स्वामी विवेकानन्द : नर-सेवा ही नारायण-सेवा का मूर्त स्वरूप

स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द : नर-सेवा ही नारायण-सेवा का मूर्त स्वरूप

सदियों से हमारे उपनिषद् हमें ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का सन्देश देते आ रहे हैं। परन्तु समय के साथ इस अगाध ज्ञान का व्यावहारिक रूप कहीं लुप्त सा हो गया था। धर्म केवल कर्मकांडों एवं छुआछूत तक सीमित रह गया था। ऐसे काल में बंगाल की धरती पर स्वामी विवेकानन्द का प्रादुर्भाव हुआ। स्वामी जी ने वेदांत एवं उपनिषद् के कठिन सिद्धान्तों को जंगलों और गुफाओं से निकालकर समाज में प्रसारित किया। स्वामी जी ने मूलमन्त्र दिया- ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है” अर्थात् प्रत्येक मानव में ईश्वर के अंश को देखना और उसकी निःस्वार्थ सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। स्वामी जी ने इस विचार को मात्र प्रचारित ही नहीं किया अपितु वे स्वयं इस विचार के मूर्त स्वरूप थे।

सेवा शब्द का सामान्य अर्थ है कि किसी की सहायता करना या किसी के दुःखों को दूर करने का प्रयास करना। भारतीय दर्शन में सेवा को केवल एक सामाजिक कर्त्तव्य नहीं, अपितु आत्मविकास का साधन माना गया है। सामान्यतः लोग भूखों को अन्न दान देना, प्यासे को पानी देना, बीमार का इलाज कराना को ही सेवा मानते हैं परन्तु समाज के कमजोर वर्ग की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करना उसका पहला चरण है। परन्तु इससे भी एक सोपान ऊपर है आध्यात्मिक सेवा। यह मनुष्य को दुःखों से हमेशा के लिए मुक्ति दिलाती है। इसके अंतर्गत अज्ञानी को शिक्षा देना, चरित्र-निर्माण एवं उसके अन्दर आत्मविश्वास को जगाना, जिससे वह अपने दुःखों से स्वयं लड़ने में सक्षम हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द की सेवा की अवधारणा पारंपरिक शब्द जैसे दया, दान या परोपकार की भावना से बिलकुल अलग थी। इस विचार की जड़ें उन्हें अपने गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के एक छोटे से वाक्य में मिली थी। एक बार श्री रामकृष्ण ने भाव-समाधि में कहा था ‘जीवों पर दया ? तुम्हारी क्या बिसात कि तुम ईश्वर के जीवों पर दया करो ? दया नहीं, अपितु “शिव भावे, जीव सेवा (अर्थात् प्रत्येक जीवात्मा को शिव समझकर उसकी सेवा करो।) स्वामी जी बताते हैं कि “जिस मनुष्य की आप सहायता करते हैं, उसके प्रति कृतज्ञ रहिये। उसे ईश्वर मानिए। क्या यह एक महान सौभाग्य नहीं है कि हमें अपने साथी मनुष्यों की सहायता करके ईश्वर की पूजा करने का अवसर मिला है? इसी बात को आगे बढ़ाते हुए स्वामी जी अपने व्याख्यान व्यावहारिक वेदांत में बताते हैं कि “यह मेरा ईश्वर है जो दरिद्रों में, मूखों में, बीमारों में तथा दुखियों में वास करता है। जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं, वास्तव में वह साक्षात् नारायण है तथा मैं ऐसे ही दरिद्र नारायण की सेवा करना चाहता हूँ।”
स्वामी विवेकानन्द ने मात्र ऊँचे सिद्धांतों के उपदेश नहीं दिए अपितु जब कभी देश और मानवता पर संकट आया, वह आगे खड़े दिखायी दिए। १८६८-६६ में बंगाल में जब महामारी फैली तब प्लेग से लोग कीड़ों-मकोड़ों की तरह मरने लगे। उस समय प्लेग एक बेहद संक्रामक रोग था, जिसके भय से लोग अपने सगे सम्बन्धियों तक को छोड़कर भाग रहे थे। उस समय स्वामी जी द्वारा स्थापित संस्था रामकृष्ण मठ एवं मिशन की स्थापना हुए मुश्किल से एक साल ही हुआ था। उनके पास वित्तीय संसाधन भी महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में समाप्त होने लगे थे। स्वामी जी के शिष्यों ने उन्हें बेलूर मठ के लिए जमीन खरीदकर दी थी। इसी बीच स्वामी जी के एक शिष्य ने पूछा कि अब हमारे पास धन भी नहीं बचा है। स्वामी जी बिना हिचकिचाहट के उत्तर देते हैं- ‘यदि आवश्यकता पड़ी, तो हम बेलूर मठ की जमीन बेच देंगे। हम संन्यासी हैं, हम पेड़ के नीचे रह लेंगे और भिक्षा माँगकर जीवनयापन कर लेंगे, लेकिन हम अपने देशवासियों को इस तरह तड़प-तड़प कर मरते हुए नहीं देख सकते।”


