

सनातन द्रोह की विकृत राजनीति सभी राजनैतिक दलों ने उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियां तीव्र कर दी हैं और जनता के मध्य अपने चुनावी मुद्दों व अभियानों के सन्दर्भ में नैरेटिव बनाना भी प्रारम्भकर दिया है। स्वाभाविक रूप से वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा के हिंदुत्व बनाम सपा…

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