रानी रुद्रमा देवी : महिला सम्राट जिसे इतिहास ने ‘महाराज’ कहकर पुकारा

रानी रुद्रमा देवी : महिला सम्राट जिसे इतिहास ने 'महाराज' कहकर पुकारा
रानी रुद्रमा देवी : महिला सम्राट जिसे इतिहास ने 'महाराज' कहकर पुकारा

रानी रुद्रमा देवी : महिला सम्राट जिसे इतिहास ने ‘महाराज’ कहकर पुकारा

दक्षिण भारत के इतिहास में काकतीय वंश (११५०-१३२३ ईस्वी) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह राजवंश आधुनिक तेलंगाना क्षेत्र में फला-फूला और इसकी राजधानी ओरुगल्लु (वर्तमान वारंगल) थी। इस वंश की सबसे प्रतापी शासक रानी रुद्रमा देवी ने लगभग ३३ वर्षों (१२६२-१२६५ ईस्वी) तक शासन किया जो अपने आप में एक असाधारण उदाहरण है। काकतीय वंश की उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास सामंत से स्वतंत्र शासक तक, काकतीय वंश का नाम काकती देवी के नाम पर रखा गया था। इस वंश के शासकों ने ११वीं से 13वीं शताब्दी तक दक्कन क्षेत्र पर शासन किया और उनकी राजधानी वारंगल थी। इस वंश के प्रमुख शासकों में क्रमशः प्रोल, बेटा, महादेव, गणपतिदेव, रुद्रमादेवी और प्रतापरुद्र शामिल थे। यद्यपि प्रतापरुद्र इस वंश के अंतिम शासक थे, लेकिन उनके वंशज आगे भी कई क्षेत्रों में शासन करते रहे। काकतीय मूल रूप से पश्चिमी चालुक्यों (कल्याणी चालुक्य) के सामंत थे। प्रोल द्वितीय (१११६-११५७ईस्वी) ने स्वतंत्र शासन की नींव रखी। गणपतिदेव महादेव के बाद राजा बने। वे तीन बड़े राजाओं में से एक थे, जिन्होंने ६० साल तक राज किया।
वे काकतीय शासकों में सबसे महान थे और सातवाहनों के बाद पूरे तेलुगू क्षेत्र को एक शासन के तहत लाने वाले पहले शासक भी थे। मंटेना शिलालेख गणपतिदेव का सबसे पहला रिकॉर्ड है जो शायद उनके राज के पहले साल में जारी किया गया था। गणपति देव (११६६-१२६२ ईस्वी) के शासनकाल में राज्य का विस्तार हुआ।


