
पितृपक्ष और उसका महत्व
पितृपक्ष… क्या आपने कभी सोचा है कि वर्ष में एक ऐसा पक्ष क्यों आता है, जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके लिए तर्पण करते हैं और श्राद्ध करते हैं? क्या यह केवल हजारों वर्षों से चली आ रही कोई धार्मिक परम्परा है, या इसके पीछे भी कोई कारण है? इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ‘श्राद्ध’ शब्द को समझना होगा।
‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। अर्थात श्रद्धापूर्वक किया गया वह कर्म, जिसमें हम अपने पितरों का स्मरण करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। भारतीय संस्कृति में किसी भी मनुष्य के अस्तित्व के पीछे उसके माता-पिता, दादा-दादी और उनसे भी पहले की पीढ़ियों का योगदान माना गया है। इसलिए पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी एक धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। ऋग्वेद में पितरों का स्मरण करते हुए कहा गया है—
“उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमा पितरः सोम्यासः।”
अर्थात् हमारे पितर, जो पूर्वजों के रूप में स्मरणीय हैं, वे हमारे प्रति अनुकूल हों। यानी पितरों का स्मरण कोई नई परम्परा नहीं है। यह वैदिक धार्मिक जीवन का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है लेकिन फिर प्रश्न आता है—पितृपक्ष ही क्यों? इसके लिए हमें चन्द्र पक्ष के पंचांग को समझना होगा।
मनुस्मृति कहती है—
“यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते।
तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते॥”
अर्थात् जिस प्रकार कृष्ण पक्ष को शुक्ल पक्ष की अपेक्षा श्राद्ध के लिए अधिक प्रशस्त माना गया है, उसी प्रकार श्राद्ध के लिए पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्न को अधिक उपयुक्त माना गया है। कृष्ण पक्ष की तिथियों में पितरों के लिए श्राद्ध करने की परम्परा है और इसमें सबसे महत्वपूर्ण नियम क्या है? जिस पितर की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, पितृपक्ष में सामान्यतः उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु द्वितीया तिथि को हुई थी, तो पितृपक्ष की द्वितीया को उसका श्राद्ध किया जाएगा। यदि मृत्यु अष्टमी को हुई थी, तो अष्टमी को और यदि मृत्यु दशमी को हुई थी, तो दशमी को इसलिए पितृपक्ष की हर तिथि का अर्थ यह नहीं है कि उस दिन कोई अलग-अलग प्रकार के पितर आते हैं। मुख्य आधार मृत्यु की तिथि है। अब आइए समझते हैं कि पितृपक्ष की अलग-अलग तिथियों में क्या विशेषता है। प्रतिपदा से लेकर अष्टमी तक सामान्यतः उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनका देहावसान सम्बन्धित तिथि को हुआ था। लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, कुछ तिथियों को विशेष महत्व मिलता है। नवमी को विशेष रूप से ‘मातृ नवमी’ कहा जाता है।इस दिन माता और मातृपक्ष की दिवंगत स्त्रियों के लिए श्राद्ध करने की परम्परा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नवमी को केवल मातृपक्ष का ही श्राद्ध किया जा सकता है। मृत्यु-तिथि के सामान्य नियम के अनुसार नवमी को अन्य पितरों का श्राद्ध भी हो सकता है। इसके बाद आती है चतुर्दशी। यह तिथि सामान्य तिथि-श्राद्ध से कुछ अलग मानी जाती है। गरुड़पुराण की श्राद्ध परम्परा में युद्ध, शस्त्र या आघात से मृत्यु प्राप्त लोगों के लिए चतुर्दशी के श्राद्ध का विशेष उल्लेख मिलता है इसीलिए कई स्थानों पर इसे घात या शस्त्रहत श्राद्ध भी कहते हैं और फिर आता है पितृपक्ष का अन्तिम दिन, जिसे कहते हैं— सर्वपितृ अमावस्या।
यह उन पितरों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर किसी कारण से नहीं हो पाया। महाभारत के अनुशासनपर्व में भी अमावस्या पर पितरों के लिए श्राद्ध और अर्पण का महत्व बताया गया है लेकिन पितृपक्ष की विशेषता केवल तिथियों तक सीमित नहीं है। कुछ विशेष नक्षत्र-संयोगों का भी महत्व बताया गया है, जैसे— भरणी और मघा नक्षत्र का श्राद्ध विशेष माना गया है। तो श्राद्ध केवल किसी दिवंगत व्यक्ति को याद करने का कर्म नहीं है। यह अपने अतीत के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने की भारतीय परम्परा है।