
सनातन धर्म संस्कृति के रक्षक : गुग्गा जाहरवीर
भारत के इतिहास में ऐसे अनेक योद्धा हुए जिन्होंने अपने धर्म एवं संस्कृति की रक्षा में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
ऐसे वीर योद्धाओं की विजय गाथा के किस्से आज भी हमारे समाज में लोकगीतों के माध्यम से गाए जाते हैं। ऐसे ही वीर योद्धा थे, ‘राणा गोगा जाहरवीर’। राणा गोगा जाहरवीर ने अपने धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया था। उनकी वीरता, धर्म और समर्पण के मूल्यों की वजह से ही उन्हें आज देवतुल्य स्थान दिया जाता है और लोकदेवता के रूप में उनकी पूजा की जाती है। विभिन्न राज्यों की बोलियों में सामान्यतः उन्हें गोगा बाप्पा, गोगा जी, गुग्गा, जाहरवीर आदि नामों से पुकारा जाता है। गोगा जाहरवीर की वीरता पूर्ण कहानियां श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन वाले दिन से शुरू होकर गुग्गा नवमी तक भक्तों द्वारा गाई जाती हैं। जाहरवीर गोगा का जन्म एक हिंदू क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके जन्म को लेकर एक जनश्रुति प्रचलित है। ददरेवा के राजा जेवर की दो पत्नियां थी। बाछल एवं काछले देवी। इनके कोई संतान नहीं थी। उन दिनों गुरु गोरखनाथ गोगामेड़ी के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी गुरु गोरखनाथ जी की शरण में गई। देवी गुरु गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खा कर बाछल देवी गर्भवती हुई। तदोपरांत विक्रमी संवत 1003 को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को वीर गोगा जी का जन्म हुआ। रानी बाछल की बहन काछल देवी को भी इन्हीं गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से अर्जन सर्जन नाम के दो पुत्र प्राप्त हुए थे। राजा जेवर की असमय मृत्यु के कारण उनके पुत्र वीर गोगा के कंधों पर राज्य का भार आ गया। माता बाछल देवी की देखरेख में वे ददरेवा के राणा बने। जाहरवीर गोगा एक सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक थे। महमूद गजनबी ने जब उत्तर भारत पर आक्रमण किया तो जाहरवीर ने अपने राज्य के साथ लगते राज्यों से मैत्री संधि स्थापित कर अपनी छवि भारतीय संस्कृक्ति के संरक्षक के रूप में बना ली। कौज लूटने के बाद गजनवी ने सोमनाथ पर आक्रमण कर उस धरोहर को नष्ट कर दिया। जाहरवीर गोगा ने अन्य राजाओं के ना पहुंच पाने के बाद भी अदम्य साहस का परिचय दिया उन्होंने अपने पुत्रों, भाई, भतीजे और अपनी स्थाई एवं एकत्रित सेना को लेकर गजनबी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में मातृभूमि एवं हिंदू धर्म की रक्षा करते हुए वे बलिदान हो गए।
जाहरवीर का सिर कट कर ददरेवा में गिरा इसलिए इस स्थान को शीर्षमेड़ी या शीषमेड़ी कहा जाता है तथा धड़ हनुमानगढ़ के नोहर में गिरा इसलिए इसे धरमेड़ी या धुरमेड़ी या गोगामेड़ी भी कहते हैं। सिर धड़ से अलग होने पर भी उनका धड़ हाथ में तलवार लिए शत्रुओं का संहार करता रहा। इसे देखकर गजनबी के मुंह से जाहर पीर यानी प्रत्यक्ष दिव्यआत्मा निकला। यह एक भ्रम फैलाया गया है कि गोगा जी महाराज मृत्यु से पूर्व मुसलमान बन गए थे इसलिए उन्हें गुगापीर या जाहरपीर कहा जाता है। यह बिल्कुल असत्य एवं मनधांत है। वास्तविकता यह है कि उनके बाद 1213 ईस्वी तक उनके नौ हिंदू वंशजों का राज रहा और उनके कुल से अंतिम हिंदू राजा जैतसी हुए।
लोक मान्यताओं एवं लोक कथाओं में गोगा जी को नागों के देवता के अवतार के रूप में भी माना जाता है और उन्हें सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। हिमाचल में जिला बिलासपुर, गेहड़वीं, हमीरपुर के धनेटा, गलोड़ में लहड़ा, काँगड़ा के सुलह, गुग्गा सलोह, सिरमौर के नाहन, ऊना, मंडी और सोलन के सुबाथू में गुग्गा मंदिर और मेले बहुत प्रसिद्ध हैं। गोगा जाहरवीर से संबंधित मुख्य वाद्य यंत्र डेरु या डौरु है। मान्यता है कि जाहरवीर छड़ी में निवास करते हैं। इस सिद्ध छड़ी को गुग्गा के प्रतीक के रूप में माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि नाहरवीर और सावल सिंह वीर सहित कई वीरों का पहरा भी इसमें रहता है। छड़ी के साथ एक लोहे का सांकल भी रहता है। इस पर भगवा कपड़ा लिपटा रहता है। हिमाचल में विभिन्न भक्त मंडलियां बनाकर देवता जाहरवीर के प्रतीक को पूरे गांव में घर-घर घूमाते हैं। डौरु बजा कर वीर गाथा गायी जाती है और सांकल नृत्य भी किया जाता है। मान्यता है कि गांव में इसे घुमाने से रोग, बाधाओं, सर्पदंश, शारीरिक तथा मानसिक कष्टों का निवारण होता है। रक्षाबंधन से शुरू होकर गुग्गा नवमी तक कार्यक्रम चलता है। नवमी के दिन सभी घरों में गुग्गा की पूजा की जाती है और मीठा रोट देवता को चढ़ाया जाता है। रक्षाबंधन पर बांधे गए रक्षा सूत्रों या राखियों को भी इसी दिन खोलकर देवता को अर्पित कर दिया जाता है।