साम्राज्य का विस्तार

काकतीयों का शासन आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक फैला। गणपतिदेव वारंगल को एक सुदृढ़ किलेबंद शहर के रूप में विकसित किया। उन्हें सकल-देश-प्रतिष्ठपनाचार्य की उपाधि दी गयी जिसका अर्थ था ‘सभी राज्यों को स्थापित करने वाला।’ रुद्र द्वारा हासिल किए गए सभी राज्यों के वे शासक बन गए थे।
जिस तरह 13वीं सदी में सेउना और होयसल राजवंशों ने भाषा से जुड़े इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया था उसी तरह गणपतिदेव के राज में काकतीय राजवंशों ने भी ऐसा ही किया था। उन्होंने काकतीय साम्राज्य को आगे बढ़ाया और लगभग १२३० AD में वंश के पारंपरिक तेलंगाना इलाके के बाहर कई हमले किए जिससे गोदावरी और कृष्णा नदियों के आस-पास के तेलुगु बोलने वाले निचले डेल्टा इलाके काकतीय नियन्त्रण में आ गए। गणपतिदेव की रानी सोमलदेवी से रुद्रमा और गणपम्बा नाम की दो बेटियाँ थीं। बड़ी बेटी का नाम गणपम्बा देवी और छोटी बेटी का नाम रुद्रमा देवी था।
रानी रुद्रमा देवी : जीवन और शासनकाल, उत्तराधिकार और चुनौतियाँ (1262-1289 ईस्वी)
वारंगल के विशाल किले में एक दिन राजा गणपतिदेव गहन चिंता में डूबे बैठे थे। उनका साम्राज्य शक्तिशाली था, सीमाएँ विस्तृत थीं, परंतु एक समस्या उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी- उनका कोई पुत्र नहीं था।
उस समय के समाज में पुत्र का अभाव केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं, बल्कि राजनीतिक संकट भी था।
तभी उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने इतिहास को मोड़ दिया। उन्होंने अपनी पुत्री रुद्रमा को ही पुत्र’ घोषित कर दिया।
उन्होंने एक पुरुष-रूप-संस्कार वाला राज-संस्कार करवाकर रुद्रमदेवी को लड़के के रूप में राज-पाट और युद्ध कला सिखाई, ताकि राज-सिंहासन पर ‘रुद्रदेव’ नामक राजा के रूप में उन्हें स्वीकार करने में विरोध कम हो। पुत्रिका संस्कार के माध्यम से रुद्रमा अब केवल राजकुमारी नहीं रहीं- वे बन गई ‘रुद्रदेव’। यह निर्णय केवल उत्तराधिकारी तय करना नहीं था बल्कि यह समाज की जड परंपराओं को चुनौती देना था।


प्रारंभिक जीवन

रुद्रमा की अंदरूनी ताकत और फोकस को महसूस करते हुए गणपतिदेव ने रुद्रमा को उनके शुरुआती गुरु शिवदेवय्या के निर्देशन और देखरेख में घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध की दूसरी कलाओं का प्रशिक्षण दिया। उन्हें राजनीति और लोक प्रशासन की अच्छी समझ थी। राजगद्दी पर बैठने से पहले ही रुद्रमा ने लोगों और जगहों को जान लिया था, उनके राज्य के कई हिस्सों, तीर्थस्थलों पर जाकर उनके बारे में जानकारी हासिल ५… करीमनगर का १२३५ AD का पोटुगल्लू शिलालेख और १२४६ AD का येलेश्वर शिलालेख इस बात का सबूत है।
बचपन : खेल नहीं, युद्ध सिखाया गया। रुद्रमादेवी का बचपन सामान्य नहीं था। जब अन्य बालिकाएँ गुड़ियों से खेलती थीं तब रुद्रमादेवी तलवार पकड़ना सीख रही थीं। गुरु शिवदेवय्या उन्हें घुड़सवारी और युद्धकला सिखाते। मामा जयप्पा उन्हें नृत्य सिखाते क्योंकि एक शासक को केवल युद्ध नहीं, संस्कृति भी समझनी होती है। कोंकणभट्ट से उन्होंने साहित्य और संगीत सीखा और सबसे महत्वपूर्ण उनके पिता स्वयं उन्हें शासन सिखाते। यह शिक्षा केवल प्रशिक्षण नहीं थी बल्कि यह एक व्यक्तित्व निर्माण था।
एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसमें कठोरता और कोमलता दोनों का संतुलन था।
एक शासक के लिए जरूरी अलग-अलग विषयों में वह बड़ी होकर मजबूत, काबिल और ज़मीन से जुड़ी हुई, भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हुई। उसके पिता गणपतिदेव ने राजनीति और पब्लिक गवर्नेस के बारे में अपना ज्ञान और अनुभव उसके साथ साझा किया। उसे अपने रोज़ाना के प्रशासन का हिस्सा बनाकर, उन्होंने रुद्रमा को हर मौके पर लड़ाई के मैदान में सहज बना दिया। उन्होंने उसे राज करने के अलग-अलग पहलुओं से परिचित कराने के लिए ज़िम्मेदारियाँ देना शुरू किया, जिससे वह काफी माहिर हो गई और जल्द ही अपने दिल में लोगों की चिंता और भलाई के साथ राज करने की गहरी समझ और महारत दिखाई।
जैसे-जैसे रुद्रमादेवी बड़ी हुईं, उन्हें यह समझ में आने लगा कि वे केवल एक बेटी नहीं हैं वे एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। समाज उन्हें एक स्त्री के रूप में नहीं बल्कि एक पुरुष शासक के रूप में देखना चाहता था। उन्होंने पुरुषों के वस्त्र पहने, पुरुषों की तरह दरबार लगाया, और स्वयं को “महाराज रुद्रदेव” कहलवाया। कल्पना कीजिए एक स्त्री, जो अपने अस्तित्व को छुपाकर, एक पूरी पहचान बदलकर शासन कर रही है। यह केवल राजनीति नहीं थी बल्कि यह एक आंतरिक संघर्ष भी था।


