
कांग्रेस बन गयी मुस्लिम लीग
अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी कांग्रेस पार्टी मुस्लिम परस्ती की सारी सीमाएँ तोड़ती जा रही है। मुसलमानों के सामने कांग्रेस की आत्मसमर्पण नीति ने पहले देश को विभाजित किया और आज वही कांग्रेस हमारे राष्ट्रगीत के भी टुकड़े करना चाहती है। कांग्रेस का यह कहना कि वह वन्दे मातरम् को पूरा नहीं गायेगी, सिद्ध करता है कि वह मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये किसी भी स्तर तक गिर सकती है। कांग्रेस का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि वह अपने को देश के संविधान से भी ऊपर मानने लगी है। मुस्लिम प्रेम में अन्धी पार्टी अपने को संसद द्वारा बनाये गये कानूनों से भी परे मानने लगी है। सच कहा जाये तो कांग्रेस आज की नयी मुस्लिम लीग बन चुकी है। क्योंकि जो मुस्लिम लीग 1937 में वन्दे मातरम् को लेकर विरोध की थी वही जिद कांग्रेस 2026 में वन्दे मातरम् को लेकर दिखा रही है।
1937 के प्रस्ताव का हवाला देकर कांग्रेस ने वन्दे मातरम् के केवल दो छन्द गाने का निर्णय लिया है। देश को याद रखना चाहिये कि 1937 में तुष्टीकरण की राजनीति के तहत वन्दे मातरम् को दो हिस्सों में बाँटने के कांग्रेस के फैसले ने दो-राष्ट्र सिद्धान्त को बल दिया और अन्ततः देश का विभाजन हुआ। वन्दे मातरम् के 150वें वर्ष में भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक भूल को सुधारते हुए बंकिम बाबू की अमर कृति के पूर्ण गायन और सभी सरकारी समारोहों में इसे पूर्ण रूप से गाने को कानूनी स्वरूप दे दिया है। आज, जब स्वतंत्रता के बाद देश अमृतकाल में विकसित भारत की दिशा में स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ रहा है, तब भी कांग्रेस गुलामी की मानसिकता और तुष्टीकरण की राजनीति से ग्रसित है। वह आज भी राष्ट्रीय पहचान और अस्मिता के साथ समझौता कर रही है। अपने जन्म के समय से ही कांग्रेस समझौते, तुष्टीकरण और विभाजनकारी शक्तियों के सामने घुटने टेकने की राजनीति करती रही है। उसने हमेशा राष्ट्रीय नैतिकता, राष्ट्रीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना के साथ समझौता किया है। स्वतंत्रता के उपरान्त भी कांग्रेस के क्रियाकलाप इसका जीता जागता प्रमाण हैं। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने वन्दे मातरम् 1875 में लिखा। पहली बार 1882 में यह गीत उन्हीं के लिखे कालजयी उपन्यास आनन्द मठ में छपा। सब्यसाची भट्टाचार्य की महत्वपूर्ण पुस्तक “वन्देमातरमः द बायोग्राफी ऑफ ए सांग” में राष्ट्रगीत की सम्पूर्ण कहानी है। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वन्दे मातरम् पहली बार गाया गया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे गाया और संगीत भी उन्हीं का था। उस दिन गुरुदेव ने दो छन्द वाला नहीं, छः छन्द वाला पूरा गीत गाया था। इसके बाद वन्दे मातरम् भारत की स्वतंत्रता का गीत बन गया। वन्दे मातरम् गीत कभी न धर्म में बँटा था, न क्षेत्र में। 1897 में इस गीत को मराठी और कन्नड़ में अनुवाद करके बच्चों-बच्चों तक पहुँचाया गया। गुजरात के लोग गुजराती में इसे 1901 में गुनगुनाने लगे। 1906 में वन्दे मातरम हिन्दी में अनुवादित हुआ। 1907 में इसे तमिल में अनुवादित किया गया। 1908 में वन्दे मातरम का तेलुगु स्वरूप आ गया। 1909 में वन्दे मातरम् मलयालम में गाया जाने लगा और केरल पहुँच गया। इससे पहले साल 1905 में जब अंग्रेज लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को बाँटा तो वन्दे मातरम् आन्दोलन का गीत बन गया। रंगपुर, जो इस समय बांग्लादेश में है, वहाँ एक विद्यालय में हिन्दू और मुसलमान बच्चों ने मिलकर वन्दे मातरम् गाया तो हर बच्चे पर भारी जुर्माना लगा दिया गया। विरोध में बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया।
जब मुस्लिम ने गाया वन्दे मातरम्
