मन्मथनाथ गुप्त जी

मन्मथनाथ गुप्त जी
मन्मथनाथ गुप्त जी

मन्मथनाथ गुप्त जी :

‘हमें क्रान्तिकारी कहा जाता था, लेकिन हम तो बस आम लोग थे जो अपने देश के लिये अपनी जान कुर्बान करने को तैयार थे।’
स्वतंत्रता सेनानी और सिद्धहस्थ लेखक मन्मथनाथ गुप्त जी 13 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बन गये थे। उनके पिता वीरेश्वर विराटनगर (नेपाल) में एक स्कूल के हेडमास्टर थे। इसलिये मन्मथनाथ गुप्त ने भी दो वर्ष वहीं शिक्षा प्राप्त की। बाद में वे वाराणसी आ गये। उस समय के राजनीतिक वातावरण का प्रभाव उन पर भी पड़ा और 1921 में ब्रिटेन के युवराज के बहिष्कार का नोटिस बाँटते हुए वे गिरफ्तार कर लिये गये। इसके लिये उन्हें तीन महीने के कारावास की सजा हुई।


काकोरी काण्ड में निभायी भूमिका

जेल से छूटने के बाद उन्होंने काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया और वहाँ से ‘विशारद’ की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी दौरान उनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हुआ और वे पूर्णतः क्रान्तिकारी गतिविधियों में संलग्न हो गये। 1925 के प्रसिद्ध ‘काकोरी काण्ड’ में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी। ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटने के लिये ट्रेन रोकने वाले दस क्रान्तिकारियों में मन्मथनाथ गुप्त भी सम्मिलित थे। इस घटना के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमा चला और उन्हें 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनायी !


‘मैं अपनी मातृभूमि के लिये सबकुछ सहने को तैयार’

14 वर्ष की अल्पायु में जब मन्मथनाथ गुप्त बहिष्कार आन्दोलन के समर्थन में पर्चे बाँटने निकले, तो उनके पिता ने उन्हें पुलिस की यातनाओं और जेल की सजा का भय दिखाकर रोकने का प्रयास किया। इस पर बालक मन्मथनाथ ने निर्भीकता से जो ऐतिहासिक उत्तर दिया, वह उनकी अदम्य साहस-भावना और राष्ट्रभक्ति का परिचायक था- ‘बाबूजी, मैं अपनी मातृभूमि के लिये सबकुछ सहने के लिये तैयार हूँ। आपने ही तो यह सब सिखाया है!’

काकोरी ट्रेन एक्शन


मन्मथनाथ गुप्त ने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा और देश की स्वतंत्रता के लिये समर्पित कर दिया। स्वतंत्रता से पूर्व उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेलों में बीता, किन्तु अंग्रेजी शासन की यातनाएँ और दमन भी उनके संकल्प को डिगा नहीं सके। वे जीवनपर्यन्त निर्भीकता और दृढ़ता के साथ अपने क्रान्तिकारी आदर्शों पर अडिग रहे। अपने महान नेता रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ द्वारा दिखाये गये मार्ग का अनुसरण करते हुए उन्होंने अन्तिम समय तक राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया।


फाँसी न मिलने का अफसोस रहा

गिरफ्तारी के बाद मुख्य क्रान्तिकारियों (बिस्मिल, अशफाक, रोशन सिंह और लाहिड़ी) को फाँसी की सजा दी गयी। चूँकि मन्मथनाथ गुप्त उस समय नाबालिग (कम उम्र) थे, इसलिये कानूनन उन्हें फाँसी नहीं दी जा सकी, उन्हें अपनी कम उम्र के कारण फाँसी न मिलने का हमेशा खेद रहा। उन्होंने कहा कि ‘मुझे इस बात का ताउम्र अफ़सोस रहा है कि उस वक्त (कम उम होने के कारण) मुझे फाँसी क्यों नहीं हुई।’


जीवनभर साहित्य और राष्ट्रचेतना की ज्योति प्रज्वलित की

स्वतंत्रता के पश्चात् वे भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से जुड़े तथा ‘योजना’, ‘बाल भारती’ और ‘आजकल’ जैसी प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं के सम्पादन का दायित्व भी निभाया। जीवन के अन्तिम पड़ाव में वे दिल्ली आकर बस गये और नई दिल्ली के निजामुद्दीन ईस्ट में अपना निवास बनाया। यहीं 26 अक्टूबर 2000 को 92 वर्ष की आयु में उन्होंने अन्तिम साँस ली। संयोगवश, वह दीपावली का पावन पर्व था। मानो जीवन भर साहित्य और राष्ट्रचेतना की ज्योति प्रज्वलित करने वाला वह दीप उस दिन परम ज्योति में विलीन हो गया।


साहित्यिक अवदान

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास’, ‘क्रान्तियुग के अनुभव’, ‘चन्द्रशेखर आजाद’, ‘विजय यात्रा’, ‘यीन्द्रनाथ दास’, ‘कांग्रेस के सौ वर्ष’, ‘कथाकार प्रेमचन्द’ तथा ‘प्रगतिवाद की रूपरेखा आदि उल्लेखनीय ग्रंथ हैं। उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला-तीनों भाषाओं में साहित्य-सृजन किया। उनके प्रकाशित ग्रंथों की संख्या लगभग 80 मानी जाती है। स्वतंत्रता के पश्चात उन्होंने नवीन साहित्य की रचना के साथ-साथ अपनी पूर्व प्रकाशित कृतियों के संशोधित संस्करण भी तैयार किये। इस क्रम में ‘भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ऐतिहासिक, क्रान्तिकारी और वैचारिक लेखन के अतिरिक्त उनकी रुचि वैज्ञानिक विषयों में भी थी। उनके कथा-साहित्य में मनुष्य की मानसिक प्रवृत्तियों, अन्तद्वंद्वों और व्यवहार के विश्लेषण की स्पष्ट झलक मिलती है।

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