
शक्ति उपासना का पर्व विजयादशमी :
भारतीय समाज प्रकृति उपासक है। प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को हम पर्व के रूप में मनाते है। इन पर्वो का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व है तथा मनुष्य को सत्य आचरण की प्रेरणा देना भी है। जिनमें विजयादशमी का अपना विशेष महत्त्व है। जो असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। यह शिक्षा देता है कि राम का आचरण अनुकरणीय है रावण का नहीं और शक्तिस्वरूपा नारियों के श्रेष्ठतम स्वरूप का भी बोध करवाता है। जो वर्तमान समाज के लिए अत्यन्त आवश्यक है। जिस प्रकार से आज हमारा समाज पाश्चात्य जगत की विकृतियों को अपनाकर नष्ट होने की ओर अग्रसर है इस समय में इस पर्व का महत्त्व अधिक हो जाता है।
सृजनस्वरूपा स्त्री
स्त्री के बिना सृष्टि का सृजन नहीं हो सकता है। स्त्री सृजनकर्ता है इस विचार को अनेक वाम विचारकों ने गलत रूप से प्रचारित कर उसको भोग की वस्तु ऐसी संज्ञा दे दी। लेकिन यदि इस विचार के व्यापक स्वरूप को हम देखे तो अनेक समस्याओं से पराजित होकर मनोबल से हीन पुरुषों की चेतना को जागृत करने का काम महिलाओं ने ही किया। अर्थात् सुप्त हुई चेतना से एक नयी ऊर्जा का सञ्चार किया। ‘किरातार्जुनीयम्’ में द्रौपदी युधिष्ठिर को धिक्कारते हुए बोलती है कि जो शठ से शठता नहीं करते वे पराजय को प्राप्त करते हैं। (व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।) 1857 की क्रान्ति से पूर्व जब सैनिकों को कारावास में डाला जा रहा था भारतीय सिपाही चाह कर भी कुछ न कर सके लेकिन उन सिपाहियों को बाजार में महिलाओं ने तिरस्कृत किया। इस तिरस्कार ने क्रान्ति की ज्वाला में ईंधन का काम किया। जिसका उल्लेख वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में किया है। अपनी वीरता से महिलाओं ने समाज में व्याप्त अत्याचारों को भी समाप्त किया। पौराणिक प्रमाणों को देखे तो मार्कण्डेय पुराण में देवी द्वारा मधु-कैटभ, महिषासुर और रक्तबीज जैसे अप्रतिम योद्धाओं का नाश किया गया। महिषासुर जो अहं भाव का प्रतीक है, रक्तबीज जो विषयों की अभिलाषा है इन सबको देवी ने नष्ट किया। जो दिखाता है कि जीवन को संयमित बनाने के साथ-साथ स्त्री समाज की अनेक व्याप्त समस्याओं को समाप्त करने में समर्थ है। यह आख्यान आज भी प्रत्येक भारतीय परिवार में श्रद्धा के साथ पठनीय और श्रवणीय है। जिसके प्रभाव के रूप में हमें रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं के उत्तम चरित्र के दर्शन होते हैं। जिनसे प्रेरित होकर नेताजी ने पहली बार महिला रेजीमेंट को अपनी सेना में स्थान दिया। आज जिस प्रकार से पुरुषों की अभिलाषाओं का शिकार महिलाओं को होना पड़ रहा है उसने अशान्ति और अविश्वास को जन्म दे दिया है। अतः स्त्रियों को अस्त्रों और मल्लविद्याओं (कराटे) आदि का प्रशिक्षण देने के साथ उनके आत्मविश्वास को भी जगाना होगा तभी वे अपनी सुरक्षा में सिद्ध होंगी। दूसरी ओर पुरूषों को भी अपने आचरण को शोधित करना होगा। उनका पतित आचरण उन्हें रावण के समान समूल नष्ट कर देगा। रावण विद्वान् था लेकिन सीता जी को अपहृत कर ले जाने से उसने अपना सब कुछ क्षणभर में नष्ट कर दिया।
भक्तिपरायणा स्त्री
औषधि से तन की स्वच्छता हो सकती है लेकिन हृदय की स्वच्छता तो भक्ति से होती है। समाज में अच्छायी और बुरायी दोनों विद्यमान है। अतः दोनों का प्रभाव मनुष्य पर होता है। भारतीय समाज में पहले कथाओं के माध्यम से ज्ञान का विस्तार होता था जो घर-घर तक महिलाओं के माध्यम से पहुँचता था। जो लघु कथा का रूप बनकर घर के सदस्यों में विस्तार पाता था। इसके अतिरिक्त इन विचारों का सूक्ष्म फैलाव भोजन के द्वारा भी होता था क्योंकि भोजनशाला का दायित्व इनके पास होने के कारण उसके निर्माण के समय मन में सात्विक विचारों के कारण परिवार में शान्ति, सात्विक विचारों की आभा विद्यमान होती थी जिससे आत्महत्या, आपसी विरोध जैसी घटनाएँ अल्पतम होती थी। अतः महिलाओं के शास्त्रज्ञान की गूढ़ता का बोध भी इससे होता है कि किस प्रकार शास्त्रश्रवण से उन्हें गूढ़ विषयों की सूक्ष्मतम जानकारी थी। इस बात को न समझकर अज्ञानी लोगों ने हमपर आरोप लगाया कि हमारे यहाँ स्त्रियाँ अज्ञानी और गुलाम थी। प्रसिद्ध उद्योगपति सुभाष चन्द्रा अपनी जीवनी में लिखते हैं कि उनके परिवार द्वारा विवाह से पूर्व उनके पत्नी की अनेक परीक्षाओं में एक परीक्षा रामायण और महाभारत की भी ली गई। अर्थात् हमारे वयोवृद्ध सुसंगठित, संस्कार सम्पन्न और शान्त जीवन को लेकर कितने सचेत थे यह मनन करने योग्य है।
मर्यादित जीवन
शास्त्रकारों का कथन है कि स्वभाव मनुष्य की मूर्धा पर स्थित होता है। क्योंकि इससे ही शत्रु और मित्र बनते हैं। अच्छे स्वभाव हेतु मर्यादित जीवन का होना आवश्यक है। वर्तमान समाज जो ब्रिटिशों द्वारा निर्मित विचारों पर चल रहा है। उसको सीता जी के मर्यादित जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिये कि किस प्रकार पति के राज्य नष्ट होने, परपुरुष के द्वारा अपहृत किए जाने के बाद भी उनकी निष्ठा राम में रही। वें राम का त्याग कर सकती थी अथवा रावण को स्वीकार कर सकती थी। अतः सीता ने अपनी मर्यादा का त्याग न करके धैर्य धारण किया। इसलिये महर्षि वाल्मीकि ने लिखा कि सीतायाश्चरितं महत्। वर्तमान में जिस प्रकार पुरुषों जीवन की समस्याओं के देखकर महिलायें यत्र-तत्र गमन कर जाती हैं उन्हें सीता जी के चरित से शिक्षा लेनी चाहिये