
ब्रह्मगुप्त : बीजगणित के पितामह
आजादी के अमृत काल के पश्चात जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष (२०४७) की ओर अग्रसर है, तब यह अनिवार्य है कि हम अपनी बौद्धिक संपदा का पुनर्मूल्यांकन करें, वैचारिक दास्तों से मुक्ति की ओर आगे बढ़ें। पश्चिम-केंद्रित दृष्टिकोण ने सदियों तक यह स्थापित करने का प्रयास किया कि आधुनिक विज्ञान की उत्पत्ति केवल यूरोप या उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में हुई। लेकिन सत्य यह है कि जब यूरोप ‘अंधकार युग’ (Dark Ages) में था, तब भारत के नालंदा और उज्जैन जैसे केंद्रों में विद्वान आचार्य खगोलशास्त्र और गणित के जटिल रहस्यों को सुलझा रहे थे। अमृतकालीन भारत के ‘पंच प्रण’ में से एक है- ‘गुलामी की मानसिकता से मुक्ति’। विज्ञान के इतिहास में अक्सर ‘पश्चिम-केंद्रित’ दृष्टिकोण के कारण अनेक – महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों का श्रेय उन संकलनकर्ताओं को मिल गया जिन्होंने भारतीय ज्ञान का अनुवाद किया।
भारत को विश्व पटल पर यदि उसकी सबसे बड़ी देन के लिए याद किया जाता है, तो वह है ‘गणित’। आधुनिक विज्ञान, कम्प्यूटर कोडिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की पूरी इमारत जिस नींव पर खड़ी है, वह है- शून्य और दशमलव पद्धति। किंतु, इतिहास की विडंबना देखिए कि इस नींव को रखने वाले महापुरुषों के नाम अक्सर पश्चिम-केंद्रित इतिहास के धुंधलके में खो गये। आज समय है कि हम बीजगणित के वास्तविक स्रोत को पहचानें और गौरव के साथ उद्घोष करें कि आधुनिक गणित की नींव आचार्य ब्रह्मगुप्त ने रखी थी।
राजस्थान के जालोर जिले का प्राचीन नगर भीनमाल (श्रीमाल) वह पावन भूमि है, जिसे ‘बीजगणित की गंगोत्री’ कहा जाना चाहिए। ७वीं शताब्दी में इसी नगर में महान गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का जन्म हुआ। यह वह काल था जब भीनमाल विद्या और संस्कृति का शिखर था। ब्रह्मगुप्त ने ६२८ ईस्वी में अपने कालजयी ग्रंथ ब्रह्मास्फुट सिद्धांत’ की रचना की, जिसने वैश्विक गणितीय चेतना को जन्म दिया।
यह वह दौर था जब जालोर भीनमाल क्षेत्र केवल सत्ता का केंद्र नहीं बल्कि महाकवि माघ जैसे मनीषियों की कर्मभूमि और बौद्धिक चेतना का शिखर था। यहाँ ६२८ ईस्वी में ब्रह्मगुप्त ने अपने कालजयी ग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत की रचना की।
सामान्य जनमानस और कई बार अकादमिक जगत् में भी यह धारणा प्रचलित है कि ‘शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट ने किया। किंतु ऐतिहासिक तथ्य इसके विपरीत हैं। ५वीं शताब्दी के महान आचार्य आर्यभट्ट का मुख्य कार्यक्षेत्र खगोल विज्ञान (Astronomy) था। उन्होंने पृथ्वी के घूर्णन, ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या और ‘पाई’ (\pi) के सटीक मान पर अद्भुत कार्य किया। उनके ग्रंथों में शून्य का स्थान-मूल्य (Place Value) के रूप में संकेत तो मिलता है, परंतु शून्य के गणितीय उपयोग का कोई नियम नहीं मिलता। शून्य को एक ‘संख्या के रूप में स्थापित करने और उसके साथ गणितीय संक्रियाओं (जोड़, घटाव, गुणा, भाग) के नियम प्रतिपादित करने का वास्तविक श्रेय केवल और केवल ब्रह्मगुप्त को जाता है। उन्होंने ही विश्व को बताया कि शून्य मात्र एक ‘रिक्त स्थान नहीं, बल्कि एक पूर्ण गणितीय इकाई है।
बीजगणित के वास्तविक पितामह ब्रह्मगुप्त हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है। यद्यपि वीं शताब्दी के अरब गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी को दुनिया ‘बीजगणित का पिता’ मानती है, क्योंकि यूरोप ने बीजगणित उनके माध्यम से सीखा लेकिन सत्य यह है कि अल-ख्वारिज्मी के जन्म से लगभग २०० वर्ष पूर्व ब्रह्मगुप्त ने बीजगणित के उन सिद्धांतों का प्रतिपादन कर दिया था, जिन्हें आज हम आधुनिक बीजगणित का आधार मानते हैं। जैसे ऋणात्मक संख्याएँ (Negative Numbers): ब्रह्मगुप्त पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘धन’ (संपत्ति) और ‘ऋण’ (कर्ज) की अवधारणा दी। उन्होंने नियम दिया कि ‘दो ऋण संख्याओं का गुणनफल धन होता है जो आज भी बीजगणित का मूलभूत नियम है।