बंगाल में प्रथम सेवा कार्य

सौभाग्य से बेलूर मठ की जमीन बेचने की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि स्वामी जी की पुकार सुनकर समाज के समृद्ध लोगों ने दान दिया। स्वामी जी ने तुरंत अपने शिष्य स्वामी सदानंद एवं अपनी शिष्या भगिनी निवेदिता के नेतृत्व में एक ‘प्लेग राहत समिति का गठन किया। इसका घोषणा पत्र स्वामी विवेकानन्द ने बंगाली एवं अंग्रेजी में स्वयं तैयार किया। उसमें लोगों से अपील की गयी कि वह भय का त्याग करें एवं स्वच्छता के नियमों को अपनायें। इस घोषणा पत्र को सम्पूर्ण कलकत्ता में बंटवाया गया।


शिकागो विश्व धर्म संसद में सेवा का शंखनाद

स्वामी विवेकानन्द के लिए “नर सेवा ही नारायण सेवा” के विचार केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं थे, अपितु उन्होंने ११ सितम्बर, १८६३ को अमेरिका के शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद” के वक्तव्य में गर्व के साथ कहा, ‘मुझे एक ऐसे देश से होने पर गर्व है जिसने इस पृथ्वी की सभी प्रताड़ित जातियों और पंथों के शरणार्थियों को आश्रय दिया है।”

स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि जब तक हम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु नहीं होंगे और एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक सच्ची सेवा असंभव है। संकीर्णता एवं कट्टरता मानवता की सबसे बड़ी शत्रु है, जो समाज में हिंसा और दुःख को बढ़ावा देती है। इन दुःखों को दूर करना ही विश्व की सबसे बड़ी सेवा है।

स्वामी जी ने अपने भाषण की श्रृंखला में “कुएँ के मेंढक” की प्रसिद्ध कहानी सुनायी, जिसमें उन्होंने बताया कि किस प्रकार हर सम्प्रदाय का व्यक्ति अपनी छोटी सी दुनिया में बंद और दूसरों को हेय दृष्टि से देखता है। शिकागो प्रवास के दौरान ही एक अन्य सत्र में स्वामी जी ने अत्यंत भावुक होकर कहा कि ‘ईसाई मिशनरीज जो पादरी भारत भेजते हैं, वे वहाँ के लोगों की धर्मान्तरण की चिंता करते हैं, लेकिन भूखे तड़पते हुए लोगों के शरीरों को बचाने की चिंता नहीं करते। इस प्रकार स्वामी जी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी यह स्थापित किया कि मानव जाति की वास्तविक सेवा उसकी बुनियादी, भौतिक और तात्कालिक समस्याओं को दूर करने से ही शुरू होती है रामकृष्ण मठ एवं मिशन की स्थापना
मिशन की स्थापना की जिसका ध्येय वाक्य था ‘आत्मनो मोक्षार्थ स्वामी विवेकानन्द ने 1 मई, १८६७ को रामकृष्ण मठ एवं जगत हिताय च’ अर्थात् अपने मोक्ष के लिए और संसार के हित के लिए। विवेकानन्द का मानना था कि व्यक्तिगत आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) एवं सामाजिक कल्याण (जगत हित) यह दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। यदि आत्मा एक ही है तो दूसरों को दुःख देकर या उनकी उपेक्षा करके कोई मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरों की सेवा करना वास्तव में स्वयं की आत्मा को शुद्ध करना है। संसार के हित के लिए किया गया निःस्वार्थ कार्य (कर्मयोग) ही सबसे बड़ी साधना है।
शिक्षा के क्षेत्र में मिशन द्वारा देश-विदेश में विश्वविद्यालय, सैकड़ों स्कूल एवं दृष्टिबाधित व दिव्यांगों के लिए विशेष विद्यालय चलाये जा रहे हैं। विवेकानन्द सेण्टर फॉर ह्यूमन एक्सीलेंस जैसे आधुनिक कौशल और मूल्य आधारित केन्द्रों की स्थापना की गयी है।
उपसंहार
स्वामी विवेकानन्द हम सबके बीच मात्र ३६ वर्ष रहे (१८६३-१६०२) लेकिन उन्होंने इतने कम समय में समाज को जो सन्देश दिया, वह आज भी हम सबके लिए प्रेरणा है। रामकृष्ण मठ एवं मिशन के बाद समाज में कई ऐसे स्वयंसेवी संगठन शुरू हुए जैसे कि- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विवेकानन्द केंद्र, कन्याकुमारी जो स्वामी जी के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अद्यावधि कार्य कर
रहे हैं। सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

  1. निवेदिता रघुनाथ भिड़े (२०२४), आत्मविकास की ओर, विवेकानन्द केंद्र हिंदी प्रकाशन विभाग जोधपुर।
  2. स्वामी निखिलानन्द (२०१२), विवेकानन्द एक जीवनी, अद्वैत आश्रम ।
  3. स्वामी विवेकानन्द (२०२३), विवेकानन्द साहित्य (तृतीय खंड), अद्वैत आश्रम।
  4. श्री सत्येन्द्रनाथ मजुमदार (२०१४), विवेकानन्द चरित, श्री रामकृष्ण विवेकानन्द साहित्य नागपुर।

स्वामी विवेकानन्द : नर-सेवा ही नारायण-सेवा का मूर्त स्वरूप

सदियों से हमारे उपनिषद् हमें ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का सन्देश देते आ रहे हैं। परन्तु समय के साथ इस अगाध ज्ञान का व्यावहारिक रूप कहीं लुप्त सा हो गया था। धर्म केवल कर्मकांडों एवं छुआछूत तक सीमित रह गया था। ऐसे काल में बंगाल की धरती पर स्वामी विवेकानन्द का प्रादुर्भाव हुआ। स्वामी जी ने वेदांत एवं उपनिषद् के कठिन सिद्धान्तों को जंगलों और गुफाओं से निकालकर समाज में प्रसारित किया। स्वामी जी ने मूलमन्त्र दिया- ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है” अर्थात् प्रत्येक मानव में ईश्वर के अंश को देखना और उसकी निःस्वार्थ सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। स्वामी जी ने इस विचार को मात्र प्रचारित ही नहीं किया अपितु वे स्वयं इस विचार के मूर्त स्वरूप थे।

सेवा शब्द का सामान्य अर्थ है कि किसी की सहायता करना या किसी के दुःखों को दूर करने का प्रयास करना। भारतीय दर्शन में सेवा को केवल एक सामाजिक कर्त्तव्य नहीं, अपितु आत्मविकास का साधन माना गया है। सामान्यतः लोग भूखों को अन्न दान देना, प्यासे को पानी देना, बीमार का इलाज कराना को ही सेवा मानते हैं परन्तु समाज के कमजोर वर्ग की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करना उसका पहला चरण है। परन्तु इससे भी एक सोपान ऊपर है आध्यात्मिक सेवा। यह मनुष्य को दुःखों से हमेशा के लिए मुक्ति दिलाती है। इसके अंतर्गत अज्ञानी को शिक्षा देना, चरित्र-निर्माण एवं उसके अन्दर आत्मविश्वास को जगाना, जिससे वह अपने दुःखों से स्वयं लड़ने में सक्षम हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द की सेवा की अवधारणा पारंपरिक शब्द जैसे दया, दान या परोपकार की भावना से बिलकुल अलग थी। इस विचार की जड़ें उन्हें अपने गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के एक छोटे से वाक्य में मिली थी। एक बार श्री रामकृष्ण ने भाव-समाधि में कहा था ‘जीवों पर दया ? तुम्हारी क्या बिसात कि तुम ईश्वर के जीवों पर दया करो ? दया नहीं, अपितु “शिव भावे, जीव सेवा (अर्थात् प्रत्येक जीवात्मा को शिव समझकर उसकी सेवा करो।) स्वामी जी बताते हैं कि “जिस मनुष्य की आप सहायता करते हैं, उसके प्रति कृतज्ञ रहिये। उसे ईश्वर मानिए। क्या यह एक महान सौभाग्य नहीं है कि हमें अपने साथी मनुष्यों की सहायता करके ईश्वर की पूजा करने का अवसर मिला है? इसी बात को आगे बढ़ाते हुए स्वामी जी अपने व्याख्यान व्यावहारिक वेदांत में बताते हैं कि “यह मेरा ईश्वर है जो दरिद्रों में, मूखों में, बीमारों में तथा दुखियों में वास करता है। जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं, वास्तव में वह साक्षात् नारायण है तथा मैं ऐसे ही दरिद्र नारायण की सेवा करना चाहता हूँ।”
स्वामी विवेकानन्द ने मात्र ऊँचे सिद्धांतों के उपदेश नहीं दिए अपितु जब कभी देश और मानवता पर संकट आया, वह आगे खड़े दिखायी दिए। १८६८-६६ में बंगाल में जब महामारी फैली तब प्लेग से लोग कीड़ों-मकोड़ों की तरह मरने लगे। उस समय प्लेग एक बेहद संक्रामक रोग था, जिसके भय से लोग अपने सगे सम्बन्धियों तक को छोड़कर भाग रहे थे। उस समय स्वामी जी द्वारा स्थापित संस्था रामकृष्ण मठ एवं मिशन की स्थापना हुए मुश्किल से एक साल ही हुआ था। उनके पास वित्तीय संसाधन भी महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में समाप्त होने लगे थे। स्वामी जी के शिष्यों ने उन्हें बेलूर मठ के लिए जमीन खरीदकर दी थी। इसी बीच स्वामी जी के एक शिष्य ने पूछा कि अब हमारे पास धन भी नहीं बचा है। स्वामी जी बिना हिचकिचाहट के उत्तर देते हैं- ‘यदि आवश्यकता पड़ी, तो हम बेलूर मठ की जमीन बेच देंगे। हम संन्यासी हैं, हम पेड़ के नीचे रह लेंगे और भिक्षा माँगकर जीवनयापन कर लेंगे, लेकिन हम अपने देशवासियों को इस तरह तड़प-तड़प कर मरते हुए नहीं देख सकते।”


बंगाल में प्रथम सेवा कार्य

सौभाग्य से बेलूर मठ की जमीन बेचने की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि स्वामी जी की पुकार सुनकर समाज के समृद्ध लोगों ने दान दिया। स्वामी जी ने तुरंत अपने शिष्य स्वामी सदानंद एवं अपनी शिष्या भगिनी निवेदिता के नेतृत्व में एक ‘प्लेग राहत समिति का गठन किया। इसका घोषणा पत्र स्वामी विवेकानन्द ने बंगाली एवं अंग्रेजी में स्वयं तैयार किया। उसमें लोगों से अपील की गयी कि वह भय का त्याग करें एवं स्वच्छता के नियमों को अपनायें। इस घोषणा पत्र को सम्पूर्ण कलकत्ता में बंटवाया गया।


शिकागो विश्व धर्म संसद में सेवा का शंखनाद

स्वामी विवेकानन्द के लिए “नर सेवा ही नारायण सेवा” के विचार केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं थे, अपितु उन्होंने ११ सितम्बर, १८६३ को अमेरिका के शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद” के वक्तव्य में गर्व के साथ कहा, ‘मुझे एक ऐसे देश से होने पर गर्व है जिसने इस पृथ्वी की सभी प्रताड़ित जातियों और पंथों के शरणार्थियों को आश्रय दिया है।”

स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि जब तक हम एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु नहीं होंगे और एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक सच्ची सेवा असंभव है। संकीर्णता एवं कट्टरता मानवता की सबसे बड़ी शत्रु है, जो समाज में हिंसा और दुःख को बढ़ावा देती है। इन दुःखों को दूर करना ही विश्व की सबसे बड़ी सेवा है।

स्वामी जी ने अपने भाषण की श्रृंखला में “कुएँ के मेंढक” की प्रसिद्ध कहानी सुनायी, जिसमें उन्होंने बताया कि किस प्रकार हर सम्प्रदाय का व्यक्ति अपनी छोटी सी दुनिया में बंद और दूसरों को हेय दृष्टि से देखता है। शिकागो प्रवास के दौरान ही एक अन्य सत्र में स्वामी जी ने अत्यंत भावुक होकर कहा कि ‘ईसाई मिशनरीज जो पादरी भारत भेजते हैं, वे वहाँ के लोगों की धर्मान्तरण की चिंता करते हैं, लेकिन भूखे तड़पते हुए लोगों के शरीरों को बचाने की चिंता नहीं करते। इस प्रकार स्वामी जी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी यह स्थापित किया कि मानव जाति की वास्तविक सेवा उसकी बुनियादी, भौतिक और तात्कालिक समस्याओं को दूर करने से ही शुरू होती है रामकृष्ण मठ एवं मिशन की स्थापना
मिशन की स्थापना की जिसका ध्येय वाक्य था ‘आत्मनो मोक्षार्थ स्वामी विवेकानन्द ने 1 मई, १८६७ को रामकृष्ण मठ एवं जगत हिताय च’ अर्थात् अपने मोक्ष के लिए और संसार के हित के लिए। विवेकानन्द का मानना था कि व्यक्तिगत आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) एवं सामाजिक कल्याण (जगत हित) यह दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। यदि आत्मा एक ही है तो दूसरों को दुःख देकर या उनकी उपेक्षा करके कोई मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरों की सेवा करना वास्तव में स्वयं की आत्मा को शुद्ध करना है। संसार के हित के लिए किया गया निःस्वार्थ कार्य (कर्मयोग) ही सबसे बड़ी साधना है।
शिक्षा के क्षेत्र में मिशन द्वारा देश-विदेश में विश्वविद्यालय, सैकड़ों स्कूल एवं दृष्टिबाधित व दिव्यांगों के लिए विशेष विद्यालय चलाये जा रहे हैं। विवेकानन्द सेण्टर फॉर ह्यूमन एक्सीलेंस जैसे आधुनिक कौशल और मूल्य आधारित केन्द्रों की स्थापना की गयी है।
उपसंहार
स्वामी विवेकानन्द हम सबके बीच मात्र ३६ वर्ष रहे (१८६३-१६०२) लेकिन उन्होंने इतने कम समय में समाज को जो सन्देश दिया, वह आज भी हम सबके लिए प्रेरणा है। रामकृष्ण मठ एवं मिशन के बाद समाज में कई ऐसे स्वयंसेवी संगठन शुरू हुए जैसे कि- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विवेकानन्द केंद्र, कन्याकुमारी जो स्वामी जी के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अद्यावधि कार्य कर
रहे हैं। सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

  1. निवेदिता रघुनाथ भिड़े (२०२४), आत्मविकास की ओर, विवेकानन्द केंद्र हिंदी प्रकाशन विभाग जोधपुर।
  2. स्वामी निखिलानन्द (२०१२), विवेकानन्द एक जीवनी, अद्वैत आश्रम ।
  3. स्वामी विवेकानन्द (२०२३), विवेकानन्द साहित्य (तृतीय खंड), अद्वैत आश्रम।
  4. श्री सत्येन्द्रनाथ मजुमदार (२०१४), विवेकानन्द चरित, श्री रामकृष्ण विवेकानन्द साहित्य नागपुर।

शिवम कटारिया

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