राह दिखाते देवकीनन्दन

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राह दिखाते देवकीनन्दन

भारत आज केवल आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति या वैश्विक प्रतिष्ठा की यात्रा पर नहीं है। वह अपनी आत्मा, अपनी स्मृति, अपनी सांस्कृतिक पहचान और अपने भविष्य को लेकर भी एक बड़े विमर्श के बीच खड़ा है इसलिये आज श्रीकृष्ण को केवल मन्दिर में खड़े बाँसुरीधारी देवता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। कृष्ण को समझना है तो उन्हें कुरुक्षेत्र के बीच खड़े सारथी के रूप में समझना होगा क्योंकि कृष्ण की सबसे बड़ी शिक्षा यह नहीं थी कि संघर्ष से बचो। उनकी शिक्षा थी- संघर्ष से पहले अपने भीतर के मोह, भय और भ्रम को पराजित करो। आज का भारत भी एक प्रकार के कुरुक्षेत्र से गुजर रहा है।


यह कुरुक्षेत्र केवल सीमा पर नहीं है, यह विश्वविद्यालयों में है, यह सोशल मीडिया पर है, यह विचारों के बाजार में है, यह इतिहास की व्याख्याओं में है और सबसे अधिक यह भारतीय युवा के मन में है लेकिन यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। हर असहमति को राष्ट्रविरोध कहना उतना ही गलत है, जितना राष्ट्रहित की हर बात को सन्देह की दृष्टि से देखना।


लोकतंत्र की शक्ति विरोधी को चुप कराने में नहीं, बल्कि अपने विचार को तर्क और आचरण से श्रेष्ठ सिद्ध करने में है। यही वह बिन्दु है जहाँ श्रीकृष्ण आज के भारत के लिये अत्यन्त प्रासंगिक हो जाते हैं। गीता की शुरुआत विजय के उद्घोष से नहीं होती। वह अर्जुन के विषाद से शुरू होती है। अर्जुन योद्धा था, लेकिन निर्णायक क्षण में उसका मन टूट गया। उसके हाथ में गाण्डीव था, परन्तु उसके भीतर निर्णय का अभाव था। आज के युवा के हाथ में गाण्डीव के स्थान पर मोबाइल है। सूचना उसके पास अनन्त है, लेकिन दिशा कितनी है?
वह हजारों विचार पढ़ता है, सैकड़ों वीडियो देखता है, हर विषय पर तत्काल प्रतिक्रिया देता है लेकिन क्या वह स्वयं सोचता भी है? आज का सबसे बड़ा संकट सूचना का अभाव नहीं, विवेक का अभाव है।


कृष्ण अर्जुन को अन्धानुकरण नहीं सिखाते। वे उसे प्रश्न करने देते हैं। अर्जुन पूछते है, कृष्ण समझाते हैं फिर अर्जुन स्वयं निर्णय करता है।
यही भारतीय ज्ञान परम्परा की खूबसूरती है- वह मस्तिष्क को बन्द नहीं करती, उसे जाग्रत करती है।
आज यदि कोई युवा भारत, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, संविधान, लोकतंत्र, समाजवाद, पूँजीवाद या किसी भी विचारधारा पर प्रश्न करता है, तो उसे प्रश्न करने दीजिये लेकिन प्रश्न के साथ अध्ययन भी हो। असहमति के साथ तर्क भी हो। स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी हो क्योंकि बिना अध्ययन का राष्ट्रवाद केवल नारा है, और बिना राष्ट्रबोध की बुद्धिमत्ता केवल बौद्धिक अहंकार। गीता का कर्मयोग आज के युवा को दूसरी बड़ी शिक्षा देता है। कृष्ण कहते है-


“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”


अर्थात् अधिकार कर्म पर है, केवल परिणाम पर नहीं। आज की पीढ़ी परिणाम बहुत जल्दी चाहती है। एक परीक्षा में सफलता चाहिये। एक वीडियो में वायरल होना है। एक पोस्ट पर हजारों लाइक चाहिये। एक वर्ष में करियर बनाना है। एक चुनाव में सब बदल देना है। कृष्ण कहते हैं- पहले अपने कर्म को उत्कृष्ट बनाओ। भारत का निर्माण उस विद्यार्थी से होगा जो ईमानदारी से पढ़ता है। उस वैज्ञानिक से होगा जो प्रयोगशाला में रात बिताता है। उस सैनिक से होगा जो सीमा पर खड़ा रहता है। उस किसान से होगा जो मिट्टी को जीवन देता है। उस उद्यमी से होगा जो रोजगार पैदा करता है और उस नागरिक से होगा जो अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझता है।


राष्ट्रभक्ति का सबसे कठिन रूप राष्ट्र के लिये रोज अपना श्रेष्ठ देना है। कृष्ण की तीसरी शिक्षा है- समत्व। “समत्वं योग उच्यते।”
आज डिजिटल युग में व्यक्ति को लगातार उत्तेजित किया जा रहा है। एक खबर आती है- क्रोध, दूसरी आती है- भय, तीसरी आती है- घृणा, चौथी आती है- उत्साह और कुछ ही मिनटों में मनुष्य अपनी दिशा बदल देता है। जिस समाज की भावनाएँ उसके विरोधी नियंत्रित कर लें, उसकी शक्ति कितनी भी बड़ी हो, वह भीतर से कमजोर हो जाता है इसलिये आज कृष्ण का संदेश है-


