
शिक्षा, राष्ट्रबोध और विकास पर मुस्लिम समाज के आत्ममंथन का समय
भारत पर कब्जा करने के साथ ही अंग्रेजी हुकूमत ने तीन तरह के विषाक्त बीज बोये, जो आज देश के लिये दंश बन चुके हैं। पहले उन्होंने भारतीय संस्कृति पर अतिक्रमण करके शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस किया। फिर हरिजन वर्ग को सवर्ण समाज के विरुद्ध करने का षड्यंत्र रचा। अन्त में विभाजन का कुठाराघात करने से पूर्व ही भारतीय मुस्लिमों को भारतीयता से पृथक करने की साजिश रच दी। समय बदलता गया। विद्वेश से सिंचित होकर वे तीनों बीज पौधे से वृक्ष बनते हुए जंगल का बन गये। आज यही देश के लिये नासूर बन गये हैं। सम्भवतः यही कारण है कि डॉ. भीमराव आम्बेडकर को ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ पुस्तक में यह उल्लेख करना पड़ा कि स्वाधीन भारत में रह रहा मुस्लिम आज भी भारतीय मुस्लिम नहीं हो पाया है। आज भारतीयता को बिसराते ऐसे ही मुस्लिम समाज को थोड़ा करीब से समझने का प्रयास करते हैं। हाल ही में भारतीय मुसलमानों को सम्बोधित करते हुए दो व्याख्यान पूरी दुनिया की चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं। एक कथन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का, जिसमें वे कह रहे हैं, ‘भारत में रह रहे वे हिन्दू जो यह चाहते हैं कि मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिये, वे हिन्दू नहीं हैं।’ वहीं, दूसरा वक्तव्य है देश के पूर्व उपराष्ट्रपति रह चुके हामिद अंसारी का, जिसमें वे आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘भारतीयता को दक्षिणपंथी विचारधारा से सबसे ज्यादा खतरा है।’ इन दोनों ही कथनों में गौर करने वाली बात यह है कि पहला बयान उस व्यक्तित्व का है, जो दक्षिणपंथ और भारतीयता के सबसे बड़े संगठन के सिरमौर हैं, जबकि दूसरा व्यक्ति देश की बड़ी और जिम्मेदार और आस्थावान वाले पद उपराष्ट्रपति के पद पर आसीन रह चुका है।
ऐसे में यह सोचना बड़ा ही दुखदायी है कि जब देश में अपनी योग्यता के दम पर एक आदमी उपराष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद भी स्वयं को मात्र मुस्लिम ही कहता है। उसे देश की संवैधानिक संरचना और मौलिकता पर भी विश्वास नहीं है। दक्षिणपंथ को आतंकी विचारधारा की तरह मंच से परिभाषित करते हुए वे इस बात को भूल जाते हैं कि हिन्दू बहुल इसी देश में उन्हें सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया गया है। वे अपनी इस उपलब्धि को भारत का परियय नहीं बताते। वे मुस्लिम युवाओं को देश के पूर्व राष्ट्रपति एवं मिसाइल मैन के नाम से विख्यात डॉ. अब्दुल कलाम आजाद का उदाहरण नहीं देते। वे तो बस उन युवा मुस्लिमों के कोमल मन में हिन्दुओं से नफरत करने का बीज रोपने में ही मदमस्त हैं।
अजब है कि आज भी भारत की प्रतिभा और पहचान बन सकने वाले बाल एवं युवा मुस्लिमों को उनके मौलवी यह नहीं बताते कि भारत में रह रहे मुस्लिमों का विकास दर अन्य देशों के सापेक्ष कितना उच्च है। वे उन्हें यह नहीं बताते कि देश में मन्दिरों से कहीं ज्यादा मस्जिद ॐॐऔर मजार हैं। हिन्दू बहुल देश में एक इको सिस्टम मुस्लमानों का बड़ा से बचाने के लिये खिदमतगार है। वह उन्हें हर समस्या तत्पर रहता है। कई मामलों में तो देखा गया है कि आतंकी वारदातों में संलिप्तता होने के बाद भी उन्हें पूरा कानूनी संरक्षण देने का कुकृत्य रचा जाता है। सड़कों पर उन्हें पीड़ित के तौर पर पहचान दिलाने के लिये आन्दोलन सञ्चालित किये जाते हैं। कई राजनीतिक दल उन्हें बचाने के लिये देश की सम्प्रभूता और अखण्डता को भी ठेंगा दिखाने से बाज नहीं आते। ऐसे में उन्हें तो इस देश का गुणगान करना चाहिये। मगर होता इसके उलट है। बालपन से ही मुस्लिमों के मन यह द्वेष भरा जाता है कि इस देश का हिन्दू वर्ग उनका सबसे बड़ा दुश्मन है। उन्हें कभी भी काकोरी काण्ड के नायक अशफाकउल्ला खान, 1857 की क्रान्ति के महानायक पीर अली खान, अमानत अली, सलामत अली व शेख हारो और भारतीय सेना के बलिदानी अब्दुल हमीद जैसे वीर सेनानियों के बारे में नहीं बताया जाता। उन्हें मिसाइलमैन डॉ. कलाम की जीवनी से सीख लेने की सलाह नहीं दी जाती। उन्हें यह नहीं बताया जाता कि आधुनिक शिक्षा को ग्रहण करके वे भी अपना जीवन, अपने परिवार की जीवनशैली, अपने समाज और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। उन्हें तो बस संसद पर हमला करने वाले मोहम्मद अफ़जल गुरु को ‘महानायक’ की तरह देखने और समझने की सलाह दी जाती है। उन्हें खूंखार आतंकी बुरहान वानी को शोषित और पीड़ित समझने का वैचारिक चश्मा पहनाया जाता है।
ऐसे ही जहरीले विचारों का पोषण देने का परिणाम था कि 10 नवम्बर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास एक पेशेवर डॉक्टर उमर उन नबी ने आतंकी वारदात को अंजाम देते हुए कार में बम से विस्फोट कर आठ लोगों की जान ले ली थी। जाँच के बाद इसमें कई अन्य डॉक्टर जैसे डॉ. मुजम्मिल शकील, सहारनपुर से डॉ. अदील अहमद राथर, लखनऊ से डॉ. शाहीन सईद और बारामुला से डॉ. बिलाल नासिर मल्ला समेत 18 से अधिक संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया है।
यही कारण है कि आज भी अपनी जनसंख्या के अनुरूप भारतीय मुस्लिम उतना विकास नहीं पा सका जिसे वह पा सकता था। हालाँकि, अब समय है कि मुस्लिम बुद्धिजीवियों को अपनी त्याग कर देना चाहिये। कौम का भला चाहते हुए ऐसे दूषित विचारों का त्याग कर देना चाहिये।