
विचारक दत्तोपन्त ठेंगड़ी
किसी भी राष्ट्र का निर्माण से लेकर उसका वर्तमान और भविष्य युवाओं के हाथों में होता है। भारत जैसा राष्ट्र में, जहाँ दुनिया का सबसे ज्यादा युवाओं की संख्या है, यह बात और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। दत्तोपन्त ठेंगड़ी के विचारों में युवा केवल भविष्य की उम्मीद नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी भी है। उनका चिन्तन मजदूर, किसान, उपभोक्ता और विद्यार्थी, सभी को एक राष्ट्रीय सूत्र में पिरोने का प्रयास था। दत्तोपन्त ठेंगड़ी के अनुसार युवा वह शक्ति है जो विचार को आचरण और संगठन को आन्दोलन में बदलती है।
दत्तोपन्त ठेंगड़ी का जन्म 10 नवम्बर 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के आर्वी में हुआ। वे बहुत कम उम्र में ही सामाजिक कार्यों से जुड़ गये और आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। उन्होंने 1955 में भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की। आगे चलकर उन्होंने भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मञ्च और अन्य संगठनों की स्थापना में भी बड़ी भूमिका निभायी। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे जहाँ मुखर होकर अपनी बातों को रखने के लिये जाने जाते थे। उनका निधन 14 अक्टूबर 2004 को हुआ। संगठन-निर्माण के कार्यों में उन्होंने अनुभव किया कि युवा शक्ति ही संगठन का विचार जन-जन पहुचाने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देती है। अतः उनके विचारों में चरित्रवान युवा शक्ति ही किसी भी राष्ट्र का नींव है।
ठेंगड़ी के विचारों में राष्ट्र सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है और राष्ट्र को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में युवाओं की सबसे बड़ी भूमिका है। उनके चिन्तन में चरित्रवान, संस्कारवान, गुणशील एवं नैतिकमूल्यों पर चलने वाला युवा ही समाज व राष्ट्र के लिये उपयोगी है। युवाओं के लिये सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है की वे अपने भीतर की शक्ति को पहचाने तथा उसे सही दिशा में उपयोग करें जो कि समाज व राष्ट्र के लिये उपयोगी हो। एक चरित्रवान युवा ही अपने परिवार, कार्यस्थल और समाज में अपने आचरण से बदलाव लाता है।
ठेंगड़ी के अनुसार श्रमिक का भी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। उनका श्रम किसी व्हाइटकॉलर कार्यों में योगदान दे रहे व्यक्ति से कहीं कम नहीं है। उनके विचारों में श्रमिकों को उसका पूरा पारिश्रमिक मिलना चाहिये। उन्होंने भारतीय मजदूर संघ के नारा “देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम” को देशभर में प्रसारित किया।
स्वदेशी ठेंगड़ी के विचारों का प्रमुख स्तम्भ रहा। उदारीकरण के दौर में उन्होंने स्वदेशी जागरण मञ्च की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान निभाया। उनके लिये स्वदेशी केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का नारा नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्थानीय उद्योग-कौशल और स्वाभिमान की व्यापक अवधारणा थी।
ठेंगड़ी के चिन्तन में युवा अपनी मेधा का उपयोग देश में उद्योग, कृषि-प्रसंस्करण, लघु-उद्यम और नवाचार के लिए करें, ताकि “प्रतिभा-पलायन” घटे और राष्ट्र आर्थिक रूप से सशक्त बने।
ठेंगड़ी पूँजीवाद और साम्यवाद, दोनों की आलोचना करते हुए एक भारतीय “तृतीय मार्ग” की बात करते थे, ऐसा मार्ग जो भारतीय जीवन-दृष्टि पर आधारित हो। उनका मानना था कि पश्चिम से उधार ली गयी विचारधाराएँ हमारी परिस्थितियों में पूरी तरह उपयुक्त नहीं हो सकतीं। भोगवादी उपभोक्ता-संस्कृति, जिसमें व्यक्ति की सफलता केवल धन और सुविधाओं से मापी जाती है, उन्हें युवाओं के लिये खतरनाक लगती थी।
इसका मतलब आधुनिकता या नयी तकनीक का विरोध नहीं था। उनका आग्रह विवेकपूर्ण चयन पर था। ठेंगड़ी स्वयं एक कुशल संगठक थे और युवाओं में संगठन की भावना को बहुत महत्त्व देते थे। उनके अनुसार अकेला व्यक्ति कितना भी योग्य हो, संगठित शक्ति के बिना बड़े परिवर्तन नहीं ला सकता। संगठन में काम करने से अनुशासन, सहयोग, नेतृत्व और अहंकार-त्याग जैसे गुण विकसित होते हैं।
उनकी कार्यशैली में पद और प्रचार की जगह निष्ठा और साधना पर जोर दिखता है। वे पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले कार्यकर्ता का आदर्श प्रस्तुत करते थे। युवाओं के लिये यह सीख है कि समाज-सेवा का उद्देश्य तात्कालिक लोकप्रियता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक परिवर्तन होना चाहिये। सेवा का भाव उन्हें यह भी सिखाता है कि अधिकार से पहले कर्तव्य आता है।
आज का युवा बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा, डिजिटल भटकाव और मूल्यों के संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में ठेंगड़ी के विचार कई स्तरों पर मार्गदर्शक हैं। कौशल-विकास और स्वरोजगार पर आज जो जोर दिया जा रहा है, वह श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता के उनके आग्रह से मेल खाता है। स्टार्टअप व स्थानीय उद्यमिता की चर्चा में स्वदेशी की भावना सुनायी देती है। सोशल मीडिया के दौर में चरित्र और विवेक का उनका सन्देश और भी जरूरी हो गया है।
हमारे सामने चुनौती वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में स्वदेशी और वैश्विक जुड़ाव के बीच सन्तुलन बनाना है। दत्तोपन्त ठेंगड़ी की दृष्टि में युवा वह जीवन्त शक्ति है जो चरित्र, श्रम, संगठन और स्वदेशी के चार आधारों पर राष्ट्र का निर्माण कर सकती है। उन्होंने युवाओं से केवल उपदेश की अपेक्षा नहीं की, बल्कि स्वयं अपने जीवन और कार्य से उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका सन्देश सरल है: जड़ों से जुड़ो, श्रम का सम्मान करो, संगठित होकर काम करो और अपनी योग्यता को राष्ट्र-हित में लगाओ। यदि आज का युवा इस संदेश को अपने समय के अनुरूप ढालकर अपनाए, तो वह न केवल अपना जीवन सार्थक बनाएगा, बल्कि भारत को भी आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र बनाने में योगदान देगा।
– खुशबू झा
(लेखिका राजकीय महाविद्यालय, भूपेन्द्र नारायण मण्डल विश्वविद्यालय, बिहार में सहायक आचार्य हैं)