विवाह की शर्त

इस समय तक, रुद्रमा की शादी की उम्र हो गई थी, गणपतिदेव उसके लिए एक सही लड़का ढूँढ़ रहे थे, जो दिखने और बहादुरी के हर मामले में उनकी बेटी जैसा हो। उन्हें निदादावोलू के राजा इंदुशेखर का बेटा, राजकुमार वीरभद्र सबसे सही लगा। तब तक, वीरभद्र अपनी बहादुरी और ताकत के अनगिनत कामों के साथ अपनी वीरता के लिए भी जाने जाते थे। एक महान सैनिक और योद्धा के गुण। शायद गणपतिदेव का एक और जानबूझकर उठाया गया कदम इस गठबंधन से दुश्मन को जीतना और उस तरफ से होने वाले दुश्मन के हमले को खत्म करना रहा होगा। कहा जाता है कि रुद्रमा ने यह शर्त रखी थी कि वह जिससे भी शादी करेंगी, उसे युद्ध में उन्हें हराना होगा। वीरभद्र तुरंत इस शर्त पर मान गए। दोनों ने मंत्रियों, अधीनस्थ राजाओं, सेनापतियों और इस असाधारण घटना को देखने आए लोगों की एक अभूतपूर्व भीड़ सहित उत्साहित और चिंतित दर्शकों की मौजूदगी में एक भयंकर युद्ध की तैयारी की। वे दोनों टॉप फॉर्म में थे। उन्होंने अलग-अलग हथियारों से जमकर लड़ाई लड़ी और सालों से सीखी हुई लड़ाई की अपनी कलाएँ दिखायीं। रुद्रमा और वीरभद्र पूरी तरह से एक-दूसरे पर जीत हासिल करने पर केन्द्रित थे। माना जाता है कि वे लगातार तीन दिन और रात तक लड़ते रहे, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। आखिर में, गणपतिदेव ने दखल दिया और उन्हें एक-दूसरे के बराबर काबिल, सच्चा और एक-दूसरे के लिए उपयुक्त घोषित किया। रुद्रमा शादी के लिए मान गई क्योंकि उन्हें वीरभद्र में बराबर का इंसान मिल गया था।
उन्होंने निदादवोलू के चालुक्य राजकुमार वीरभद्र से विवाह किया और दो पुत्रियों हुई। पुत्र न होने के कारण उन्होंने अपनी पोती प्रतापरुद्र को उत्तराधिकारी घोषित किया। हालांकि 1266 में उनके पति का और १२६७ में पिता का निधन हो गया, जिससे उन्हें व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से बड़ा आघात लगा। रुद्रमा देवी ने बहुत कम उम्र में वीरभद्र को खो दिया। लेकिन वह दुःख और निराशा में नहीं झुकी और न ही उन्होंने अपने कामों को नजरअंदाज किया। इसके बजाय, रुद्रमा ने एक शासक के तौर पर अपने कामों को पूरा करने में अपनी सारी ताकत और ऊर्जा लगा दी।


