
पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा
मनुष्य जब अपने अस्तित्व की ओर दृष्टि डालता है, तब उसके सम्मुख एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है मैं कहाँ से आया हूँ? शंकराचार्य कहते हैं कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः… इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य को अपने माता-पिता तक ले जाता है। माता-पिता से पूर्व वह अपने पितामह और मातामह तक पहुँचता है, फिर उससे भी पीछे जाती हुई पीढ़ियों की एक अनवरत श्रृंखला दिखायी देती है। शरीर की संरचना, संस्कारों की परम्परा, भाषा, जीवन मूल्य, सामाजिक व्यवस्था और ज्ञान-सम्पदा इन सबके भीतर अतीत की अनेक पीढ़ियों की उपस्थिति विद्यमान रहती है। भारतीय मनीषा ने इस सत्य को अत्यन्त गहरायी से अनुभव किया है। इसी अनुभव ने मनुष्य के ऊपर पितृऋण की संकल्पना स्थापित की और इस ऋण की स्मृति को संस्कार का स्वरूप प्रदान किया। पितृपक्ष उसी सांस्कृतिक स्मृति का विशिष्ट काल है और श्राद्ध उसका कर्मरूप। श्राद्ध को समझने के लिये तीन प्रश्न सामने आते हैं- पितृ कौन हैं? उनके प्रति तर्पण की आवश्यकता क्यों अनुभव की गयी? और इस समूची परम्परा के भीतर विज्ञान, मनोविज्ञान, सामाजिकता तथा प्रकृति-दृष्टि के कौन से सूत्र विद्यमान हैं? इन प्रश्नों के उत्तर पितृपक्ष की परम्परा को एक गम्भीर ज्ञान-विमर्श में परिवर्तित कर देते हैं।
‘पा रक्षणे’ धातु से निष्पन्न पितृ या पितर शब्द का सामान्य अर्थ पिता अथवा पूर्वज से जुड़ा है। ‘पा’ धातु में निहित रक्षण का भाव यह संकेत करता है कि पितर अपनी सन्तति के जीवन, संस्कार और वंशपरम्परा के संरक्षक माने जाते हैं। महाकवि कालिदास अपने ग्रन्थ के मंगलाचरण में ‘जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ’ में पितरौ शब्द के द्वारा भगवान शिव और पार्वती की समवेत रूप में वन्दना किये हैं। स्कन्द पुराण में पितरों के नौ कोटियाँ प्राप्त होती हैं अग्निष्वात्ताः, बर्हिषदः, आज्यपात्, सोमपाः, रश्मिपाः, उपहूताः, आयन्तुनः, श्राद्धभुजः एवं नान्दीमुखाः। भारतीय परम्परा में पितर, श्राद्ध और पिण्डदान का क्षेत्र विस्तृत है। माता-पिता, पितामह, प्रपितामह तथा उनसे पूर्व की पीढ़ियाँ उस वंश-परम्परा का अंग हैं, जिसके माध्यम से वर्तमान मनुष्य अपने अस्तित्व को प्राप्त करता है। मनुष्य जब अपने अस्तित्व की ओर गहरायी से देखता है, तब एक स्वाभाविक जिज्ञासा जन्म लेती है जिस जीवन, ज्ञान, प्रकृति और संस्कार का हम आज उपभोग कर रहे हैं, उसके प्रति हमारा दायित्व क्या है? पितृऋण इसी अस्तित्वगत सम्बन्ध की अनुभूति है। स्रोतों में पितृऋण के साथ देवऋण और ऋषिऋण का भी उल्लेख मिलता है। ‘जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिरृणवा जायते’ कृष्णयजुर्वेद, तैत्तरीय संहिता 6.3.10.5। ब्राह्मणादि चारों वर्ण जन्म लेते ही ऋषि ऋण, देव ऋण और पितृ ऋण से युक्त हो जाते हैं। आधुनिक मनुष्य अपनी उपलब्धियों का श्रेय प्रायः स्वयं को देता है। भारतीय दृष्टि उसे स्मरण कराती है कि उसका जीवन असंख्य पूर्ववर्ती प्रयत्नों की परिणति है। जिस भाषा में वह सोचता है, जिन संस्कारों में वह बड़ा होता है, जिन सामाजिक संस्थाओं का लाभ उसे मिलता है और जिस ज्ञान-परम्परा का वह उत्तराधिकारी है, उनके पीछे पीढ़ियों की साधना निहित है। पितृपक्ष
क्या है और श्राद्ध किसके लिये किया जाता है क्या पितृपक्ष वह विशिष्ट काल है जिसमें पितरों का स्मरण किया जाता है और श्राद्ध वह विधि है जिसके माध्यम से उस स्मरण को कर्मरूप प्रदान किया जाता है? अथवा इन दोनों के सम्बन्ध को इससे भी व्यापक धरातल पर समझना होगा?