द्विघात समीकरण (Quadratic Equations): ax^2 + bx + c = 0 जैसे जटिल समीकरणों को हल करने का सूत्र ब्रह्मगुप्त ने ही दिया था। चक्रीय चतुर्भुज (Cyclic Quadrilateral): ज्यामिति में बीजगणित का प्रयोग करते हुए उन्होंने वह प्रसिद्ध सूत्र दिया जिसे आज ‘ब्रह्मगुप्त सूत्र’ कहा जाता है। ब्रह्मगुप्त द्वारा शून्य के प्रमुख नियम प्रतिपादित किए गए। उन्होंने बताया कि शून्य को किसी संख्या में जोड़ने पर वह संख्या अपरिवर्तित रहती है। शून्य से किसी भी संख्या का गुणनफल सदैव शून्य होता है। ऋण (negative) संख्याओं का योग ऋण होता है और उनका गुणनफल धन (positive) होता है।
ब्रह्मगुप्त ने केवल अमूर्त संख्याओं के साथ ही नहीं, बल्कि ज्यामिति में भी बीजगणित का अद्भुत प्रयोग किया। उन्होंने एक ऐसे चतुर्भुज के क्षेत्रफल का सूत्र दिया जिसके चारों शीर्ष (Vertices) एक वृत्त की परिधि पर स्थित हों। इसे ‘ब्रह्मगुप्त सूत्र’ के नाम से जाना जाता है। यदि किसी चक्रीय चतुर्भुज की भुजाएँ a, b, c और d हों, तो उसका क्षेत्रफल (K) निकालने के लिए उन्होंने अर्ध-परिधि (5) की अवधारणा का उपयोग किया: [a+b+c+d] / 2 और इसके आधार पर क्षेत्रफल निकालने के सूत्र सिद्ध किये जो हीरोन के त्रिभुज वाले सूत्र का एक व्यापक और अत्यंत परिष्कृत रूप है। आधुनिक गणितज्ञ आज भी इस बात पर अचंभित होते हैं कि बिना किसी आधुनिक यंत्र या कंप्यूटर के ७ीं शताब्दी में इतनी जटिल गणनाएँ और सूत्र कैसे प्रतिपादित किए गए। ब्रह्मगुप्त केवल संख्याओं के ज्ञाता नहीं थे, वे एक महान खगोलशास्त्री भी थे। उन्होंने पृथ्वी की परिधि की गणना की और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की ओर इशारा करते हुए कहा था- “जैसे पानी का स्वभाव बहना है. वैसे ही पृथ्वी का स्वभाव वस्तुओं को अपनी ओर खींचना है।” यह कथन न्यूटन से एक हजार वर्ष पूर्व का है। उनके इसी विराट व्यक्तित्व के कारण उन्हें ‘गणकचक्रचूड़ामणि (गणितज्ञों के मुकुट का रत्न) कहा गया।
ज्ञान के वैश्विक प्रवास की कथा अद्भुत है। यह राजस्थान के जालोर से यूरोप तक की यात्रा है। दवीं शताब्दी में खलीफा अल-मंसूर के काल में भारतीय विद्वान ‘ब्रह्मस्फुट सिद्धांत’ लेकर बगदाद पहुँचे। अरबी में इसका अनुवाद ‘सिंघहिंद’ (Sindhind) नाम से हुआ। अल-ख्वारिज्मी ने इसी ‘सिंधहिंद’ का अध्ययन किया और भारतीय अंक प्रणाली (०-६) को अपनाया। जिसे अरबों ने हिंदसा’ (भारत से आया हुआ) कहा और बाद में यूरोप ने इसे ‘अरबी अंक’ समझ लिया। ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुट सिद्धांत के अरबी अनुवाद के आधार पर अल-ख्वारिज्मी ने अपनी व्याख्याएँ लिखीं। बाद में यही ज्ञान यूरोप पहुँचा। उनकी पुस्तक अल-जब के आधार पर अलजेब्रा शब्द बना। १२वीं शताब्दी में इटली के गणितज्ञ फिबोनाची ने इन्हीं हिंदू अरबी अंकों को यूरोप में प्रसारित किया। स्पष्ट है कि जिस ज्ञान को आज दुनिया ‘अरबी अंक’ कहती है. उसकी गंगोत्री भारत की मिट्टी से निकली थी। जो बीजगणित आज पूरी दुनिया पढ़ रही है, उसका बीज ब्रह्मगुप्त द्वारा बोया गया था। अल-ख्वारिज्मी एक कुशल संकलनकर्ता और प्रसारक थे, लेकिन मूल सिद्धांतकार ब्रह्मगुप्त थे।
आज भारत में अपनी गौरवशाली विरासत का संरक्षण करने की आवश्यकता है। विकसित भारत के संकल्प की मध्य वेला में हमें यह समझना होगा कि गणित और विज्ञान हमारी रगों में है। जब हमारे विद्यालयों में विद्यार्थी यह जानेंगे कि बीजगणित का मूल उनके अपने पूर्वज ब्रह्मगुप्त ने लिखा था, तो उनमें एक नया आत्मविश्वास जाग्रत होगा। यह केवल अतीत की बात नहीं है, बल्कि भविष्य के मौलिक अनुसंधानों की नींव है। आर्यभट्ट ने जहाँ खगोल विज्ञान में भारत का ध्वज फहराया, वहीं ब्रह्मगुप्त ने शून्य और बीजगणित को नियमबद्ध कर आधुनिक विज्ञान को संभव बनाया। भारत में प्रवाहित ज्ञान की यह धारा ही वैश्विक सभ्यता की वास्तविक गंगोत्री है। ब्रह्मगुप्त को बीजगणित का पितामह स्वीकार करना केवल भावुकता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय है।