
भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता
भारत जैसे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहुजातीय देश में किसी भी भाषा की भूमिका मात्र संप्रेषण तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह संस्कृति, समाज, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना की वाहक भी बन जाती है। हिंदी, भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्राचीन और अत्यंत समृद्ध भाषा के रूप में, देश की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक गतिशीलता में गहराई से रची-बसी है। संविधान सभा ने हिंदी को भारत गणराज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार करने का निर्णय लिया। यह निर्णय एक लंबी बहस, अनेक वैचारिक मतभेदों और व्यापक चिंतन के बाद आया था। भारतीय समाज का बहुभाषी चरित्र इस चर्चा को और अधिक जटिल बनाता था, परंतु अंततः हिंदी की व्यापकता, सरलता, जन-आधार और राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में उसकी क्षमता को देखते हुए इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया। यह न केवल प्रशासनिक निर्णय रहा, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी ग्रहण कर गया।
हिंदी का ऐतिहासिक विकास स्वयं भारत की सभ्यता के विकास की तरह विविध अनुभवों, संस्कृतियों और लोकधाराओं से होकर गुजरता है। अपभ्रंश, ब्रज, अवधी, खड़ी बोली, भोजपुरी, मगही, राजस्थानी, नेपाली, पंजाबी और अनेक बोलियाँ हिंदी की विकास धारा में सम्मिलित रही हैं। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने हिंदी को ‘लोकधर्म और जीवनधर्म की भाषा कहा है क्योंकि यह जनजीवन की मिट्टी से उगी भाषा है। इसकी जड़ें गाँव, लोकगीत, जनकथाओं, सूफी परंपरा, संत साहित्य, रामायण परंपरा, कबीर-मीरा के भक्ति आंदोलन और आधुनिकता के साथ नये सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों में फैलती है। यही व्यापकता हिंदी को भाषायी ही नहीं, सांस्कृतिक धारा भी बनाती है। हिंदी का सांस्कृतिक स्वरूप अत्यंत विस्तृत है। तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, हरिवंश राय बच्चन, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, अज्ञेय और सैकड़ों अन्य रचनाकारों ने हिंदी को न केवल साहित्यिक विस्तार दिया, बल्कि भारतीय जीवन की जटिलताओं, भावनाओं और सामाजिक यथार्थ को भाषा में रूपायित किया। उनके लेखन ने हिंदी को एक ऐसी शक्ति प्रदान की, जिसने जनमानस को जोड़ा, समाज को दिशा दी और राष्ट्रीय आंदोलन को ऊर्जा दी।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। ‘हिन्दुस्तान’, ‘प्रताप’, ‘अभ्युदय”, “विश्वमित्र’, “आज” जैसी पत्रिकाओं और अखबारों ने जनता को जागृत करने और अंग्रेजी सत्ता के दमन के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। हिंदी केवल साहित्यिक प्रयासों से नहीं, बल्कि जन-संघर्ष और राजनीतिक चेतना से भी मजबूत हुई। हिंदी, भारतीय संस्कृति का दर्पण मानी जाती है। यह भाषा भारतीय समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों का प्रतिनिधित्व करती है। हिंदी का आधार लोक है। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, मुहावरे, ग्रामीण जीवन, ऋतु परिवर्तन का बोध, कृषि-चक्र, त्यौहार, परिवार, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ, ये सब हिंदी भाषा के भीतर जीवित हैं। यह लोक-संस्कृति से प्राप्त शब्द-विधान, अर्थ-संरचना और व्यवहारिकता हिंदी को जीवंत बनाते हैं। अंग्रेजी जैसी भाषा आधुनिकता का उपकरण हो सकती है, परन्तु हिंदी भास्तीय जीवन का भावात्मक आधार है।
हिंदी भाषा हमारी अस्मिता का प्रमाण है। राष्ट्र में हिंदी भाषा के तमाम सारे प्रतिमानों के बावजूद आज हिंदी और हिंदी सेवी संर्घषरत है, हिंदी को संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिए। हिंदी भाषा को केवल राजभाषा नहीं, राष्ट्रभाषा हिंदी के रूप में देखने के लिए। संसार के प्रत्येक भाषा की अपनी प्रकृति एवं कुछ विशेषताएँ होती है। चाहे वह बोलचाल की भाषा हो या काम-काज की भाषा, चाहे राज्य अथवा देश की राजभाषा हो या राष्ट्रभाषा। अपनी विशेषताओं के कारण ही कोई भाषा अवसर पाकर व्यवहार प्रचलन में प्रसिद्ध हो जाती है। इन विशेषताओं में से किसी भाषा की व्याकरणिक विशेषता विशेष महत्त्वपूर्ण होती है। जो भाषा जितनी अधिक व्याकरणिक नियमों से युक्त होती है, वह उतनी अधिक मानक और परिमार्जित होती है। यह भाषा की अपनी निजी गुण, स्वभाव या प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। राष्ट्रीय अस्मिता का निर्माण किसी एक तत्त्व से नहीं होता। यह भाषा, संस्कृति, इतिहास, सामाजिक- समानता और सामूहिक स्मृति से मिलकर बनती है। हिंदी, भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के निर्माण में एक सेतु की भूमिका निभाती है। यह भाषाई विविधता को स्वीकारते हुए भी देश को जोड़ने का कार्य करती है।
