भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारत माता मन्दिर की संकल्पना
भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारतीय सनातन परम्परा में संन्यास का उदेश्य बनविता याला की साधना का साथ-साथ लोक-कल्याण और राष्ट्र-धर्म का सम्वर्धन रहा है। आधुनिक युग में इस संन्यासी परम्परा को राष्ट्र-साधना के दिव्य अनुष्ठान में रूपान्तरित करने वाले मूर्धन्य मनीषियों में पद्मभूषण पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज का नाम अग्रगण्य है। स्वामी जी का प्राकट्य 19 सितम्बर 1932 को अग्रवन (आगरा) में हुआ था। इनके बचपन का नाम ‘अम्बिका प्रसाद’ था। इनके पिता श्री शिव शंकर पाण्डेय संस्कृत शिक्षक एवं प्रकाण्ड विद्वान थे तथा माता श्रीमती त्रिवेणी देवी अत्यन्त धर्मपरायण विदुषी थीं। शिक्षा उपरान्त स्वामी वेदव्यासानन्द जी ने उन्हें संन्यास दीक्षा दी और उनका नाम सत्यमित्रानन्द रखा। 29 अप्रैल 1960, अक्षय तृतीया के दिन, लगभग 26 वर्ष की आयु में उन्हें ज्योतिर्मठ की भानपुरा पीठ के शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। लगभग नौ वर्षों तक शंकराचार्य के रूप में धार्मिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने के बाद उन्होंने 1969 में शंकराचार्य पद का परित्याग कर दिया। इसी युगान्तरकारी राष्ट्र दर्शन का साकार विग्रह है हरिद्वार की पुण्यभूमि पर माँ गंगा जी के पावन तट पर प्रतिष्ठित ‘भारत माता मन्दिर’।


भारत माता मन्दिर

भारत माता मन्दिर

हरिद्वार स्थित भारत माता मन्दिर की संकल्पना भारत माता और उनके वीर सपूतों को श्रद्धाञ्जलि देने के उद्देश्य से की गयी थी, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मन्दिर की स्थापना स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी ने की थी और वर्ष 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया। इस भव्य श्वेत भवन की आठों मंजिलों को अलग-अलग विषयों और भावों के आधार पर विकसित किया गया है।

प्रथम तल : भारत माता को समर्पित है, जिसमें भारत माता की भव्य प्रतिमा विराजमान है। इसी मंजिल पर भारत का एक विशाल मानचित्र भी स्थापित है, जो देश की भौगोलिक जो देश की भौगोलिक एकता और अखण्डता का प्रतीक है।


द्वितीय तल : ‘शूर मन्दिर’ भारत के महान वीरों और राष्ट्रनायकों को समर्पित है। यहाँ उन महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धाञ्जलि दी गयी है, जिन्होंने अपने सर्वोच्च बलिदान से देश के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी।


तृतीय तल
: ‘मातृ मन्दिर’ भारत की महान नारी शक्तियों मीराबाई, सावित्री, मैत्रेयी आदि के गौरवमयी योगदान और उपलब्धियों को समर्पित है।


चतुर्थ तल : ‘सन्त मन्दिर’ विभिन्न धर्मों के महान सन्तों को समर्पित है। यहाँ जैन, सिख और बौद्ध परम्पराओं सहित विभिन्न धार्मिक परम्पराओं के पूज्य सन्तों को स्थान दिया गया है।


पञ्चम तल : सभा कक्ष की दीवारों पर भारत में प्रचलित सभी धर्मों के प्रतीकात्मक सह-अस्तित्व को दर्शाया गया है। यहाँ भारत के विभिन्न प्रान्तों के इतिहास, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।


षष्ठ तल : ‘शक्ति मन्दिर’ भगवती शक्ति को समर्पित है। यहाँ हिन्दू धर्म में आराधित आद्याशक्ति के विविध स्वरूपों का भव्य एवं आध्यात्मिक चित्रण किया गया है।


सप्तम तल : ‘विष्णु मन्दिर’ भगवान विष्णु को समर्पित है, जो हिन्दू धर्म की पवित्र त्रिमूर्ति में पालनकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस तल पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों का दिव्य स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।


अष्टम तल : ‘शिव मन्दिर’ भगवान शिव को समर्पित है, जो सनातन हिन्दू परम्परा में परम आराध्य एवं सर्वोच्च चेतना के स्वरूप माने जाते हैं। यहाँ भगवान शिव का पावन विग्रह प्रतिष्ठित है। पूज्य स्वामी की युगदृष्टा चेतना से आविर्भूत यह 180 फीट ऊँचा और आठ मंजिला भव्य देवालय अखण्ड भारत की सांस्कृतिक आत्मा को साक्षात देव-विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह पावन अधिष्ठान वैदिक वाणी ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कराता है।


विश्व में भारतीय संस्कृति का सन्देश

स्वामी जी ने अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया सहित 65 से अधिक देशों अनेक देशों की यात्राएँ कीं और भारतीय दर्शन, सनातन संस्कृति, वेदान्त तथा आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि का परिचय कराया। स्वामी जी का मानना था कि अपने धर्म के प्रति गौरव की भावना और दूसरे धर्म के प्रति सहिष्णुता के सिद्धान्त से विश्व में शान्ति आ सकती है। इसी दृष्टिकोण के अनुसार उन्होंने अपने हरिद्वार स्थित आश्रम का नाम समन्वय कुटीर रखा था। वे छूआछूत के भी प्रबल विरोधी रहे। वर्ष 1988 में उन्होंने समन्वय सेवा फाउण्डेशन की नींव रखी, जिसके माध्यम से जनजातीय, पर्वतीय और गरीब क्षेत्रों के बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा व चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। भारत माता मन्दिर, हरिद्वार के संस्थापक और निवर्तमान शंकराचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी 87 वर्ष की आयु में 25 जून 2019 की सुबह संसार से हमेशा के लिए विदा हो गए। हरिद्वार स्थित भारत माता मन्दिर ट्रस्ट के राघव कुटीर में उन्हें समाधि दी गई। उनकी जीवन-यात्रा अम्बिका प्रसाद से सत्यमित्रानन्द, सत्यमित्रानन्द से शंकराचार्य और शंकराचार्य से लोकसेवी सन्त भारतीय आध्यात्मिक परम्परा की गतिशीलता को अभिव्यक्त करती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *