
सियारामशरण गुप्त की राष्ट्रीय चेतना
सियारामशरण गुप्त ऐसे समय के कवि थे जब देश स्वतंत्रता संग्राम की तीव्र चेतना से गुजर रहा था। स्वाधीनता की आकांक्षा, पराधीनता की पीड़ा, राष्ट्रीय स्वाभिमान, त्याग, बलिदान और जन-जागरण उनके साहित्य की प्रमुख संवेदनाओं में दिखायी देते हैं। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से भारतीयों के भीतर आत्मगौरव और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य-बोध जगाने का प्रयत्न किया।
‘जागो राम मेरे जीवन में, इस छोटे मन में, सरसो बरसों सर्वदा हरसो इस लघु आँगन में…’ संतकवि सियारामशरण गुप्त की काव्य-संवेदना में ‘लघु आंगन’ केवल व्यक्ति के जीवन का आंगन नहीं, बल्कि उस व्यापक भारतीय जीवन का प्रतीक बन जाता है, जिसमें अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति, अपने जन और अपनी राष्ट्रभूमि के प्रति गहरी आत्मीयता समायी हुई है।
उनके काव्य में राष्ट्रप्रेम कोई बाहरी उद्घोष मात्र नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों और जनमानस से जुड़ी हुई सहज अनुभूति है।
उनकी राष्ट्रीय चेतना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी। उसमें भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था, सामाजिक एकता, मानवीय करुणा और देश के सामान्य जन के जीवन के प्रति संवेदना भी सम्मिलित थी। यही व्यापक दृष्टि सियारामशरण गुप्त को केवल राष्ट्रप्रेम के कवि के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के संवाहक के रूप में स्थापित करती है।
सियारामशरण गुप्त का साहित्य केवल काव्य सौन्दर्य और भावुकता का साहित्य नहीं है, बल्कि उसमें युगबोध, मानवीय संवेदना, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का सशक्त समन्वय दिखाई देता है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर महात्मा गांधी के विचारों का गहरा प्रभाव था।
यही कारण है कि उनके साहित्य में राष्ट्रप्रेम केवल देश की भौगोलिक सीमाओं अथवा राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह मनुष्य की स्वतंत्रता, सामाजिक समता, नैतिक उत्थान और सांस्कृतिक जागरण से जुड़ जाता है। सियारामशरण गुप्त की राष्ट्रीय चेतना को समझने के लिये उनके समय 12 और परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। जिस काल में उन्होंने साहित्य-सृजन किया, वह भारतीय इतिहास में राजनीतिक और सामाजिक जागरण का काल था। देश परतंत्र था, स्वतंत्रता की आकांक्षा जन-जन के भीतर आकार ले रही थी और महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन व्यापक जनचेतना का रूप ग्रहण कर चुका था। ऐसे संक्रमणकाल में गुप्त जी ने अपनी साहित्यिक प्रतिभा को केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति न बनाकर राष्ट्र और समाज के प्रति अपने दायित्व का माध्यम बनाया।
उनकी राष्ट्रीय चेतना का मूल स्वर भारतीय जीवन-मूल्यों में निहित है। वे राष्ट्र को केवल भूमि के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसके भीतर निवास करने वाले मनुष्यों, उनकी पीड़ा, संघर्ष, आशा और आकांक्षाओं को राष्ट्रजीवन का अभिन्न अंग मानते हैं इसीलिये उनके साहित्य में राष्ट्रप्रेम के साथ करुणा, त्याग, सेवा, सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम जैसे मानवीय मूल्यों का निरन्तर आग्रह मिलता है। उनके लिये राष्ट्र की उन्नति तभी सार्थक है, जब समाज का अन्तिम व्यक्ति भी सम्मान और अधिकार के साथ जीवन जी सके। गुप्त जी की राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष गांधीवादी विचारधारा है। गांधी जी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, आत्मबल, त्याग और जनसेवा के आदर्शों ने उनके मन को गहरायी से प्रभावित किया। उन्होंने इन आदर्शों को केवल वैचारिक रूप में स्वीकार नहीं किया, बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें जनमानस तक पहुँचाने का प्रयत्न किया। यही कारण है कि उनके साहित्य में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ साथ नैतिक और आत्मिक स्वतंत्रता की आकांक्षा भी दिखायी देती है। ‘गुप्त जी हिन्दी जगत की उन शान्त मेधावी तथा नम्म आत्माओं में से हैं जो भीतर ही भीतर सुलगते रहते हैं और अपने अहम् को सर्वदा पराजित करके युग में एक शान्त परिवर्तन उपस्थित का दिया करते हैं। वे गद्य और पद्य दोनों में वे तेजस्वी हैं।’
उनकी राष्ट्रीय भावना में सामाजिक चेतना का भी विशेष स्थान है। वे समाज में व्याप्त रुढ़ियों, विषमताओं और कुरीतियों के प्रति संवेदनशील थे। उनके लिये स्वतंत्र भारत का स्वप्न केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति का स्वप्न नहीं था, बल्कि ऐसा समाज निर्मित करने का स्वप्न था जिसमें मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव कम हो, शोषित और वंचित वर्ग को सम्मान मिले तथा समाज नैतिक मूल्यों पर आधारित हो। इस दृष्टि से उनकी राष्ट्रीय चेतना व्यापक और मानवीय बन जाती है। सियारामशरण गुप्त की विशेषता यह है कि उनके यहाँ राष्ट्रप्रेम आक्रोशपूर्ण घोषणाओं की अपेक्षा शान्त, संयमित और सात्त्विक भावभूमि पर विकसित होता है। उनके व्यक्तित्व की विनम्रता और करुणा ही उनकी राष्ट्रीय चेतना की शक्ति बनती है। वे राष्ट्र के प्रति अपने प्रेम को त्याग, सेवा, कर्तव्य और आत्मानुशासन के रूप में अभिव्यक्त करते हैं।
‘सियारामशरण गुप्त को में भारतीय संस्कृति का नहीं बल्कि मानवीय संस्कृति का साहित्यकार मानता हूँ। उनके व्यक्तित्व में सरलता, सहजता, विनयशीलता, करूणा और सात्विकता की जो भावना थी वह उन्होंने अपनी रचनाओं में उडेल दी है। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय का शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार रहा होगा, जिस पर गान्धी के विचारों की छाप न पड़ी हो। लेकिन सियारामशरण गुप्त जी पर यह छाप बहुत गहरे रूप में पड़ी।
– डॉ. शंकरदयाल शर्मा
‘गुप्त जी हिन्दी जगत की उन शान्त मेधावी तथा नम्म आत्माओं में से हैं जो भीतर ही भीतर सुलगते रहते हैं और अपने अहम् को सर्वदा पराजित करके युग में एक शान्त परिवर्तन उपस्थित का दिया करते हैं।… गद्य और पद्य दोनों में वे तेजस्वी हैं।’
– माखनलाल चतुर्वेदी
‘सियारामशरण गुप्त जी नम्रता की मूर्ति है। नाम उनका सार्थक है। सब नारी-नरों को सीताराम स्वरूप देखकर वे सबकी भक्ति करते हैं उनकी कविताओं में भी इसी गुण का परिपाक है।’
– विनोबा भावे