राज्याभिषेक और शत्रुता का सामना

रुद्रमादेवी का शासनकाल लगभग १२५६-१२६२ ईस्वी के बीच शुरू हुआ जब गणपतिदेव ने उन्हें सह-अधिपत्ति घोषित किया और बाद में वास्तविक शासक बनाया। इस समय कई सामंत, विशेषकर उनके सौतेले भाई हरिहरदेव और मुरारिदेव, महिला शासक के पक्ष में शासन स्वीकार करने को तैयार नहीं थे और उन्होंने विद्रोह किया। वारंगल पर उनका अस्थायी आधिपत्य हुआ, लेकिन रुद्रमादेवी ने अपने वफादार सेनानियों और नागरिकों के समर्थन से पुनः नियंत्रण स्थापित किया। यह उनके साहस और राजनीतिक कौशल का पहला महत्वपूर्ण प्रमाण है।
१२६६ में सिंहासन संभालने के बाद भी कई सामंतों ने उनका विरोध किया। साथ ही, पांड्यों ने नेल्लोर पर कब्जा किया और गजपति नरसिंहा प्रथम ने वेंगी पर आक्रमण शुरू किया। रुद्रमादेवी ने अनेक आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी असाधारण नेतृत्व क्षमता दिखाई। उनके सौतेले भाइयों ने उन्हें ओरुगल्लू से बेदखल किया, परन्तु उन्होंने अपने समर्थकों की एकजुटता से उन्हें हराकर सिंहासन पर अधिकार कायम किया।
सबसे बड़े युद्धों में देवगिरि के यादव शासक महादेव के साथ युद्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महादेव ने लाख सैनिकों के साथ ओरुगल्लू पर हमला किया। रुद्रमा देवी ने १० दिनों तक भयंकर युद्ध लड़ा और न केवल महादेव को पराजित किया, बल्कि उसे देवगिरि तक खदेड़ दिया, उन्हें शांति के लिए विवश किया और ३ करोड़ सोने के सिक्कों का कर भी प्राप्त किया। इस युद्ध में उन्हें अपने मामा जयप्पा रुद्र, जो गणपति देव के प्रमुख सेनापति थे, और अन्य सरदारों जैसे येर्रानैडु, पोथिनाइडु और रेचारला रुद्रनायका का समर्थन प्राप्त था। इसके बाद यादवों ने ओरुगल्लू पर पुनः आक्रमण नहीं किया।
यादवों, गंगों और पांड्यों का दबाव देवगिरि के यादव राजा महादेव ने रुद्रमादेवी को कमजोर समझकर आक्रमण किया, लेकिन रानी ने स्वयं युद्ध क्षेत्र में सेना का नेतृत्व किया और यादवों को पराजित कर देवगिरि तक खदेड़ दिया। १२७४ में जब गजपति नरसिम्हा प्रथम के पुत्र भानुदेव ने वेंगी पर हमला किया, तो रुद्रमादेवी ने अपने सेनापतियों पोट्टी नायक और प्रोला नायक को सेना भेजी जिन्होंने आक्रमण को विफल कर दिया और काकतीय सत्ता तटीय आंध में स्थापित की।
लिए उनके सबसे वफादार सामंत गोना गन्नारेड्डी ने कई बार उनके युद्ध लड़कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गन्नारेड्डी के भाई लकुमारेड्डी ने विद्रोह किया, लेकिन रुद्रमदेवी ने उन्हें श्रीशैलम में बंदी बना लिया। अंबा देव, जो कई बार पराजित हो चुका था, ने पांड्यों और चोलों के साथ मिलकर रुद्रमादेवी के विरुद्ध साजिश रची। अंततः अंबा देव ने रुद्रमादेवी की हत्या कर दी जिससे भारतीय इतिहास की महानतम रानियों में से एक का जीवन समाप्त हुआ।