1907 में जर्मनी में मैडम भीकाजी कामा ने पहली बार तिरंगा फहराया तो उस तिरंगे के बीच में वन्दे मातरम् लिखा हुआ था। 17 अगस्त 1909 को जब क्रान्तिकारी मदन लाल ढींगरा को इंग्लैण्ड में अंग्रेजों ने फाँसी पर चढ़ा दिया तो उनके अन्तिम दो शब्द थे-वन्दे मातरम्। गान्धी ने जब पहली बार वन्दे मातरम् सुना तो यह उनके दिल को छू गया। 2 दिसम्बर 1905 को इण्डियन ओपिनियन पत्रिका में गांधी ने लिखा कि यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है कि अब हमारा राष्ट्रगान बन चुका है। 1896 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार वन्दे मातरम् गाया गया, जिसकी अध्यक्षता मुस्लिम नेता रहमतुल्लाह अहमद सयानी ने की। 1921 में कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता हकीम अजमल खान ने की थी, उसमें भी पूरा वन्देमातरम् गाया गया। 1923 के काकीनाडा अधिवेशन में मोहम्मद अली जौहर ने उसकी अध्यक्षता की थी। उन्होंने आपत्ति की थी, फिर भी पूरा गाया गया। 1937 तक कांग्रेस अपने हर अधिवेशन में इसे पूरा गाती रही।
धार्मिक बताने का कुचक्र

1920 आते-आते वन्दे मातरम को धार्मिक बताने का कुचक्र शुरू हो चुका था। सबसे पहले बंगाली पत्रिका इस्लाम दर्शन ने देशभक्ति के इस गीत को धार्मिक गीत बताया। फिर साल 1928 में शरीयत-ए-इस्लाम नाम की पत्रिका ने मुसलमानों को शरीयत की दुहाई दी और वन्दे मातरम् नहीं गाने के लिये भड़काया। वन्दे मातरम् गीत के रचियता बंकिम बाबू को मुस्लिम विरोधी घोषित कर दिया गया। 1930 आते-आते
मुस्लिम लीग को वन्दे मातरम् से समस्या हो गयी। एक समय जिन मुसलमानों को वन्दे मातरम् पर कोई आपत्ति नहीं थी, वे इस राष्ट्रगीत में खोट खोजने लगे। ऐसे में याद आते हैं बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जो लिख गये हैं कि मुसलमान के लिये सदैव देश से ऊपर मजहब होता है। उनकी लिखी यह बात बार-बार सच होती है। वन्दे मातरम् से सबसे ज्यादा परेशानी मुस्लिम लीग और जिन्ना को थी। जिन्ना ने कांग्रेस को धमकाया और ब्लैकमेल करना शुरू किया। फलस्वरूप कांग्रेस ने नेहरू के नेतृत्व में एक समिति बनायी गयी। इस समिति ने मुस्लिम लीग और जिन्ना के आगे घुटने टेकते हुए वन्दे मातरम् को काट-छाँट दिया और मात्र दो छन्द ही गाने का निर्णय सुना दिया। नेहरू वाली समिति ने इस कटे हुए वन्दे मातरम् को कांग्रेस के अधिवेशन में पारित करवा लिया ताकि जिन्ना और मुस्लिम लीग खुश हो जाएँ। वन्दे मातरम् के इस विभाजन ने ही देश विभाजन के बीज बो दिए थे। जिन्ना ने पहले वन्दे मातरम् के टुकड़े करवाये और फिर ठीक 10 साल बाद देश का बँटवारा करवाया। नेहरू 1937 में वन्दे मातरम् के टुकड़े करने पर मान गये और फिर 1947 में नेहरू देश के बँटवारे पर भी तैयार हो गये।
यहाँ हमें यह तथ्य ध्यान रखना चाहिये कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने आधिकारिक बयान दिया कि वन्दे मातरम् को जन-गण-मन के समान ही सम्मान और समान दर्जा दिया जायेगा। 24 जनवरी 1950 के संविधान सभा के रिकॉर्ड में वन्दे मातरम के किसी भी हिस्से को हटाने या प्रतिबन्धित करने का कोई प्रस्ताव नहीं। प्रश्न यह है कि वन्दे मातरम् का विरोध करने वाली मुस्लिम लीग ने जब अलग देश ले लिया, तो आज उसी मुस्लिम लीग का स्थान कांग्रेस क्यों ले रही है? कांग्रेस को ध्यान रखना चाहिये कि वन्देमातरम् केवल छह छन्दों की रचना नहीं है। यह भारत की आत्मा की हुँकार है, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में राष्ट्र को परतंत्रता की जंजीरें तोड़ने के लिये प्रेरित किया था। यह गीत उस हर भारतीय की भावनाओं से जुड़ा है जो अपनी मातृभूमि को नमन करता है। आज देश की जनता कांग्रेस की मुस्लिम परस्त मानसिकता से भली-भाँति परिचित हो चुकी है। जो पार्टी देश की अस्मिता और राष्ट्रीय पहचान के साथ समझौता करती है, उसे देशभक्त कभी क्षमा नहीं करेंगे। जो पार्टी अपने राष्ट्रीय गीत की नहीं हुई, वह भला अपने देश की कैसे हो सकती है! जनता को विचार करना पड़ेगा, खासकर उन राष्ट्र भक्तों को जिनके मन में थोड़ी बहुत सहानुभूति इस दल के लिये शेष है।
जब गांधी जी ने कहा था अब कांग्रेस को समाप्त कर देना चाहिये….
