
आत्मनिर्भर भारत * हिंदी भाषा का योगदान
हिं दी भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है अपितु यह भारत की आत्मा, संस्कृति और सामाजिक चेतना से जुड़ी भाषा है। यह करोड़ों भारतीयों को आपस में जोड़ने वाली भाषा है। आज जब भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है तब हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की भूमिका भी पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना नहीं है। आत्मनिर्भरता का व्यापक अर्थ है, अपने ज्ञान, कौशल, संसाधनों, तकनीक, संस्कृति और क्षमताओं पर विश्वास करना। इस दृष्टि से भाषा भी आत्मनिर्भरता का एक महत्वपूर्ण आधार है। जिस देश का नागरिक अपनी भाषा में ज्ञान की समझ सकता है और विज्ञान और तकनीक का उपयोग अपनी भाषा में कर सकता है, उसकी भागीदारी विकास की प्रक्रिया में और व्यापक हो जाती है। ज्ञान तभी वास्तबिक शक्ति बनता है जब वह समाज के एक बड़े वर्ग तक पहुंच पाए। अगर यह केवल भाषा के सीमित दायरे में बंध जाए तो विकास संभव नहीं है। भारत देश के परिप्रेक्ष्य में अगर हम बात करें तो यह स्पष्ट है कि हिंदी भाषा ही केवल मात्र एक ऐसी भाषा है जो इस अंतर को समाप्त करने की क्षमता रखती है।
हमारे सामने ऐसे कई देशों के उदाहरण हैं जिन्होंने गुलामी के बाद जब स्वतंत्रता प्राप्त की तो अपने विकास के लिए जिन अनिवार्य क्षेत्रों को महत्व दिया, उनमें से भाषा सबसे प्रमुख थी। तुर्की अपनी भाषा को अपनाकर और उसी में अपना समस्त कार्य और व्यवहार करने वाले यह सभी देश आज अग्रणी पौल में खड़े हैं। अपनी भाषा में अपने देश की संस्कृक्ति, ज्ञान, विज्ञान और तकनीक के साथ जुड़ाव होता है। इसलिए उन सभी की अधिकारिक भाषा उनकी अपनी मातृभाषा है। परंतु भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी हम अंग्रेजी की उस मानसिक दासता से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। यहां तक की महात्मा गांधी के स्वराज और स्वदेशी की परिकल्पना के आधार पर भी स्वभाषा को उत्तम स्थान नहीं दिला पा रहे हैं। स्वातंवता से पूर्व स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दौरान और स्वतंत्रता प्रासिके बाद भी हिंदी भाषा उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पक्षिय तक संपर्क की भाषा स्वतंत्रताप्रति के लिए संघर्ष के दौरान जिन साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता
काविमर्श स्थापित किया गया उनकी हिंदी ही थी। उसी के कारण समस्त राष्ट्र को एकजुट किया जा सका। राष्ट्र कवियों, क्रांतिकारियों, समाज सुधारकों, साधु-संतों की भाषा हिंदी है। भारत के राजनेता उस समय चाहते तो विदेशी भाषा को बाहर कर हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दे सकते थे, परंतु उनकी संकीर्ण सोच के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया और अंग्रेजों को ही राजकाज को भाषा बनाए रखा। उसी का परिणाम है कि वर्तमान में भाषाओं के मध्य ऐसा झगड़ा प्रारंभ हो गया कि भारतीय भाषाएं अपने ही घर में एक दूसरे के विरोधी हो गई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के समय से ही समाज के संगठन की बात करता है और क्षेत्र और भाषा के आधार पर समाज के विघटन को नकारता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् मार्च, 1950 को रोहतक में’ हरियाणा प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का आयोजन हुआ था। इस अवसर पर संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी ने अपने उद्बोधन में कहा था, ‘भारतीय भाषाओं का आपस में कोई झगड़ा नहीं है। यह देश की सभी भाषाएं हमारी हैं। अपनी हैं हमारे ही राष्ट्र की हैं और सभी समान प्रेम और आदर की पात्र हैं। परकिय आक्रमण से पूर्व हम अपनी ही भाषा में संवाद करते थे।’ इसी प्रकार साम्यवादियों द्वारा जब भाषा के आधार पर अलगाव के बीज बोने का प्रयास किया गया तो वर्ष 1965 में श्री गुरु जी ने भारत की एकता और अखंडता के लिए हिंदी की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा था कि, ‘हिंदी का अध्ययन अपने धर्म और संरकृति की परंपरा का ही अध्ययन है। हिंदी का विस्तार अपने जीवन का ही विस्तार है। अतः हिंदी को संपूर्ण भारत के जीवन की कड़ी के रूप में स्वीकार करना और उसका इस दृष्टि से विकास करना अपने राष्ट्रीय जीवन का ही विस्तार है। देश की भाषाओं भाषाओं में सबसे प्रचलित हिंदी भाषा को यदि हम ग्रहण करके नहीं चले तो थोड़े ही दिनों में भाषाओं के आधार पर देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’ आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल कारखानों, स्टार्टअप और तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होगा। इसके लिए आत्मविश्वासी नागरिक, मजबूत ज्ञान-व्यवस्था और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा समाज भी चाहिए। भाषा इस पूरी प्रक्रिया की आधारशिला है। हिंदी भारत के करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति की शक्ति है। यदि इस शक्ति को आधुनिक ज्ञान विज्ञान तकनीक और उद्यमिता से जोड दिया जाए तो हिंदी आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
डॉ. अवनीश कुमार