प्रशासन और विकास कार्य

रुद्रमादेवी एक कुशल प्रशासक थीं जिन्होंने कुलीन वर्ग से बाहर के योद्धाओं और अधिकारियों को नियुक्त किया। उनके शासनकाल में रेड्डी और वेलामा सरदारों का उदय हुआ जो राज्य की स्थिरता में योगदान देने वाले प्रमुख सामंत थे। उन्होंने ओरुगल्लू किले की दीवारों की ऊँचाई बढ़ाई, चारों ओर चौड़ी खाई बनवाई और सुरक्षा के लिए किले को तीन भागों में बाँटा।
शिक्षा केंद्र: विद्वानों को संरक्षण, जयप्पा रुद्र जैसे ग्रंथकार प्रोत्साहित। कृषि और सिंचाई के लिए “विंजामूर” तालाब जैसे बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए, जिससे कृषि उत्पादन और राजस्व दोनों बढ़े। वेद-शिक्षा और संस्कृत को प्रोत्साहित किया, मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को दान दिए और “स्वयंभू मंदिर में रंग-मंडप आदि का निर्माण करवाया। विश्वासपूर्वक अनुभवी सामंतों और अधिकारियों को नियुक्त कर स्थानीय शासन-व्यवस्था मजबूत की।


सैन्य-शक्ति और वीरता

रुद्रमादेवी ने स्वयं युद्धभूमि में नेतृत्व किया, विद्रोही सामंतों और बाहरी आक्रमणकारियों को परास्त किया और राज्य को एकीकृत रखा। उन्होंने समाज के निम्न वर्गों को भी सेना और प्रशासन में जगह दी, जो उस युग के सामाजिक ढांचे के लिए कांतिकारी था। युद्ध में प्राप्त संपत्ति को उन्होंने अपने सैनिकों और उनके परिवारों में बांटा, जिससे उनका नेतृत्व मानवीय और न्यायप्रिय सिद्ध हुआ।


धर्म और संस्कृति

रुद्रमादेवी ने भव्य मंदिरों का निर्माण कराया जिनमें हजार स्तंभ मंदिर रामप्पा मंदिर (जो यूनेस्को विश्व धरोहर है), भद्रकाली और प‌द्माक्षी मंदिर प्रमुख हैं। इन मंदिरों की मूर्तिकला में स्त्री शक्ति और योद्धा देवी की छवियों उकेरी गयीं। उन्होंने पेरिनी शिव तांडव’ नामक युद्ध नृत्य को सेना के प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया ग्रंथ इस परंपरा के प्रमाण हैं। जो सैनिकों को आध्यात्मिक और मानसिक रूप से युद्ध के लिए तैयार करता था। रामप्पा मंदिर की मूर्तियों और ‘नृत्य रत्नावली”


निर्माण कार्यों का विस्तार

रुद्रमादेवी ने सुरक्षा, सिंचाई, धर्म और कल्याण के लिए निर्माण कार्य करवाए। उन्होंने ओरुगल्लू किले की दीवारों की ऊँचाई बढ़ाई, चारों ओर १५० फीट चौड़ी खाई खोदी और २.४ किलोमीटर व्यास की बाहरी दीवार का निर्माण कराया। ये किलेबंदी यादवों, गजपतियों और पांड्यों जैसे आक्रमणकारियों से रक्षा के लिए आवश्यक थी।


विदेशी दृष्टि

मार्को पोलो ने १२६२-६४ के भारत के दौरे के दौरान रुद्रमादेवी के शासन की प्रशंसा की। उन्होंने लिखा कि रुद्रमादेवी का शासन न्यायपूर्ण, कुशल और सुव्यवस्थित था और वारंगल एक समृद्ध नगर था। उन्होंने विशेष उल्लेख किया कि एक महिला शासक के बावजूद व्यवस्था अत्यंत उत्तम थी जो उस समय की सामाजिक स्थिति में असामान्य था।

गरिमा मिश्र

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