अभिनेता से बढ़कर सच्चे इंसान थे नाना पाटेकर

अभिनेता से बढ़कर सच्चे इंसान थे नाना पाटेकर
अभिनेता से बढ़कर सच्चे इंसान थे नाना पाटेकर

अभिनेता से बढ़कर सच्चे इंसान थे नाना पाटेकर :

आप किसी अभिनेता या अभिनेत्री को याद करेंगे तो क्यों करेंगे, उनकी बेहतरीन एक्टिंग, उनकी खूबसूरती, उनके डायलॉग्स या फिर उनको मिलने वाले अवार्ड्स के लिये लेकिन सिनेमा जगत में एक ऐसा भी अभिनेता था जिसे यह देश उनकी देशभक्ति और राष्ट्रसेवा के लिये याद करेगा, वे थे नाना पाटेकर… नाना पाटेकर ने 8 अक्टूबर 2026 को 75 साल की उम्र में अन्तिम साँस ली।
उनके आकस्मिक निधन से न केवल बॉलीवुड बल्कि पूरे देश में शोक की लहर है, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसे उनके व्यक्तित्व ने प्रभावित न किया हो, डायलॉग्स न याद हो या सहजता और सरलता का कायल न हुआ हो। वे रील नहीं, रियल लाइफ के भी हीरो थे। मनोरंजन जगत को समृद्ध करने के साथ ही उन्होंने समाज और राष्ट्र के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी खूब निभायी है। नाना पाटेकर मायानगरी में काम करके भी इस माया से दूर रहे। उनका दिल हमेशा भारतीय सेना, गाँवों गाँवों, किसानों के लिये धड़का। समृद्ध और सुशिक्षित समाज का निर्माण ही उनका लक्ष्य था।


पिता के लगाव को बनाया भविष्य…

1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ (मुरुड-जंजीरा) के एक मराठी परिवार में जन्में नाना का पूरा नाम विश्वनाथ पाटेकर था… जो उन्हें उनकी मुहबोली मौसी ने दिया था। नाना ने पिता के थिएटर के लगाव को अपना जीवन बनाया। बचपन से ही नाटक देखने और मंच से जुड़े। फिल्मों में आने से पहले वे स्केच और पोस्टर बनाया करते थे। नाना को फिल्मों के पोस्टर पेन्ट करने के लिये 35 रुपये महीना मिलता था। इन्हीं पैसों से उन्होंने जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की और थिएटर से अपना रिश्ता मजबूत किया।


‘परिन्दा’ से बनायी अलग पहचान

नाना पाटेकर ने 1978 में ‘गमन’ फिल्म से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। लगभग आठ साल बाद 1984 में आयी फिल्म ‘आज की आवाज’ ने से उन्हें लोकप्रियता मिली। इसके बाद ‘सलाम बॉम्बे’ और फिर 1989 में आई ‘परिन्दा’ में अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर मिला। इसके बाद अंगार, तिरंगा, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाने वाली फिल्म ‘क्रान्तिवीर’, अग्निसाक्षी, खामोशी, अब तक छप्पन, अपहरण, राजनीति, वेलकम और नटसम्राट जैसी फिल्मों में भी नाना ने जबरदस्त अभिनय किया। उन्होंने हीरो, विलेन, पुलिस अधिकारी, सैनिक और आम आदमी का किरदार बखूबी निभाया। उनके खाते में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और 2013 में मिला पद्मश्री भी है। नाना ने मराठी फिल्म नटसम्राट में गणपत बेलवलकर का उनका अभिनय उनके करियर की उल्लेखनीय उपलब्धियों में गिना जाता है।


सैन्य प्रशिक्षण के बाद सेना की क्यूआरटीम में हुए थे शामिल

1991 की फिल्म ‘प्रहारः द फाइनल अटैक’ में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। इसमें मेजर प्रताप चौहान का किरदार निभाने के लिये उन्होंने भारतीय सेना से सैन्य प्रशिक्षण लिया और कारगिल युद्ध के दौरान उनका यही सैन्य अनुभव काम आया। तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की सहमति पर नाना को सैन्य प्रशिक्षण और राइफल शूटिंग के अनुभव होने के कारण कारगिल युद्ध में देशसेवा का अवसर मिला। उनकी सेवाओं के लिये उन्हें मानद कैप्टन (Honorary Captain) इसके बाद लेफ्टिनेंट कर्नल (Lieutenant Colonel) की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था। लगभग 60 दिनों में वे द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर में जवानों के साथ रहे। वे सेना की क्विक रिएक्शन टीम यानी क्यूआरटी का हिस्सा थे। क्यूआरटी का काम बेहद संवेदनशील परिस्थितियों में तेजी से प्रतिक्रिया देना होता है।


महाराष्ट्र के अन्नदाताओं के जीवनदाता बने नाना

नाना किसानों के सच्चे हितैषी थे। एक बार उन्होंने एक महँगी कार खरीदने के लिये डेढ़ करोड़ रुपये जुटाये लेकिन उसे महाराष्ट्र में सूखे के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों में बाँट दिया। 2015 में स्थापित नाना के ‘नाम फाउण्डेशन’ ने महाराष्ट्र के बीड जिले में आत्महत्या कर चुके परिवारों के बच्चों के रहने के लिये छात्रावास बनवाया। यह संस्था सूखाग्रस्त क्षेत्रों में नदियों और जलाशयों की सफाई, जलस्रोतों को गहरा करने, नहरों को पुनर्जीवित करने और खेतों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के काम करती है। बीड जिले में नदी की 30 किलोमीटर से अधिक लम्बाई में गाद निकालने और चौड़ा करने का काम किया। लगभग 140 गाँवों और लगभग एक लाख लाभ पहुँचाया। 200 महिलाओं को किसानों को लाभसिलाई मशीनें वितरित की। इससे महिलाओं को घर की जिम्मेदारियों के साथ अपनी आजीविका चलाने का साधन मिला। आज भी यह संस्था चलियारे का साथच कमला। आज भी यह संस्था देने, किसान विधवाओं की आजीविका के लिये काम करने और विद्यार्थियों को शैक्षिक सहायता, स्कूलों के विकास, ग्रामीण परिवारों को पशुधन उपलब्ध कराने और आजीविका के साधन विकसित करने जैसे काम हैं।


सहज व साधारण थे नाना पाटेकर

करोड़ों की सम्पत्ति और शोहरत के मालिक नाना, बेहद साधारण जीवन जीते थे। फिल्म के सेट पर भी वे अपने हाथों से लोगों को खाना परोसते थे। नाना ऐसे अभिनेता हैं, जो अपनी निजी जीवन को काफी हद तक निजी रखना पसन्द करते हैं। वे बड़े स्टार भले ही थे लेकिन उन्हें साधारण तरह से रहना ही पसन्द था। अपनी कमायी का बड़ा हिस्सा समाजसेवा में लगाते थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे सिर्फ फिल्में करने मुम्बई आते हैं, लेकिन उनका मन गाँव की मिट्टी में बसता है। इनकी सादगी का अन्दाजा बात से लगाया जा सकता है कि 27 एकड़ में बने फार्महाउस में एक भी एसी नहीं थी।

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