भाषा एक सामाजिक वस्तु होने के कारण हिंदी भाषा में भी सामाजिकता का गुण देखने को मिलता है। आधुनिक भारतीय समाज के निर्माण में हिंदी भाषा एवं उसके साहित्य का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस प्रकार भारतीय समाज में सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जागरण लाने में हिंदी भाषा की मूल प्रवृत्ति देखी जा सकती है। साथ ही देश की एकता और अखण्डता को बरकरार रखते हुए भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के संवाहक और संरक्षक के रूप में हिंदी भाषा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। एक सरल और शिष्ट भाषा होने के कारण हिंदी काफी ग्रहणशील अथवा सहज में ही अर्जनशील भाषा है। गैर हिंदी भाषी के लिए भी हिंदी का बोल-व्यवहार व प्रयोग करना काफी सरल और सहज होता है। थोड़े प्रयास से ही गैर हिंदी भाषी हिंदी पढ़ना, लिखना व समझना सीख लेते हैं। यह हिंदी की एक विशेष प्रवृति ही है कि कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से समझ सकता है एवं हिंदी में बोल कर अपने भाव प्रकट कर सकता है। इस प्रकार हिंदी पढ़े-लिखे, ज्ञानी, विद्वान से लेकर साधारण से साधारण लोगों की भाषा है जिसे वे अपने दैनिक जीवन के समस्त कार्य-व्यापार में प्रयोग करते हैं। गतिशीलता हिंदी भाषा की एक विशेष प्रवृत्ति है। खड़ी बोली हिंदी से प्रारंभ होकर हिंदी की विकास धारा निरंतर अग्रसर है। मध्यकालीन प्रवृत्ति को छोड़कर अरबी, फारसी की शब्द रूपों को आत्मसात करती हुई आधुनिक काल में अंग्रेजी शब्दों को अपने में मिला लेने वाली अद्भुत क्षमता हिंदी में देखी जा सकती है। साथ ही देशी बोलियों के शब्दों को अपने में मिलाकर हिंदी ने एक विपुल पारिभाषिक शब्दावलियों का समृद्ध भण्डार विकसित किया है। परिणामस्वरूप हिंदी भाषा की गतिधारा कभी धीमी न होकर निरंतर प्रगतिशील रही है।
यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि आधुनिक भारत में हिंदी की भूमिका वैश्वीकरण और तकनीकी क्रांति के युग में और बढ़ गयी है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, यूट्यूब, ओटीटी प्लेटफॉर्म, ब्लॉगिंग, डिजिटल पत्रकारिता और ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्मों पर हिंदी दुनिया की सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली भाषाओं में शामिल है। हिन्दी का डिजिटल प्लेटफार्म पर वैश्विक प्रभाव परिलक्षित हो रहा है। दक्षिण एशिया, खाड़ी देशों, यूरोप, अमेरिका, कैरिबियन देशों और फिजी में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय उपयोग कर रहे हैं। भोजपुरी, अवधी, मगही, राजस्थानी, हरियाणवी, ब्रज, छत्तीसगढ़ी जैसी बोलियों का डिजिटल पुनरुत्थान भी हिंदी के व्यापक परिवार की शक्ति का प्रमाण है।
शिक्षा के क्षेत्र में नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 ने मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के महत्त्व पर जोर देते हुए हिंदी के लिए भी नए अवसर खोले हैं। यह नीति कहती है कि भाषा केवल सीखने का विषय नहीं, बल्कि सीखने का माध्यम भी होना चाहिए। अध्ययनों से यह प्रमाणित हुआ है कि बच्चे मातृभाषा या अपनी अनुकूल भाषा में बेहतर सीखते हैं। इस संदर्भ में हिंदी माध्यम के स्कूलों, विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में हिंदी के माध्यम से शिक्षा के विस्तार की आवश्यकता और अधिक महसूस होती है।
काल और स्थान अनुसार हिंदी भाषा की प्रकृति में बदलाव या परिवर्तन का गुण देखा जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परिस्थिति अनुसार हिन्दी अपने को ढालने या बदलने में भी काफी सक्षम है। अपने उद्भव से लेकर आज तक हिंदी की प्रकृति या स्वरूप में निरंतर बदलाव देखा जा सकता है। साथ ही सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति-परिस्थितियों के कारण हिंदी आम भाषा के रूप में, विशिष्ट भाषा के रूप में, व्यावसायिक भाषा के रूप में, राजकाज के लिए यह कार्यालयीय भाषा के रूप में इसके विभिन्न प्रयोजनमूलक रूप देखने को मिलता है। भाषा के क्रमिक विकास का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि भाषा जटिलता से सरलता की ओर उन्मुख होती है। यही कारण है कि हिंदी भाषा में किसी कथन को सुबोध बनाने के लिए सरल से सरल शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है। परिणामस्वरूप हिंदी संयोगात्मक से वियोगात्मक की ओर, समासात्मक से व्यासात्मक की ओर तथा जटिलता से सरलता की ओर सदा उन्मुख रही है।
डॉ. शिखा सिंह
सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार