
अनुभव को राष्ट्रसेवा में बदलने का अवसर
मनुष्य के जीवन में 60 वर्ष की आयु एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस उम्र के बाद नौकरी या व्यावसायिक उत्तरदायित्व कम हो सकते हैं, लेकिन व्यक्ति की सामाजिक उपयोगिता कम नहीं होती। इसके विपरीत, छह दशकों का अनुभव, ज्ञान, सम्पर्क, धैर्य और व्यवहारिक समझ समाज के लिये महत्वपूर्ण पूँजी बन सकते हैं। इसलिये 60 वर्ष के बाद का जीवन केवल विश्राम का काल न होकर अनुभव को समाजसेवा में लगाने का अवसर भी हो सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, ग्रामीण विकास, संस्कार निर्माण और जरूरतमन्दों की सहायता जैसे अनेक क्षेत्रों में वरिष्ठ नागरिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारतीय आश्रम व्यवस्था
भारतीय चिन्तन में जीवन को चार आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास में विभाजित किया गया है। इसका उद्देश्य जीवन के अलग-अलग चरणों के दायित्वों को व्यवस्थित करना था। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति शिक्षा और कौशल प्राप्त कर स्वयं को पारिवारिक और सामाजिक दायित्व निभाने के योग्य बनाता है। गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति परिवार और समाज की जिम्मेदारियाँ निभाता है। इसके बाद वानप्रस्थ की अवधारणा व्यक्ति को धीरे-धीरे निजी मोह और व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर व्यापक सामाजिक तथा लोककल्याण की ओर प्रेरित करती है। आधुनिक सन्दर्भ में वानप्रस्थ का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि व्यक्ति परिवार के साथ रहते हुए अपने समय, अनुभव और संसाधनों का बड़ा हिस्सा समाज के लिये समर्पित करे।
नानाजी देशमुख का उदाहरण
नानाजी देशमुख इस विचार के अत्यन्त उल्लेखनीय उदाहरण हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लम्बे समय तक जुड़े रहने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से स्वयं को अलग कर ग्रामीण विकास को अपने जीवन का प्रमुख कार्य बनाया। उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से चित्रकूट क्षेत्र में ग्राम विकास, स्वावलंबन, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और जल-संरक्षण जैसे क्षेत्रों में काम किया। संस्थान के अनुसार चित्रकूट परियोजना में ग्रामीणों की भागीदारी के आधार पर स्वावलम्बन का मॉडल विकसित किया गया। नानाजी का उदाहरण विशेष रूप से इसलिये महत्वपूर्ण है है कि उन्होंने जीवन के उत्तरार्ध को सामाजिक पुनर्निर्माण के लिये समर्पित किया। उनका कार्य यह सन्देश देता है कि अनुभव और संगठन क्षमता को गाँवों और वंचित वर्गों के विकास में लगाया जा सकता है। भाऊराव देवरस का नाम भी सामाजिक कार्यों की चर्चा में प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने शिक्षा और समाज के वंचित वर्गों तक पहुँच बनाने वाले सेवा कार्यों को प्रोत्साहित किया। उनके कार्य से जुड़ी सेवा-परम्परा आगे चलकर विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों और सेवा परियोजनाओं के माध्यम से विस्तारित हुई। इसी प्रकार दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने श्रमिकों, किसानों और सामाजिक संगठनों के क्षेत्र में लम्बे समय तक काम किया। उन्होंने संगठित सामाजिक प्रयासों के माध्यम से विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और भागीदारी को बढावा देने का प्रयास किया। इन महापुरुषों के जीवन इस बात का उदाहरण हैं कि वरिष्ठ अवस्था में व्यक्ति केवल प्रत्यक्ष सेवा कार्य ही नहीं करता, बल्कि संस्थाओं और कार्यकर्ताओं को दिशा देने का काम भी कर सकता है।
सेवानिवृत्ति नहीं
हम किसी भी क्षेत्र में काम कर रहे हों, कभी सेवानिवृत्त नहीं मानना चाहिये। 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग अपने अनुभव के आधार पर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं, गरीब बच्चों की शिक्षा में सहयोग कर सकते हैं, पुस्तकालय या अध्ययन केन्द्र चला सकते हैं और युवाओं को जीवन-कौशल तथा करियर सम्बन्धी मार्गदर्शन दे सकते हैं। वे पौधारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छता, स्वास्थ्य जागरूकता और ग्राम विकास जैसे अभियानों से भी जुड़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, पारम्परिक ज्ञान और सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाने में उनकी भूमिका उपयोगी हो सकती है। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिक स्थानीय इतिहास, संस्कृति, लोक परम्पराओं और अपने जीवन के अनुभवों को नयी पीढ़ी तक पहुँचाकर सामाजिक स्मृति को सुरक्षित रखने का काम कर सकते हैं।
वरिष्ठ और युवा शक्ति का समन्वय
समाज निर्माण में वरिष्ठों और युवाओं की साझेदारी अत्यन्त उपयोगी हो सकती है। वरिष्ठ नागरिकों के पास अनुभव और धैर्य है, जबकि युवाओं के पास ऊर्जा, तकनीकी दक्षता और नयी सोच है। यदि वरिष्ठ अपने अनुभव से दिशा दे और युवा अपनी तकनीकी तथा संगठनात्मक क्षमता से उन विचारों को आगे बढ़ायें, तो अनेक सामाजिक परियोजनाओं को प्रभावी रूप दिया जा सकता है। यह पीढ़ियों के बीच संवाद का भी एक मजबूत माध्यम बन सकता है। सेवानिवृत्ति के बाद जीवन में खालीपन महसूस होने पर समाजसेवा व्यक्ति को नया उद्देश्य और सामाजिक जुड़ाव दे सकती है। सेवा के लिये किसी बड़े संगठन से जुड़ना अनिवार्य नहीं है। किसी विद्यार्थी को पढ़ाना, आभावग्रस्त की सहायता करना, पौधे लगाना, किसी गाँव में स्वच्छता अभियान चलाना या किसी युवा को अपने अनुभव से मार्गदर्शन देना भी समाजसेवा है।
जीवन का नया अध्याय
जीवन का उत्तरार्ध केवल व्यक्तिगत विश्राम के भारतीय आश्रम व्यवस्था में वानप्रस्थ की अवधारणा हमें यह सोचने का अवसर देती है कि लिये नहीं, बल्कि व्यापक लोककल्याण के लिये भी समर्पित किया जा सकता है। 60 वर्ष के बाद व्यक्ति के पास युवावस्था जैसी शारीरिक ऊर्जा भले न हो, लेकिन उसके पास अनुभव, विवेक और जीवन की गहरी समझ होती है इसलिये वरिष्ठ नागरिकों को समाज का निष्क्रिय वर्ग मानने के बजाय अनुभव की जीवित पूँजी के रूप में देखना चाहिये। यदि वरिष्ठों का अनुभव, युवाओं की ऊर्जा और समाज की सामूहिक भागीदारी एक साथ आये, तो सेवा और सामाजिक परिवर्तन की एक मजबूत धारा विकसित हो सकती है।