उत्तेजित मत होइए; जाग्रत रहिए। प्रतिक्रिया मत कीजिये; विचार कीजिये। भीड़ का हिस्सा मत बनिए; विवेक की आवाज बनिए।
भारत के सामने यदि कोई वैचारिक चुनौती है, तो उसका उत्तर गाली नहीं बल्कि उत्तर बेहतर विचार होना चाहिये। यदि कोई भारत की प्रगति का विरोध करता है, तो भारत को और अधिक प्रगति करनी चाहिये।


यदि कोई भारतीय इतिहास को विकृत करता है, तो उसका उत्तर प्रमाणित इतिहास होना चाहिये। यदि कोई हिन्दुत्व को समझे बिना उसकी आलोचना करता है, तो उत्तर हिंसा नहीं- हिन्दुत्व की उदार, दार्शनिक और समावेशी परम्परा का ज्ञान होना चाहिये क्योंकि जिस विचार को अपने अस्तित्व के लिये दूसरे को मिटाना पड़े, वह विचार कमजोर है।


सशक्त विचार अपने विरोधी से डरता नहीं और हिन्दुत्व की वास्तविक शक्ति उसकी विशालता में है- उसमें प्रश्न के लिये स्थान है, अनेक साधना-पद्धतियों के लिए स्थान है।
हिन्दुत्व का अर्थ होना चाहिये- सत्य की खोज, कर्तव्य का निर्वाह, आत्मसंयम, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और समस्त जीवन के प्रति सम्मान।
गीता में “लोकसंग्रह” की भावना आती है- अर्थात्ा् ऐसा कर्म जो समाज के व्यापक हित को सम्भाले। यही आज की राजनीति और सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। राजनीति यदि केवल सत्ता बन जाये तो समाज विभाजित होता है लेकिन वह लोकसंग्रह बन जाये तो राष्ट्र मजबूत होता है।

राह दिखाते देवकीनन्दन


आज भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल नौकरी खोजने वाले न हों, बल्कि समस्या खोजकर उसका समाधान करने वाले हों। जो केवल सरकार से प्रश्न न पूछें, स्वयं से भी प्रश्न पूछें। जो पूछें- मैं भारत के लिये क्या कर रहा हूँ? मैं अपने समाज को क्या दे रहा हूँ? मैं अपने परिवार, अपने संस्थान और अपने कार्यक्षेत्र में कितना ईमानदार हूँ?
मेरी प्रतिभा का उपयोग केवल मेरे लिये है या समाज के लिए भी? यही कृष्ण का कर्मयोग है और शायद आज की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा यही है- कुरुक्षेत्र बदल गया है, लेकिन मनुष्य का द्वंद्व नहीं बदला।


तब अर्जुन के सामने युद्ध था। आज युवा के सामने सूचना, विचारधाराओं, उपभोक्तावाद, पहचान-संकट, डिजिटल भ्रम और सामाजिक तनाव का युद्ध है। तब कृष्ण सारथी बने थे।
आज कृष्ण की आवश्यकता किसी बाहर के सारथी से अधिक हमारे भीतर के विवेक के रूप में है। भारत को डिगाने वाली शक्तियाँ बाहर हों या भीतर- भारत तब तक नहीं डिगेगा जब तक उसका युवा अपने विवेक से जुड़ा रहेगा और इसलिये आज आवश्यकता केवल यह कहने की नहीं है कि- “भारत महान था।”


आवश्यकता यह सिद्ध करने की है कि- “भारत महान है और भारत महान बनेगा।”
लेकिन यह भविष्य केवल नारों से नहीं बनेगा बल्कि ज्ञान और चरित्र से बनेगा।
यह बनेगा अनुशासन से।
यह बनेगा परिश्रम से।
यह बनेगा वैज्ञानिक दृष्टि से।
यह बनेगा सांस्कृतिक आत्मविश्वास से।
और सबसे बढ़कर- कर्तव्यबोध से।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- उठो।


आज वही पुकार भारत के युवा के सामने है।
उठो लेकिन क्रोध के साथ नहीं, विवेक के साथ। उठो लेकिन घृणा के साथ नहीं, आत्मविश्वास के साथ। उठो लेकिन केवल विरोध करने के लिये नहीं, निर्माण करने के लिये। उठो क्योंकि राष्ट्र केवल भूगोल नहीं होता; राष्ट्र करोड़ों मनुष्यों के साझा स्वप्न का नाम है। और अन्ततः जब समय प्रतिकूल हो, तब कृष्ण को पढ़ना धर्म का प्रदर्शन नहीं, जीवन की दिशा प्राप्त करना है।
जब भ्रम बढ़े, तब कृष्ण विवेक हैं।
जब भय बढ़े, तब कृष्ण साहस हैं।
जब मोह बढ़े, तब कृष्ण कर्तव्य हैं।
जब अहंकार बढ़े, तब कृष्ण समत्व हैं।
और जब राष्ट्र निर्माण का प्रश्न सामने हो- तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि इतिहास दर्शक नहीं बनाते, इतिहास कर्म करने वाले बनाते हैं।
आज भारत का युवा वही अर्जुन है। सवाल केवल इतना है-
क्या उसके हाथ में गाण्डीव उठाने का साहस है? और उससे भी बड़ा सवाल-
क्या उसके भीतर कृष्ण की तरह विवेकपूर्ण मार्गदर्शन सुनने की विनम्रता है? क्योंकि भारत को आज केवल आक्रोशित युवा नहीं चाहिये।
भारत को जाग्रत, संयमी, विचारवान, परिश्रमी और राष्ट्रहित में अपना सर्वश्रेष्ठ देने वाला युवा चाहिये। यही श्रीकृष्ण की प्रासंगिकता है। यही गीता की शक्ति है और शायद यही आज के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

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