– पद्मश्री प्रो० राजेन्द्र मिश्र
‘वन्दे मातरम’ गीत अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त का प्रतिबिम्ब है जिसका सम्बन्ध मात्र पृथ्वी तथा उसके निवासियों से है। पृथ्वी माँ है तथा उसके आँगन में रहने वाले उसकी सन्तान है। अथर्ववेद में जिस पृथ्वी को ऋषि माँ कहता है वह मात्र भारत, चीन, रूस या अरबों की पृथ्वी नहीं है वह सप्तद्वीपा पृथ्वी है। उसकी सन्ताने भी मात्र हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई अथवा यहूदी नहीं है। समग्र संसार ही पृथ्वी की सन्तान है-
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः । – अथर्ववेद अ०४०
बंकिमबाबू ने पराधीनता से ग्रस्त भारतमाता के प्रति उसकी सन्तानों का कर्तव्य-बोध जागृत करने के लिये यह संस्कृत- बंगला मिश्रित गीत लिखा था जो उस युग का युद्धमंत्र बन गया। वस्तुतः यह सम्पूर्ण विश्व का राष्ट्रगीत है। खरगे पूज्य बापू को अपनी सतही समझ से न जोड़ें। गान्धी जी तो मृत्यु के मूल्य पर भी भारत विभाजन नहीं चाहते थे।
गांधी जी ने साफ कहा था कि स्वतंत्रता मिल गयी अतः अब कांग्रेस को समाप्त कर देना चाहिये। उसका लक्ष्य मिल गया। कांग्रेसी गांधी जी की कौन-कौन बात मान रहे हैं। गांधी जी उनके लिये ड्राइंग रूम की फोटो मात्र हैं।
हिन्दू एकमत होकर बोलें- ‘भारत माता की जय’ : शंकराचार्य
23 अप्रैल 2016 को बागपत में ज्योतिष एवं शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने कहा था कि, ‘भारत माता की जय’ बोलने को लेकर बेवजह विवाद खड़ा किया जा रहा है। जिसे नहीं बोलना है, वह न बोले, लेकिन हिन्दुओं को कम से कम एकमत होकर ‘भारत माता की जय’ बोलनी चाहिये। उन्होंने कहा कि यदि देश के करोड़ों हिन्दू ‘भारत माता की जय’ बोलते हैं तो कुछ लोगों के ऐसा नहीं करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। शंकराचार्य ने कहा कि पहले स्कूलों में धार्मिक और संस्कारित शिक्षा दी जाती थी। इससे बच्चों में संस्कार और धार्मिक भावना विकसित होती थी। अब स्कूलों में रामायण और गीता का ज्ञान नहीं दिया जाता, क्योंकि कुछ लोगों को इससे आपत्ति हो सकती है। उन्होंने बच्चों को भारतीय संस्कृति और धार्मिक ग्रन्थों की शिक्षा देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ जैसे तीर्थों पर सभी वर्ग और जातियों के लोग दर्शन करने जाते हैं। वहाँ किसी तरह का जातिवाद नहीं है। दलित समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और समाज में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिये। सभी लोगों को समान मानना चाहिये।
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