राम मन्दिर आन्दोलन के शिल्पकार अशोक सिंघल

राम मन्दिर आन्दोलन के शिल्पकार अशोक सिंघल
राम मन्दिर आन्दोलन के शिल्पकार अशोक सिंघल

राम मन्दिर आन्दोलन के शिल्पकार अशोक सिंघल

सामाजिक जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव किसी पद, चुनाव या सत्ता से नहीं, बल्कि उनके विचार, संगठन क्षमता और दीर्घकालिक संकल्प से दिखायी देता है। अशोक सिंघल ऐसा ही एक नाम था। राम जन्मभूमि आन्दोलन में उनका नाम केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में दर्ज है जिसने सन्त समाज, संगठन और सामान्य हिन्दू समाज को एक व्यापक अभियान से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।


अशोक सिंघल का जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस परम्परा का उदाहरण था, जिसमें व्यक्ति अपने निजी जीवन से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिये अपना जीवन समर्पित करता है। वे 1942 में संघ से जुड़े और आगे चलकर प्रचारक बने। उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संगठन का कार्य करने के बाद दिल्ली हरियाणा में भी उन्होंने जिम्मेदारी सम्भाली। 1980 के दशक में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद के कार्य में लगाया गया और वे शीघ्र ही उसके प्रमुख संगठनकर्ताओं में शामिल हो गये।


धर्म संसद से राम जन्मभूमि तक

राम जन्मभूमि आन्दोलन में अशोक सिंघल की भूमिका को समझने के लिये 1984 की धर्म संसद से शुरुआत करनी होगी। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित पहली धर्म संसद में देशभर के सन्तों और धार्मिक नेतृत्व को एक मंच पर लाने का प्रयास हुआ। सिंघल इस आयोजन के प्रमुख संगठनकर्ताओं में थे। यही वह दौर था जब राम जन्मभूमि का प्रश्न एक संगठित सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान का रूप लेने लगा। इसके बाद आन्दोलन केवल बैठकों और प्रस्तावों तक सीमित नहीं रहा। राम-जानकी रथ यात्रा, शिला पूजन, जनसभाएँ और सन्त सम्मेलनों के माध्यम से राम जन्मभूमि का विषय देश के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुँचाया गया। सिंघल अशोक इस व्यापक संगठनात्मक अभियान के प्रमुख चेहरों में रहे। समकालीन विवरणों में 1985 की राम-जानकी रथ यात्रा और आगे राम जन्मभूमि के ताले खुलवाने तथा मन्दिर निर्माण के अभियान में उनकी सक्रिय भूमिका दर्ज है।


प्रयाग की धर्म संसद और आन्दोलन का राष्ट्रीय विस्तार

राम मन्दिर आन्दोलन के इतिहास में प्रयाग का अध्याय विशेष महत्व रखता है। जनवरी 1989 में महाकुंभ के अवसर पर प्रयाग में विश्व हिन्दू परिषद की तृतीय धर्म संसद आयोजित हुई। विहिप के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें लगभग 3,000 सन्त-महन्त, धर्माचार्य और धर्मगुरु शामिल हुए तथा अशोक सिंघल ने उद्घाटन भाषण दिया। इसी धर्म संसद में श्रीराम मन्दिर का मॉडल स्वीकार किया गया और अयोध्या के प्रश्न को उत्तर प्रदेश से बाहर निकालकर देशव्यापी अभियान बनाने की दिशा तय हुई। देश के गाँवों तक श्रीराम शिलाएँ पहुंचाने और शिलान्यास से जुड़े कार्यक्रमों की घोषणा भी इसी क्रम में हुई।

यही वह पड़ाव था, जहाँ प्रयाग की सन्त परम्परा और राम जन्मभूमि आन्दोलन का व्यापक संगठनात्मक अभियान एक-दूसरे से जुड़ा। बाद के वर्षों में प्रयाग राम मन्दिर आन्दोलन के प्रमुख धार्मिक-सामाजिक केन्द्रों में बना रहा।


शिला पूजन से कारसेवा तक

राम मन्दिर आन्दोलन की सबसे बड़ी विशेषता उसका जनसम्पर्क था। गाँव-गाँव से रामशिलाएँ अयोध्या पहुँचाने का अभियान चलाया गया। शिला पूजन ने मन्दिर निर्माण को केवल नेताओं या सन्तों का विषय न रखकर सामान्य जोड़ दिया। इसके बाद कारसेवा आन्दोलन का श्रद्धालुओं की भागीदारी से महत्वपूर्ण चरण बनी। 1990 में कारसेवा के दौरान अयोध्या में बड़ी संख्या में लोग पहुँचे। इस पूरे दौर में अशोक सिंघल आन्दोलन के प्रमुख चेहरों में थे।

1991 की धर्म संसद में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। विश्व हिन्दू परिषद के आधिकारिक विवरण के अनुसार अप्रैल 1991 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित धर्म संसद में लगभग 4,000 सन्त-महन्त शामिल हुए और अशोक सिंघल ने उद्घाटन भाषण दिया।


“जय श्रीराम” और जनचेतना

14 राम जन्मभूमि आन्दोलन के साथ “जय श्रीराम” का उद्घोष व्यापक रूप से जुड़ा। समय के साथ यह आन्दोलन की पहचान बन गया। बाद के वर्षों में यह उद्घोष भारत के सार्वजनिक जीवन में भी व्यापक रूप से दिखायी देने लगा। भारतीय जनमानस में राम के प्रति श्रद्धा तो सदियों पुरानी थी, लेकिन राम जन्मभूमि आन्दोलन ने “जय श्रीराम” को एक व्यापक सार्वजनिक उद्घोष के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अशोक सिंघल की भूमिका केवल किसी एक नारे को लोकप्रिय बनाने की नहीं थी। उनका बड़ा कार्य था- सन्तों की शक्ति, संगठन की क्षमता और सामान्य समाज की भागीदारी को एक साझा अभियान में जोड़ना।


1992 : निर्णायक व विवादित अध्याय

अक्टूबर 1992 में आयोजित धर्म संसद में भी अशोक सिंघल ने उद्घाटन भाषण दिया। विश्व हिन्दू परिषद के अनुसार इस धर्म संसद में लगभग 5,000 सन्त शामिल हुए और 6 दिसम्बर 1992 से अयोध्या में निरन्तर कारसेवा प्रारम्भकरने का निर्णय लिया गया। 6 दिसम्बर 1992 भारतीय इतिहास का अत्यन्त विवादित और निर्णायक दिन बना। उस दिन बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। अशोक सिंघल उस आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में थे और कारसेवा के व्यापक अभियान में उनकी केन्द्रीय भूमिका थी। घटना की राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी व्याख्याएँ अलग-अलग रही हैं। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में राम जन्मभूमि आन्दोलन से जुड़े संगठनों की भूमिका और संगठनात्मक ढाँचे पर विस्तार से चर्चा की गयी है इसलिये अशोक सिंघल की सन्दर्भ को देखना आवश्यक है। भूमिका को समझते समय इस पूरे ऐतिहासिक सन्दर्भ को देखना आवश्यक है।


आन्दोलन से न्यायालय तक

1992 के बाद राम जन्मभूमि का प्रश्न लम्बे समय तक न्यायिक और राजनीतिक विमर्श का विषय बना रहा। आन्दोलन की दिशा भी बदली। मन्दिर निर्माण का प्रश्न न्यायालय, वार्ता और सार्वजनिक अभियान तीनों स्तरों पर चलता रहा।

अशोक सिंघल 17 नवम्बर 2015 को इस संसार से विदा हुए। वे अयोध्या में भव्य राम मन्दिर का पूर्ण निर्माण अपनी आँखों से नहीं देख सके लेकिन जिस आन्दोलन को उन्होंने दशकों तक संगठन और सन्त समाज के माध्यम से आगे बढ़ाया, उसकी यात्रा उनके निधन के बाद भी जारी रही।

9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर अपना निर्णय दिया। इसके बाद मन्दिर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। 5 अगस्त 2020 को भूमि पूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई।


अधूरे संकल्प से पूर्ण हुए स्वप्न तक

अधूरे संकल्प से पूर्ण हुए स्वप्न तक

अशोक सिंघल का जीवन इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके जीवन का बड़ा हिस्सा राम जन्मभूमि आन्दोलन के संगठनात्मक विस्तार में लगा। उन्होंने सन्त समाज को जोड़ा, धर्म संसदों को आन्दोलन की दिशा तय करने का मञ्च बनाया, जनसम्पर्क अभियानों को विस्तार दिया और राम मन्दिर के प्रश्न को देशव्यापी विमर्श तक पहुँचाने में भूमिका निभायी।

उनका योगदान केवल अयोध्या तक सीमित नहीं था। विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से हिन्दू समाज और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों को देश के बाहर भी उठाया गया। इस कारण अशोक सिंघल का नाम भारत के बाहर बसे हिन्दू समाज के बीच भी जाना गया।

राम मन्दिर की यात्रा किसी एक व्यक्ति की यात्रा नहीं थी। इसमें सन्तों, साधु-सन्त परम्पराओं, संगठनों, कार्यकर्ताओं और करोड़ों श्रद्धालुओं की अलग-अलग भूमिकाएँ रहीं। लेकिन इस दीर्घ यात्रा के प्रमुख संगठनकर्ताओं में अशोक सिंघल का स्थान अलग दिखायी देता है। अशोक सिंघल को केवल राम मन्दिर आन्दोलन का नेता कहना
उनके योगदान को सीमित कर देना होगा। वे संघ के प्रचारक, विश्व हिन्दू परिषद के संगठनकर्ता, सन्त समाज के समन्वयक राम जन्मभूमि आन्दोलन के प्रमुख शिल्पकारों में से एक थे। 1984 की धर्म संसद से लेकर 1989 की प्रयाग धर्म संसद, रामशिला पूजन से और लेकर कारसेवा, 1991-92 की धर्म संसदों से लेकर अयोध्या आन्दोलन के निर्णायक दौर तक उनका जीवन इस अभियान के साथ जुड़ा रहा। आज अयोध्या में श्रीराम का भव्य मन्दिर खड़ा है। यह निर्माण अनेक दशकों के सामाजिक, धार्मिक, संगठनात्मक और न्यायिक घटनाक्रम का परिणाम है। उस लम्बी यात्रा में अशोक सिंघल का योगदान एक ऐसे संगठनकर्ता का है, जिसने राम जन्मभूमि के प्रश्न को सन्त समाज और व्यापक हिन्दू समाज की चेतना से जोड़ने में अपना जीवन लगा दिया। उनका जीवन इस विचार का उदाहरण बनकर सामने आता है कि व्यक्ति से बड़ा उद्देश्य होता है, पद से बड़ा संगठन और जीवन से बड़ा वह संकल्प, जिसे कोई व्यक्ति समाज के लिये अपना बना ले।

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