
संस्कृत साहित्य में जल-जीवन सौंदर्य :
प्रकृति के जीवनदायी उपादानों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने में कविमन आदिकाल से भावाकुल और संवेदनशील रहा है। इन उपादानों में भी कवियों को सर्वाधिक प्रभावित किया नदियों और जलस्रोतों ने, जिन्हें कवियों ने ईश्वर के धरती पर बहते हुए साक्षात् वरदान की तरह माना। नदियों को देखते, सोचते, महसूस करते, याद करते हुए कवियों ने इतनी विपुल मात्रा में साहित्य रचा कि रचनाओं का महासागर ही निर्मित कर दिया। नदियों के पुण्यप्रवाह से आह्लादित एक कवि तो इन्हें साक्षात् ईश्वर ही कह बैठा।
‘निराकारं भजन्त्येके नराकारं तथापरे।
वयं भवतापसंतप्ताः नीराकारमुपास्महे ।।
(संन्यास निर्णय द्वारा श्रीमद् बल्लभाचार्य जी)
अर्थात् कुछ लोग ईश्वर के ‘निराकार’ स्वरूप को भजते हैं। कुछ लोग उसके ‘नर-आकार राम, कृष्ण आदि को भजते हैं। किंतु संसार के तापों से संतप्त हम तो ईश्वर के ‘नीराकार- नीर स्वरूप की उपासना करते हैं।
जल को सर्वशुद्धिकर और प्रक्षालक कहा गया है। पुण्यतोया नदियाँ धरती के कर्दम-कलुष को बहाकर महासिंधु में धकेल आती हैं तो इनके कल-कल निनाद की अनुगूँजें कविचित्त में आह्लादकारी तरंगों का आह्वान कर स्वयं के जल से कवियों का स्तवन किया करती हैं। धरती पर बहती नदियों ने अपने दिव्य जल से कवियों का अभिषेक किया है तो कवियों ने अपने भीतर बहती सिंधु-सरस्वतियों के शब्द-जल से नदियों का अभिषेक किया।
इन नदियों में डूबते-तैरते न जाने कितनी ऋचाएँ, कितने स्तोत्र, कितने शास्त्र, कितने मूर्ति शिल्प, कितने छंद, कितनी तरंगें, कितने जयघोष हुए, सब गणनातीत है। हमारा संस्कृति-सागर इन सब से लबालब भरा हुआ है।
विश्व का पहला गीत, अनुष्टुप छंद के रूप में एक ऋषि की करुणार्द्र आत्मा से तमसा नदी के तट पर ही फूटा था और सर्जन के इस अप्रत्याशित क्षण ने जो भूमिका रची, उसी के सहारे आदिकवि वाल्मीकि ने पहला लौकिक महाकाव्य भी उसी पुण्यसलिला तमसा के किनारे बैठ कर लिख डाला। सरस्वती और सिंधु के तटों पर ही साधनारत ऋषियों के कंठों में वेदों का अलौकिक गान उतरा था।
वैदिक ऋषियों की वाणी सर्वाधिक फूटी सरस्वती नदी के मुग्धकारी सौंदर्य को देखकर। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में सरस्वती नदी को समुद्र की भाँति विशाल और बादलों-जैसी गर्जना करते हुए अथाह जलवाली, पर्वत से समुद्र तक बहने वाली नदी बताया है। इसकी स्तुति में ७५ मंत्रों की रचना की गयी। इन मंत्रों में सरस्वती को समृद्धि, विद्या और वाणी की देवी तथा सात बहनों वाली महानदी कहा गया है। यह नदियों थी- सरस्वती. सतलज, व्यास, रावी, चिनाब, झेलम और सिंधु। वेद मंत्रों में कहीं-कहीं सरस्वती को सिंधु नदी की माता भी कहा गया है। सारांश यह है कि मंत्रदृष्टा ऋषियों ने नदियों को जीवंत मातृदेवता के रूप में देखा और उनकी वह छवि लोकमानस में अद्यावधि
अक्षुण्ण है।
भारत के प्राचीन वाङ्मय में नदी प्रसंग इस तरह व्याप्त है कि सारे पुराण, महाकाव्य और शास्त्र इससे भरे पड़े हैं।
दैनंदिन जीवन में शुद्धि और प्रक्षालन के लिए जल का जो महत्त्व है वह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। जल की प्रक्षालन, शोधन और निर्मलीकरण की यह विशेषता जब आंतरिक जगत में प्रतिध्वनित होती है तो वह चित्तशुद्धि और आत्मपरिष्कार का सुंदर रूपक बनकर अनूठा सन्देश देती है।
वेदव्यास इसी भाव को लेकर नदी के माध्यम से एक मर्मस्पर्शी छंद की रचना करते हैं। सत्य, संयम, शील. करुणा आदि से मनुष्य कैसे निर्दोष और निष्पाप हो जाता है, यह अभिव्यक्त करते हुए वे कहते हैं-
“आत्मा नदी संयम पुण्यतीर्था,
सत्योदका शीलतटा दयोर्मिः।
वामन मन आमिषेक कुरु पाण्डुनन्दन ! न वारिणा शुद्धयति चान्तरात्मा ।।’
अर्थात् आत्मा एक ऐसी नदी है जिसका पवित्र तीर्थ संयम (आत्मानुशासन) है। सत्य उस नदी का जल, शील उसके किनारे तथा दया उसकी लहरें हैं। हे पांडुपुत्र युधिष्ठिर! अपनी इस आत्मा रूपी नदी में स्नान करो। बाहरी नदियों में स्नान करने से तन शुद्ध होता है, मन नहीं। मन की शुद्धि इस आत्मा रूपी नदी में स्नान करने से ही होती है।
कवियों की दृष्टि विराट महासिंधु से लेकर सूक्ष्म जलबिंदु के सौंदर्य तक से संवेदित होकर जीवन के गहरे अर्थों को उत्पन्न करती रही है। साहित्य में प्रसिद्ध अनन्वय अलंकार के निरूपण के लिए कवियों की दृष्टि आकाश अथवा महासागर पर ही जाकर टिकी। भामह अपने ग्रन्थ काव्यालंकार में इसका जो उदाहरण देते हैं, वह साहित्य शास्त्र में बहुत प्रसिद्ध है। राम और रावण के युद्ध की तुलना किसी अन्य युद्ध से करने में स्वयं को असमर्थ पाकर कवि लिखता है-
‘गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः। रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।।”
जल की बिन्दु-उपमा
जैसे आकाश की उपमा केवल आकाश ही है और समुद्र का उदाहरण केवल समुद्र ही है, वैसे ही राम और रावण का युद्ध भी अतुलनीय है। कवियों की दृष्टि केवल महासागर पर ही नहीं जाती, वह एक जलबिंदु पर भी अटक जाती है। भर्तृहरि ‘वैराग्यशतकम्’ में घास की नोक पर जमा होने वाले जलबिंदु को देखकर जीवन की क्षणभंगुरता का पाठ पढ़ा देते हैं-
“तृणाग्रलग्नजलबिन्दुनिपातभंगुरं, प्रायः सर्वमेव हि जगदिदम् ।।”
कहते हैं कि यह समूचा संसार घास की नोक पर लगी हुई जल की बूँद के गिरने जैसा नाशवान है।
जल और जनजीवन पर विचार करते हुए कितनी ही आहलादकारी कविताएँ रची गयीं। जल के संदर्भों पर विचार करते हुए हमारे चित्त में वर्षा ऋतु का स्मरण न आए, यह सम्भव नहीं। वर्षा में प्राणिमात्र का चित्त आनंदविभोर हो उठता है। मनुष्य और पशु-पक्षी ही नहीं, सम्पूर्ण प्रकृति खिल उठती है। नदियाँ उत्साह में भरकर नाचने लगती हैं, वन उपवन खिलखिला उठते हैं, पर्वत श्रेणियाँ मुस्कुराने लगती हैं, किन्तु यह संसार का एक पक्ष है। वर्षाकाल में जल के चित्र सर्वत्र आह्लादक ही नहीं होते। संसाधनविहीन और दरिद्र जन के लिए वर्षाऋतु संकटकाल भी बनकर आती है। एक सुभाषित संग्रह में वर्षा के कठिन दिनों में गृहणियों के जीवन संघर्ष का जैसा सजीव चित्रण हुआ है, वह दुर्लभ है। यह उन दिनों का चित्र है जब घरों में चूल्हे की आग सुरक्षित रखनी पड़ती थी। दियासलाई का चलन नहीं था। यदि किसी घर में आग ठंडी पड़ जाती, तो स्त्रियाँ पड़ोस के घरों से आग लाकर चूल्हा जलाती थीं। ऐसी ही एक गृहणी का चित्रण करता हुआ कवि कहता है-
“देवे वर्षत्यशनपवनव्याप्ता वह्निहेतोर्ग हाद् मेहं फलकनिचितैः सेतुभिः पङ्कभीताः ।
नीधप्रान्तानविरलजलान्पाणिभिस्ताडयित्वा शूर्पच्छत्रस्थगितशिरसो योषितः संचरन्ति ।।’
अर्थात् जब इन्द्रदेव वर्षा करते हैं, बिजली चमकती है, झंझवात चलता है, तब भी चूल्हे के लिए आग जलाने हेतु स्त्रियाँ एक घर से दूसरे घर जाती हैं, वे हवा और बौछार से लड़ती हुई, सिर पर सूप का छाता लगाए, छप्परों से टपकती जलधाराओं को अपने हाथ से निवारती हुईं, रास्तों के कीचड़ से बचने के लिए तख्तों के अस्थायी बने पुलों पर चलते हुए घर-घर आग की तलाश में भटकती हैं।
वर्षा का प्रभाव
साधारण जन के ऐसे मार्मिक चित्रण संस्कृत साहित्य के लोकोन्मुखी स्वरूप की अनूठी पूँजी है।
जलप्लावन और धारासार वर्षा जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देती है। सर्वाधिक संकट उन लोगों के लिए होता है जो बेघर होते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, खंड 165- ‘वर्षादिवसः शीर्षक के अंतर्गत संकलित श्लोक में एक कौए को अपनी मादा कौए के लिए चिंतित होता देखकर मन करुणा में भीग जाता है। कवि कहता है-
“एते ते दिवसा वियोगिगुरवः पूरोल्लसत्सिन्धवो ।
विन्ध्यश्यामपयोदनीलनभसो नीपार्जुनामोदिनः ।।
आसन्नप्रसवालयासां सहचरीमालोक्य नीडार्थिनीं।
चञ्चुप्रान्तकिलिञ्जसंचयपरः काकोऽपि येष्वाकुलः ।।
अर्थात् ‘ये वही बरसात के दिन हैं जो विरहियों के लिए बहुत भारी होते हैं। इनमें नदियों बाढ़ से उछलती हैं, आकाश विंध्य पर्वत जैसे काले बादलों से नीला हो जाता है और कदम्ब अर्जुन के फूल महकते हैं। इन्हीं दिनों में प्रसव का समय निकट होने के कारण थकी हुई अपनी मादा को घोंसला बनाते देखकर चोंच में तिनका लिए कौआ भी व्याकुल हो उठता है।”
जल और जीवन के विविध प्रसंगों का स्मरण करते हुए संस्कृत के सुकवियों के बीच इस भारतभूमि पर जन्म लेने वाले एक ऐसे कवि की चर्चा किए बिना मन नहीं मानता, जो भारत के आक्रांताओं के कुल में उत्पन्न हुआ, मुगलिया सल्तनत से संबद्ध रहा, किन्तु देवनदी गंगा के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करने में किसी हिंदू कवि से पीछे नहीं रहा। मेरा आशय कविवर रहीम खानखाना से है जिन्होंने संस्कृत भाषा में ‘गंगाष्टकम्’ रचकर माँ गंगा के अलौकिक और पावन स्वरूप की अत्यंत सुंदर स्तुति की है। इस स्तोत्र का प्रथम श्लोक ही हमें भावविभोर कर देता है, जहाँ वे भक्ति की पराकाष्ठा को प्रकट करते हुए कहते हैं-
‘अच्युतचरणतरङ्गिणि मदनान्तकमौलिमालतीमाले ।
त्वयि तनुवितरणसमये हरता देया न मे हरिता” ।।१।।
अर्थात्, भगवान विष्णु के चरणों से निकलकर प्रवाहित होने वाली तथा महादेव के मस्तक पर मालती की माला के समान सुशोभित होने वाली हे गंगा मैया! अंतकाल में जब मुझे मुक्ति प्रदान करो तो मुझे हरि का स्वरूप (हरिता) मत देना, मुझे शिव का स्वरूप (हरता) प्रदान करना, जिससे मैं आपको सदा मस्तक पर धारण करता रहूँ। एक मुस्लिम कवि का यह भाव आँखों को सजल और देह को रोमांचित कर देता है। रहीम जानते हैं कि गंगा हरि के चरणों का तो प्रक्षालन करती हैं किंतु हर के शीश पर विराजती हैं। कवि की प्रार्थना है कि वह गंगा को अपने माथे पर धारण करें, न कि चरणों की ओर।
गंगा स्तवन में सनातन धर्म के प्रति कवि की आस्था देखने लायक है।
हिंदू धर्म की मान्यता है कि मृत्यूपरांत जो देह गंगा में प्रवाहित होती है, वह वैकुण्ठ लोक में स्थान पाती है। इसी विश्वास को रहीमदास काव्यात्मक भंगिमा में कुछ इस तरह प्रकट करते हैं –
“नवप्रवाहसंचलविलोलवीचिदोलितं
श्वमीनकंककर्चितं शृगालकाकभक्षितम् ।’
नरं विलोक्य सादरं वैकुण्ठलोकगामिनं
वदन्ति देवि देवता भृशं त्वदीयविस्मयम् ।।”
अर्थात् हे देवि गंगे! तुम्हारे निरंतर प्रवाह की चंचल लहरों द्वारा डुलाए जाते, कुत्ते, मछली एवं बगुले आदि द्वारा कुतरे जाते तथा गीदड़-कौए द्वारा खाई जाती मनुष्य की देह को भी वैकुण्ठ की ओर जाते देख, देवता तुम्हारी महिमा पर बार-बार आश्चर्य व्यक्त करते हैं।
भारतीय परम्परा में गंगा ही नहीं, सारी नदियों, सारे जलस्रोतों को स्तुत्य माना है। उन अनाम जलराशियों को भी गंगा कहकर उनके गीत गाये हैं। स्नान करते समय सिर पर जल का लोटा डालते हुए मुख से ‘हर हर गंगे’ मंत्र की तरह फूटता है, भले ही वह जल धरती के किसी भी कोने का हो।
निस्संदेह, निराकार परमात्मा के इस निराकार स्वरूप की महिमा निराली है।