नारी : मातृत्व, कृतित्व और नेतृत्व-भारत की शाश्वत शक्ति का त्रिवेणी स्वरूप

नारी : मातृत्व, कृतित्व और नेतृत्व-भारत की शाश्वत शक्ति का त्रिवेणी स्वरूप
नारी : मातृत्व, कृतित्व और नेतृत्व-भारत की शाश्वत शक्ति का त्रिवेणी स्वरूप

नारी : मातृत्व, कृतित्व और नेतृत्व-भारत की शाश्वत शक्ति का त्रिवेणी स्वरूप

वर्तमान समय में जब नारी विमर्श प्रायः अधिकार, समानता और प्रतिनिधित्व तक सीमित कर दिया जाता है, तब आवश्यकता इस बात की है कि हम भारतीय दृष्टि से नारी के वास्तविक स्वरूप को पुनः समझें। भारतीय संस्कृति ने नारी को कभी केवल अधिकारों की अपेक्षा रखने वाली सत्ता के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे सृष्टि की आधारशक्ति, परिवार की संस्कार-वाहिनी, समाज की प्रेरक चेतना और राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य सहयात्री माना है। यही कारण है कि यहीं नारी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन उसके मातृत्व, कृतित्व और नेतृत्व के समन्वित स्वरूप में किया गया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर जब राष्ट्र जीवन में संगठन, संस्कार और सामाजिक सहभागिता की चर्चा हो रही है, तब यह भी आवश्यक है कि महिलाओं की भूमिका को पूर्वाग्रहों से नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन की कसौटी पर समझा जाए। वर्षों से यह भ्रम फैलाया जाता रहा है कि राष्ट्र-निर्माण के कार्य में महिलाओं की भूमिका सीमित रही है. जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। राष्ट्र सेविका समिति सहित अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने दशकों से मातृशक्ति के माध्यम से समाज में संगठन, संस्कार, सेवा और नेतृत्व का अद्भुत कार्य किया है। यह यात्रा किसी प्रतिस्पर्धा की नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता की यात्रा है।
भारतीय दर्शन का मूल आधार एकात्म मानव दृष्टि है। यह दृष्टि बताती है कि व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र एक-दूसरे से पृथक इकाइयाँ नहीं है, बल्कि एक ही जीवनधारा के विविध आयाम हैं। ऐसे में यदि परिवार राष्ट्र की आधारशिला है तो नारी उस आधारशिला की आत्मा है। इसलिए भारतीय चिंतन में मातृत्व को केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संस्कार-निर्माण की सर्वोच्च साधना माना गया है।

एक बालक का व्यक्तित्व विद्यालय में नहीं, उससे पहले माँ की गोद में आकार लेता है। गर्भकाल से ही उसके विचारों, व्यवहार और संस्कारों की नींव रखी जाती है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति ने माँ को प्रथम गुरु कहा। यदि विकसित भारत का स्वप्न साकार करना है तो सबसे पहले ऐसी मातृशक्ति का निर्माण करना होगा, जो अपने परिवार में राष्ट्रभाव, कर्तव्यबोध, अनुशासन और मानवीय मूल्यों का वातावरण निर्मित करे। मातृत्व केवल अपने बच्चों तक सीमित नहीं होता, उसका विस्तार समाज के प्रत्येक उस व्यक्ति तक होता है. जिसके प्रति करुणा, संरक्षण और उत्तरदायित्व का भाव जागृत हो।
परंतु भारतीय संस्कृति ने नारी को केवल मातृत्व तक सीमित नहीं रखा। उसने सदैव उसके कृतित्व को भी समान सम्मान दिया। वैदिक काल की गार्गी और मैत्रेयी से लेकर अहिल्याबाई होल्कर, रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई तक भारतीय इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब-जब समाज ने अवसर दिया, तब-तब महिलाओं ने ज्ञान, शासन, समाज सुधार, युद्ध, संस्कृति और लोककल्याण के प्रत्येक क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया। आज भी शिक्षा, विज्ञान, न्याय, प्रशासन, राजनीति, उद्यमिता, साहित्य और सामाजिक सेवा में महिलाओं की उपलब्धियाँ यह सिद्ध करती हैं कि अवसर मिलने पर नारी केवल स्वयं आगे नहीं बढ़ती, बल्कि पूरे समाज को साथ लेकर चलती है।
फिर भी हमें यह स्मरण रखना होगा कि केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ ही कृतित्व नहीं होतीं। भारतीय दृष्टि में वह कार्य अधिक मूल्यवान है जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक सकारात्मक परिवर्तन पहुँचा सके। जिस सफलता से परिवार मजबूत हो, समाज संगठित हो और राष्ट्र सशक्त बने, वही वास्तविक कृतित्व है। आज आवश्यकता ऐसी महिलाओं की है जो आधुनिक शिक्षा और तकनीकी दक्षता के साथ भारतीय जीवन मूल्यों को भी समान महत्व दें। आत्मनिर्भरता और आत्मसंयम का संतुलन ही भारतीय नारी की सबसे बड़ी पहचान है।

