क्या महिलाओं को अभी भी संघर्ष करना होगा ?

क्या महिलाओं को अभी भी संघर्ष करना होगा ?

क्या महिलाओं को अभी भी संघर्ष करना होगा ? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नारी को सदैव शक्ति, सृजन और संस्कार का प्रतीक माना गया है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ का आदर्श हमारे समाज की आत्मा में बसता है। फिर भी वास्तविकता यह है कि महिलाओं को आज भी अपने सम्मान और समान…

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पितृपक्ष और उसका महत्व

पितृपक्ष और उसका महत्व

पितृपक्ष और उसका महत्व पितृपक्ष… क्या आपने कभी सोचा है कि वर्ष में एक ऐसा पक्ष क्यों आता है, जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके लिए तर्पण करते हैं और श्राद्ध करते हैं? क्या यह केवल हजारों वर्षों से चली आ रही कोई धार्मिक परम्परा है, या इसके पीछे भी कोई कारण…

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सरदार भगत सिंह का राष्ट्र चिन्तन

सरदार भगत सिंह का राष्ट्र चिन्तन

सरदार भगत सिंह का राष्ट्र चिन्तन सरदार भगत सिंह भारत, भारतीयता और संराष्ट्रभाव के सम्वाहक थे। राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत भगत सिंह भारतीय ज्ञान, दर्शन और अध्यात्म से प्रेरित थे। श्रीमद्भगवत गीता, वेदों का ज्ञान, भगत सिंह की लेखनी और व्यवहार दोनों में परिलक्षित होता है। हालाँकि कुछ मार्क्सवादी इतिहासकार आलोचक और चिन्तकों ने यह…

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पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा

पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा

पितृपक्ष की व्यवहारिक परम्परा मनुष्य जब अपने अस्तित्व की ओर दृष्टि डालता है, तब उसके सम्मुख एक स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है मैं कहाँ से आया हूँ? शंकराचार्य कहते हैं कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः… इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य को अपने माता-पिता तक ले जाता है। माता-पिता से पूर्व वह अपने पितामह और मातामह तक…

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दीनदयाल उपाध्याय जी जयन्ती

दीनदयाल उपाध्याय जी जयन्ती

दीनदयाल उपाध्याय जी जयन्ती लोकमत परिष्कार : दीनदयाल उपाध्याय जी और वर्तमान संदर्भ लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकमत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव, राजनीतिक दलों और सरकारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज का सामान्य नागरिक देश, समाज और अपने दायित्वों…

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वामनावतार : शक्ति का संस्कार

वामनावतार : शक्ति का संस्कार

वामनावतार : शक्ति का संस्कार भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक चेतनत्त्व पटल पर भगवान वामन का स्वरूप केवल दशावतार रूपी परम्परा में एक धार्मिक दृष्टि तक ग्रहण करना उनके व्यक्तित्व की व्यापकता एवं विराटता को सीमित कर देना प्रतीत होता है। वामन अनुकृति के अन्तर्गत भारतीय मनीषियों ने स्व मेधा से सत्ता, सामर्थ्य, विनम्रता, आत्मसंयम एवं लोककल्याण…

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भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारत माता मन्दिर की संकल्पना

भारत माता मन्दिर की संकल्पना भारतीय सनातन परम्परा में संन्यास का उदेश्य बनविता याला की साधना का साथ-साथ लोक-कल्याण और राष्ट्र-धर्म का सम्वर्धन रहा है। आधुनिक युग में इस संन्यासी परम्परा को राष्ट्र-साधना के दिव्य अनुष्ठान में रूपान्तरित करने वाले मूर्धन्य मनीषियों में पद्मभूषण पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज का नाम अग्रगण्य है। स्वामी…

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सनातन धर्म संस्कृति के रक्षक : गुग्गा जाहरवीर

सनातन धर्म संस्कृति के रक्षक : गुग्गा जाहरवीर

सनातन धर्म संस्कृति के रक्षक : गुग्गा जाहरवीर भारत के इतिहास में ऐसे अनेक योद्धा हुए जिन्होंने अपने धर्म एवं संस्कृति की रक्षा में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।ऐसे वीर योद्धाओं की विजय गाथा के किस्से आज भी हमारे समाज में लोकगीतों के माध्यम से गाए जाते हैं। ऐसे ही वीर योद्धा थे, ‘राणा गोगा…

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आत्मनिर्भर भारत * हिंदी भाषा का योगदान

आत्मनिर्भर भारत * हिंदी भाषा का योगदान

आत्मनिर्भर भारत * हिंदी भाषा का योगदान हिं दी भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है अपितु यह भारत की आत्मा, संस्कृति और सामाजिक चेतना से जुड़ी भाषा है। यह करोड़ों भारतीयों को आपस में जोड़‌ने वाली भाषा है। आज जब भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है तब हिंदी सहित भारतीय भाषाओं…

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150 बार भारत आया विदेशी, बोलता है धाराप्रवाह हिन्दी-भोजपुरी

150 बार भारत आया विदेशी, बोलता है धाराप्रवाह हिन्दी-भोजपुरी

150 बार भारत आया विदेशी, बोलता है धाराप्रवाह हिन्दी-भोजपुरी 14 सितम्बर को मनाया जाने वाला हिन्दी दिवस केवल हिन्दी के उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय भाषायी विविधता, सांस्कृतिक सह-अस्तित्व और अपनी भाषायी विरासत पर विचार करने का दिन भी है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिन्दी को संघ की…

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