वास्तव में पितृपक्ष और श्राद्ध परस्पर पूरक हैं पितृपक्ष काल का निर्धारण करता है और श्राद्ध उस काल को कृतज्ञता, तर्पण, स्मरण तथा दायित्व के संस्कार से सार्थक करता है। पितृपक्ष श्राद्ध के लिये उपयुक्त काल प्रदान करता है, जबकि श्राद्ध पितृपक्ष की अन्तर्निहित भावना को अभिव्यक्ति देता है। तथापि श्राद्ध की संकल्पना पितरों तक सीमित नहीं रहती, श्रद्धा से सम्पन्न कर्म देवताओं, ऋषियों, अतिथियों, जीव-जगत तथा समाज के प्रति कृतज्ञता और दायित्व की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनते हैं। ‘श्रद्धा’ शब्द आदर के अर्थ में ‘श्रत्’ से ‘अ’ प्रत्यय होने पर बनता है, जिसका अर्थ है- आस्तिक बुद्धि। ‘सत्यं धीयते यस्याम् सा श्रद्धा’ अर्थात् जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है वह श्रद्धा है। श्राद्ध श्रद्धा से ही व्युत्पन्न है। कहा गया है- ‘श्रद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं तेन निगद्यते’ इसलिये श्राद्ध मृत पूर्वजों की स्मृति से आगे बढ़कर अपने अस्तित्व के मूल स्रोतों के प्रति कृतज्ञता का संस्कार बन जाता है। वर्तमान में दूर दराज के क्षेत्रों में भी जन्मदिन मनाने का प्रचलन बहुत शीघ्रता से बढ़ता जा रहा है परन्तु प्राचीन काल से ही भारतीय परम्परा में पितृगणों को आश्विन मास का एक कृष्णपक्ष समर्पित किया गया है जिसमें जिस तिथि को पूर्वजों का देहावसान हुआ रहता है उसी तिथि को श्राद्ध क्रिया कर पिण्डदान करने का विधान सदियों से चला या रहा है। स्मृतियों में श्राद्ध करने, ब्राह्मण भोजन कराने एवं दानादि क्रिया का विधान बहुत ही सुगमता से परिभाषित किया गया है। स्मृतियों में तो यहाँ तक कहा गया है कि देवकार्य में दो और पितृकार्य में तीन अथवा दोंनो में एक-एक ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये अत्यन्त धनी होने पर भी श्राद्धकर्म में अधिक विस्तार नहीं करना चाहिये- द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा भोजयेत्सुसमृद्धोपि न प्रसज्जेत विस्तरे। इस प्रकार श्राद्धविधान में बाह्य आडम्बर की अपेक्षा भाव, श्रद्धा और कर्तव्यचेतना को प्रधानता प्रदान की गयी है। श्राद्ध का प्रयोजन पदार्थों की विपुलता में नहीं, उस अन्तःभाव में प्रतिष्ठित है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता अनुभव करता है। यही कृतज्ञता धीरे धीरे उसकी चेतना का विस्तार करती हुई उसे अपने अस्तित्व के व्यापक आधारों से परिचित कराती है। पितरों का स्मरण उसे अपनी वंशपरम्परा से जोड़ता है, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता उसे जीवन के मूल स्रोतों का बोध कराती है, जीवों के लिये अन्न की व्यवस्था उसके भीतर सह-अस्तित्व की भावना जगाती है और दान तथा सेवा उसे समाज के प्रति अपने दायित्व से परिचित कराते हैं। इस प्रकार श्राद्ध की चेतना परिवार की सीमा में स्थिर नहीं रहती; वह क्रमशः पूर्वजों से प्रकृति तक, प्रकृति से जीव-जगत तक और जीव-जगत से सम्पूर्ण समाज तक विस्तृत होती चली जाती है। मनुष्य अनुभव करता है कि उसका जीवन अनेक अदृश्य सम्बन्धों से निर्मित है उसके पीछे पूर्वजों की परम्परा है, चारों ओर प्रकृति का संरक्षण है, सहचर रूप में असंख्य जीव हैं और उसके जीवन को अर्थ प्रदान करने वाला समाज है। इस बोध से उत्पन्न कृतज्ञता ही उसके आचरण को संस्कारित करती है। इस प्रकार श्राद्ध स्मृति को चेतना में, चेतना को कृतज्ञता में और कृतज्ञता को प्रकृति-सम्मत, जीव-हितकारी तथा समाजोपयोगी आचरण में रूपान्तरित करने वाली सनातन जीवन पद्धति के रूप में सामने आता है।
विभिन्न देशों में अलग-अलग नाम

भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य भी देश ऐसे हैं जो भारतीय परम्परा की तरह भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार सातवें महीने में ही पितृपक्ष मनाते हैं विभिन्न देशों में इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है यथा श्रीलंका में मटकादान्य, कम्बोडिया में पिक्मबेन, सिंगापुर में घोस्ट फेस्टिवल, वियतनाम में तेतत्रुगन्गुयेन इत्यादि। अधिकांश देश अपने यहाँ त्योहार की तरह इसे मनाते हैं। विश्व के विभिन्न देशों में पितृ-स्मरण से जुड़ी इन परम्पराओं की व्यापकता यह संकेत देती है कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मृति और पारिवारिक उत्तरदायित्व किसी भूभाग की भावना नहीं, मानव सभ्यता की गहरी सांस्कृतिक अनुभूति है। भारतीय परम्परा में यह भावना पितृपक्ष और श्राद्ध के रूप में एक सुव्यवस्थित सुव्यवास जीवन-दृष्टि का स्वरूप ग्रहण करती है, है, भारतीय चिन्तन चिन्तन में में मनुष्य को एक स्वतन्त्र और पृथक सत्ता के रूप में न देखकर एक दीर्घ वंशपरम्परा की कड़ी के रूप में देखा गया है। आधुनिक आनुवंशिकी के अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने पूर्वजों से आनुवंशिक सामग्री प्राप्त करता है और उसके शारीरिक गुणों, जैविक संरचना तथा कुछ प्रवृत्तियों में पूर्ववर्ती पीढ़ियों का योगदान विद्यमान रहता है। मनुष्य के व्यक्तित्व-निर्माण में उसकी पारिवारिक स्मृति, पूर्वजों की कथाएँ, पारिवारिक मूल्य और सांस्कृतिक विरासत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पूर्वजों का स्मरण व्यक्ति को अपने अस्तित्व की ऐतिहासिकता का बोध कराता है और उसके भीतर यह भावना विकसित करता है कि वर्तमान जीवन अनेक पूर्ववर्ती पीढ़ियों के श्रम, त्याग, संस्कार और अनुभवों का परिणाम है। आधुनिक सकारात्मक मनोविज्ञान में भी कृतज्ञता को व्यक्ति के मानसिक कल्याण, सकारात्मक भावनाओं और सामाजिक सम्बन्धों के लिए उपयोगी माना गया है। पितृपक्ष परिवार की विभिन्न पीढ़ियों को एकत्रित करता है और पारिवारिक इतिहास, वंशपरम्परा तथा पूर्वजों के जीवन से नयी पीढ़ी का परिचय कराता है। आधुनिक समय में संयुक्त परिवारों के विघटन, तीव्र नगरीकरण और जीवन-शैली के परिवर्तन के कारण पारिवारिक स्मृतियों के क्षीण होने की सम्भावना बढ़ी है, ऐसे परिवेश में पितृ-स्मरण जैसी परम्पराएँ सांस्कृतिक निरन्तरता के संरक्षण का कार्य कर सकती हैं।
पितृपक्ष का सामाजिक सरोकार
श्राद्ध में अन्नदान, अतिथि सत्कार और भोजन-वितरण की परम्परा भी सामाजिक दृष्टि से उल्लेखनीय है। श्राद्ध-परम्पराओं में पक्षियों एवं अन्य जीवों को भोजन देने की प्रथा को जैव-विविधता और सह-अस्तित्व की सांस्कृतिक चेतना के सन्दर्भ में देखा जा सकता है। यह काल सामान्यतः वर्षा ऋतु के अवसान और शरद् ऋतु के आरम्भ से सम्बद्ध होता है। भारतीय परम्परा में ऋतु के अनुसार आहार-विहार तथा जीवनचर्या में परिवर्तन का विशेष महत्त्व रहा है। अतः पितृपक्ष में प्रचलित आहार-विधियों का अध्ययन आयुर्वेद की ऋतुचर्या, भारतीय आहार-संस्कृति और आधुनिक पोषण-विज्ञान के तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में किया जा सकता है। इस प्रकार पितृपक्ष को यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए तो यह केवल मृत पूर्वजों के लिये किया जाने वाला धार्मिक कर्म नहीं है, वरन् यह मनुष्य को उसके जैविक वंश, पारिवारिक इतिहास, सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक उत्तरदायित्व और प्राकृतिक परिवेश से जोड़ने वाली बहुआयामी परम्परा है। इसकी वैज्ञानिकता का वास्तविक आधार किसी अलौकिक प्रक्रिया की प्रयोगशाला-सिद्धि में न खोजकर उसके द्वारा निर्मित मानवीय चेतना और सामाजिक व्यवहार में देखा जाना चाहिये।