मातृत्व और कृतित्व का स्वाभाविक विस्तार नेतृत्व में होता है। नेतृत्व केवल किसी पद, प्रतिष्ठा या अधिकार का पर्याय नहीं है। वास्तविक नेतृत्व वह है जो सेवा, संवेदना, अनुशासन और समर्पण से जन्म लेता है। भारतीय समाज को आज ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो समाज को विभाजित नहीं, बल्कि संगठित करे, जो अधिकारों से पहले कर्त्तव्यों की बात करे, जो स्वार्थ नहीं, राष्ट्रहित को सर्वोपरि माने। इस प्रकार का नेतृत्व महिलाओं के स्वाभाविक गुणों, संवेदनशीलता, धैर्य, समन्वय और दूरदृष्टि से सहज रूप में विकसित होता है।
अद्यावधि राष्ट्र सेविका समिति सहित अनेक संगठन इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। सेवा, संस्कार, संगठन और समाज जागरण के माध्यम से महिलाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रभाव का विकास हो रहा है। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय समाज में महिला सहभागिता कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। स्त्री और पुरुष दोनों समाज रूपी रथ के समान गति देने वाले दो पहिए हैं। किसी एक की उपेक्षा राष्ट्र की गति को अवरुद्ध कर सकती है।

आज जब भारत वर्ष २०४७ तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है, तब यह लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति से पूरा नहीं होगा। इसके लिए संस्कारित परिवार, जागरूक समाज और उत्तरदायी नागरिकों की आवश्यकता होगी। इन तीनों के निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम मातृशक्ति ही है। यदि प्रत्येक महिला अपने मातृत्व को संस्कारों का माध्यम, अपने कृतित्व को समाजसेवा का माध्यम और अपने नेतृत्व को राष्ट्र-निर्माण का माध्यम बना ले, तो विकसित भारत का स्वप्न केवल कल्पना नहीं, बल्कि निकट भविष्य की वास्तविकता बन जाएगा।
यह समय महिलाओं को केवल सम्मान देने का ही नहीं, बल्कि उनके सामर्थ्य पर विश्वास व्यक्त करने का है। उन्हें किसी कृपा की आवश्यकता नहीं, बल्कि ऐसे सामाजिक वातावरण की आवश्यकता है जहाँ उनकी प्रतिभा, संवेदना और नेतृत्व क्षमता स्वाभाविक रूप से विकसित हो सके। भारतीय संस्कृति का यही संदेश है कि नारी शक्ति को नियंत्रित नहीं, बल्कि संस्कारित, सम्मानित और राष्ट्रहित में जाग्रत किया जाए। आज आवश्यकता किसी नए विमर्श की नहीं, बल्कि अपनी शाश्वत सांस्कृतिक चेतना को पुनः आत्मसात करने की है। मातृत्य नारी की आत्मा है, कृतित्व उसका कर्म है और नेतृत्व उसका राष्ट्रधर्म। जब ये तीनों एकाकार होते हैं, तब केवल एक सशक्त महिला का नहीं, बल्कि एक सशक्त परिवार, एक समरस समाज और एक आत्मविश्वासी भारत का निर्माण होता है। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत का संदेश है साथ ही अमृतकाल के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

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