देवी ललिता त्रिपुर सुन्दरी

देवी ललिता त्रिपुर सुन्दरी
देवी ललिता त्रिपुर सुन्दरी

देवी ललिता त्रिपुर सुन्दरी

चतुर्दश भुवनों में विद्यमान असंख्य जीवों की जननी देवी ललिता ही हैं। ललिता सहस्रनाम स्तोत्र के प्रथम श्लोक में भी प्रायः इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है

ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी।
चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता ॥

अर्थात् देवी ललिता समस्त जीवों की माता तथा जगत् की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। वे चैतन्यरूप अग्निकुण्ड से प्रकट होकर देवकार्य के लिये उद्यत होती हैं तथा पद्मपुराण के पातालखण्ड में श्रीकृष्ण नारद से कहते हैं-

या दुर्गा सैव ललिता ललिता सैव राधिका।
एतासामन्तरं नास्ति सत्यं सत्यं हि नारद ॥

अर्थात् दुर्गा, ललिता और राधिका में वस्तुतः कोई भेद नहीं है। इस प्रकार विभिन्न नामों और रूपों में पूजित होने पर भी देवी-शक्ति का तत्त्व एक ही माना गया है। शक्ति और उसकी उपासना का महत्त्व सनातन वैदिक आर्य हिन्दू धर्म में जितना है, उतना शायद ही कहीं अन्यत्र इसकी कल्पना भी की गयी होगी। इसीलिये शायद आचार्य शङ्कर ने अपने प्रसिद्ध माया पञ्चकम् में माया के स्वरूप को स्वीकार किया है। वे कहते हैं-

निरुपमनित्यनिरंशकेऽप्यखण्डे मयि चिति सर्वविकल्पनादिशून्ये ।
घटयति जगदीशजीवभेदं त्वघटितघटनापटीयसी माया ॥ १॥

अर्थात् माया अपनी ऐसी अद्भुत एवं अनिर्वचनीय शक्ति के द्वारा, जो अघटित को भी घटित करने में समर्थ है, अखण्ड चैतन्य में जीव, जगत् और ईश्वर के भेद की प्रतीति करा देती है। इस प्रकार आचार्य शङ्कर के अद्वैत वेदान्त में भी माया-शक्ति के माध्यम से शक्ति-तत्त्व की एक विशिष्ट दार्शनिक व्याख्या प्राप्त होती है।
शक्ति और उसकी उपासना का महत्त्व सनातन वैदिक आर्य हिन्दू धर्म में अत्यन्त व्यापक है। भारतीय चिन्तन में नारी को केवल परिवार की एक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति, सृजन, करुणा, ज्ञान और संस्कार की आधारभूत सत्ता के रूप में देखा गया है। इसी व्यापक दृष्टि के कारण देवी-उपासना भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग बनी रही है।

इसी शक्ति-तत्त्व को सामाजिक जीवन से जोड़कर देखने पर मनुस्मृति का प्रसिद्ध वचन विशेष रूप से उल्लेखनीय हो जाता है। मनुस्मृति के तृतीय अध्याय में कहा गया है

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥

अर्थात् जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न होकर निवास करते हैं; और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ किये गये समस्त धार्मिक कर्म निष्फल हो जाते हैं। जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखी रहती हैं, उस कुल का शीघ्र विनाश हो जाता है; और जिस कुल में वे दुःखी नहीं होतीं, वह निरन्तर उन्नति करता है।

मनुस्मृति का यह कथन भारतीय सामाजिक चिन्तन में नारी के महत्त्व को रेखांकित करने वाला अत्यन्त प्रसिद्ध सूत्र है। यहाँ नारी-सम्मान को केवल व्यक्तिगत सदाचार का विषय न मानकर परिवार, कुल और सामाजिक समृद्धि से सम्बद्ध किया गया है। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः की भावना यह स्पष्ट करती है कि जिस समाज में स्त्री का सम्मान, सुरक्षा और गरिमा बनी रहती है, वहाँ धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन भी सार्थक माना जाता है। एक ओर भारतीय परम्परा में ललिता, दुर्गा, राधिका आदि देवी-स्वरूपों में स्त्री को दिव्य शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक जीवन में स्त्री के सम्मान को परिवार और समाज की उन्नति से जोड़ा गया है। इस प्रकार देवी की उपासना केवल मन्दिर अथवा धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर दैनिक जीवन में नारी के प्रति सम्मान और मर्यादा के रूप में भी अभिव्यक्त होती है।

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ललिता पञ्चमी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस तिथि को भगवती स्कन्दमाता की भी आराधना की जाती है तथा साथ ही ललिता पञ्चमी व्रत का विधान है। इस अवसर पर भगवती सती के ललिता स्वरूप की विशेष रूप से उपासना की जाती है। भगवती ललिता को त्रिपुरसुन्दरी, षोडशी, राजराजेश्वरी तथा श्रीविद्या आदि नामों से अभिहित किया जाता है। शाक्त परम्परा में उन्हें दशमहाविद्याओं में तृतीय महाविद्या के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ललिता पञ्चमी का यह व्रत ‘उपाङ्ग ललिता व्रत’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस व्रत एवं देवी-उपासना का विशेष प्रचलन गुजरात तथा महाराष्ट्र में देखने को मिलता है। इस पावन दिवस पर श्रद्धालु भगवती ललिता अथवा त्रिपुरसुन्दरी देवी का विधिपूर्वक पूजन-अर्चन करते हैं। देवी को पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित कर उनकी आराधना की जाती है तथा उनसे सौभाग्य, ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि एवं आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना की जाती है।

इस प्रकार ललिता पञ्चमी केवल एक व्रत या धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि आदिशक्ति की आराधना, नारी-शक्ति के सम्मान तथा भारतीय शाक्त परम्परा की गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत का स्मरण कराने वाला महत्त्वपूर्ण पर्व है। ललिता पञ्चमी के पावन अवसर पर भगवती श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी के चरणों में प्रार्थना है कि वे समस्त प्राणियों में ज्ञान, सद्बुद्धि, श्रद्धा, करुणा और धर्मभाव का प्रकाश करें तथा सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करें

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

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