
प्रमुख महिला स्वाधीनता संग्राम सेनानी मातंगिनी हाजरा :
प्रमुख महिला स्वाधीनता संग्राम सेनानी मातंगिनी हाजरा का जन्म एक अत्यन्त गरीब बंगाली परिवार में हुआ था। तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार किसान परिवार की इस बेटी का विवाह मात्र 12 वर्ष की आयु में त्रिलोचन हाजरा से हुआ और 18 वर्ष की अवस्था तक पहुँचते ही उनके पति का निधन का हो गया। उन्होंने असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। वह एक गांधीवादी के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय हुईं। 1930 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भाग लिया और नमक अधिनियम तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार हुईं। रिहा होने के बाद उन्होंने चौकीदार बन्ध (चौकीदार कर उन्मूलन) आन्दोलन में भाग लिया और तत्कालीन राज्यपाल द्वारा आन्दोलन में भाग लेने वालों को दण्डित करने के लिये अवैध रूप से गठित अदालत के विरोध में नारे लगाते हुए अदालत भवन की ओर मार्च किया। अब उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया तथा छह महीने की सजा सुनाकर बहरामपुर जेल भेज दिया गया। जेल से बाहर आकर वह खादी के प्रचार-प्रसार में लग गयीं। 1930 के दशक में वे अछूतों के लिये सामाजिक कार्य करने लगीं। उन्होंने चेचक महामारी के फैलने पर मानव सेवा का कार्य किया।
उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी। भारत छोड़ो आन्दोलन के अन्तर्गत एक बार देशभक्तों ने मेदिनीपुर जिले के सरकारी कार्यालयों पर नियंत्रण करने की योजना बनायी। यह जिले में ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने का एक छोटा सा प्रयास था जिसका नेतृत्व मातंगिनी हाजरा ने किया था। उस समय 72 वर्षीय हाजरा ने छह हजार महिला स्वयंसेवकों का नेतृत्व किया। जुलूस के शहर के बाहरी इलाके में पहुँचने पर अंग्रेज पुलिस ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 144 के अन्तर्गत प्राप्त आदेश के चलते आगे बढ़ते ही उनको गोली मार दी। समानान्तर तामलुक राष्ट्रीय सरकार का समाचार पत्र बिप्लवी लिखता है- “मार्तगिनी ने आपराधिक न्यायालय भवन के उत्तर से एक जुलूस का नेतृत्व किया, गोलीबारी शुरू होने के बाद भी वह तिरंगे झण्डे के साथ आगे बढ़ती रही पुलिस ने उन्हें तीन बार गोली मारी। माथे ओर दोनों हाथों में घाव हो के बावजूद वह आगे बढ़ती रही। बार-बार गोली लगने के बावजूद वह वन्देमातरम का जाप करती रही। तिरंगे झण्डे को ऊँचा लहराते हुए वह बलिदान हो गयीं। स्वतंत्रता प्रप्ति के पश्चात कोलकाता में कई विद्यालयों, कालोनियों और सड़कों का नामकरण हाजरा के नाम पर किया गया। हाजरा के रूप में पहली महिला की प्रतिमा की स्थापना कोलकाता में 1977 में की गयी। वर्ष 2002 में भारत छोड़ो आन्दोलन के 60 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर उनके नाम से डाक टिकटों की एक श्रृंखला जारी की
गयी।