विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ

विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ
विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ

विरोध : अधिकार एवं सीमाएँ

किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वहाँ सब कुछ कितना शान्त है, बल्कि इससे होती है कि सरकार विरोध की आवाज को कितना सुनती है? आजादी की लड़ायी से लेकर आज तक, अपनी बात खुलकर कहना हमारे लोकतंत्र की नींव रहा है। जैसे कि यजुर्वेद के नौवें अध्याय की 23वीं कण्डिका में कहा गया है-

‘वयं राष्ट्र जागृयाम पुरोहिताः’

इसका अर्थ है, ‘हम पुरोहित/प्रहरी (पुर का हित करने वाला) राष्ट्र को सदैव जीवन्त और जाग्रत बनाए रखेंगे।’

आज इंटरनेट के दौर में यह जागरण बनाये रखना तो बहुत आसान हैं परन्तु उसकी वास्तविकता पहचानना अत्यन्त कठिन। जहाँ सोशल मीडिया पर कोई भी आन्दोलन मिनटों में खड़ा हो जाता है, और जब तक उसकी सच्चायी पता चलती है तब तक उसका यह उद्देश्य आधी दूरी तय कर चुका होता है। अतः उसके मूल में झाँकना अत्यन्त आवश्यक होता है, तथा यह समझना बहुत आवश्यक हो जाता है कि विरोध दर्ज कराने की सही सीमा सीमाएँ क्या हैं ? और ये विरोध कैसे उपद्रव में बदल जाते हैं? उपद्रव कहाँ से शुरू होते हैं? और कैसे काम करते हैं?
हाल के वर्षों में, देश ने परीक्षा प्रणालियों में कथित गलतियों के विरोध में युवाओं और छात्रों द्वारा पूरे देश में नीट (NEET) परीक्षा विवाद आन्दोलन का अनुभव किया है। ये आन्दोलन दिखाते हैं कि जब समाज के एक बड़े हिस्से में असन्तोष बढ़ता है, तो वह सार्वजनिक रूप से अपनी असहमति दिखाता है। साथ ही, इन आन्दोलनों ने यह साफ किया है कि भावनात्मक सक्रियता और कानूनी सीमाओं के बीच का फर्क समझना अब सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि कानूनी सुरक्षा के लिये जरूरी हो गया है।


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शान्तिपूर्ण एकत्रीकरण का आधार प्रदान करता है। अनुच्छेद 19 (1) (a) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारण्टी देता है, जबकि अनुच्छेद 19 (1) (b) नागरिकों को बिना हथियारों के शान्तिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। साथ ही, संविधान अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों और प्रतिबन्धों का भी सन्तुलन स्थापित करता है। देश की सम्प्रभुता, अखण्डता और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिये इन अधिकारों पर ‘तर्कसंगत प्रतिबन्ध’ लगाये गये हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग (अमित साहनी बनाम कमिश्नर ऑफ पुलिस, 2020) मामले में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर अनिश्चितकालीन कब्जा स्वीकार्य नहीं है, और विरोध प्रदर्शन केवल प्रशासन द्वारा निर्धारित स्थानों पर ही किये जाने चाहिये। रामलीला मैदान मामले में न्यायालय ने शान्तिपूर्ण विरोध को लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’ बताया। अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में यह भी कहा गया कि राज्य की कार्रवाई सदैव ‘आनुपातिक’ होनी चाहिये और प्रतिबन्ध न्यूनतम आवश्यक तक सीमित रहने चाहिये। नीट विवाद के दौरान प्रशासनिक भवनों के समक्ष चक्काजाम की स्थिति में, अदालत को नागरिकों के आवागमन के अधिकार की रक्षा हेतु हस्तक्षेप करना पड़ा। ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि विरोध का अधिकार वहीं तक सुरक्षित है, जहाँ तक वह अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लन्धन नहीं करता। सार्वजनिक मार्गों को अवरुद्ध करना या सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना विधिसम्मत अपराध है।


अगर किसी नागरिक के विरोध करने या कहीं भी आने-जाने की आजादी छीनी जाती है, तो वे कानून का सहारा ले सकते हैं। इसके लिये वे अनुच्छेद 32 या 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं, मानवाधिकार आयोग या लोक शिकायत विभाग में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं, या फिर मीडिया और सामाजिक मंचों के जरिये अपनी बात उठाकर अपने सम्वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।


मर्यादा की सीमा: तीखा असन्तोष बनाम अपमानजनक भाषा

आन्दोलनों के चरम पर प्रायः भाषा की मर्यादा भंग हो जाती है। नीट विवाद के दौरान छात्रों का आक्रोश तीव्र था, किन्तु कुछ मंचों पर राजनेताओं और संस्थाओं के विरुद्ध व्यक्तिगत एवं अमर्यादित शब्दों का प्रयोग भी देखने को मिला। ऐसे अपशब्दों को क्या विरोध के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है?

मर्यादा की सीमा: तीखा असन्तोष बनाम अपमानजनक भाषा


नागरिक अधिकारों के समर्थक प्रायः श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख करते हैं, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि कोई भाषण केवल इस आधार पर प्रतिबन्धित नहीं किया जा सकता कि वह किसी के लिये ‘अप्रिय’ या ‘असहज’ है। लोकतंत्र में तीखी राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य और सत्ता-विरोधी नारे अभिव्यक्ति के अभिन्न अंग हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में नीट आन्दोलन से जुड़े छात्र प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध राज्य द्वारा की गयी अत्यधिक दण्डात्मक कार्रवाइयों पर रोक लगाते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि केवल आवेश में की गयी तीखी बयानबाजी को गम्भीर अपराध नहीं माना जा सकता। किन्तु जब भाषा अभिव्यक्ति की सीमा पार कर किसी व्यक्ति का अपमान करने, पुलिसकर्मियों को भयभीत करने या समाज में वैमनस्य फैलाने का साधन बनती है, तब उसका संवैधानिक संरक्षण समाप्त हो जाता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल तब तक सुरक्षित है जब तक वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या किसी की प्रतिष्ठा को क्षति नहीं पहुँचाती। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘हेट स्पीच’, व्यक्तिगत मानहानि या भय और घृणा फैलाने वाले भाषण संविधान की धारा 19(2) के अन्तर्गत दण्डनीय हैं। इसी प्रकार, कोई भी वक्तव्य या पोस्ट जो सार्वजनिक शान्ति भंग करने या समुदायों में शत्रुता उत्पन्न करने का उद्देश्य रखता है, वह अपराध की श्रेणी में आता है। असन्तोष की भाषा में तर्क और विवेक होना चाहिये, विष नहीं।

भारतीय दंड संहिता (IPC) के स्थान पर लागू हुई भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने और अभद्र व्यवहार करने वालों के विरुद्ध कानूनी प्रावधानों को और अधिक स्पष्ट तथा कठोर बना दिया है। आन्दोलनों में भाग लेने वाले युवाओं को निम्नलिखित तीन धाराओं के प्रति विशेष सतर्कता बरतनी चाहिये :

धारा 352 (शान्ति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) : यदि कोई प्रदर्शनकारी जानबूझकर ऐसी अपमानजनक भाषा या व्यवहार करता है जिससे सार्वजनिक शान्ति भंग होने की पूरी आशंका हो (जैसे सुरक्षा बलों को उकसाना), तो उसे दो साल तक की जेल हो सकती है।

धारा 353 (सार्वजनिक उपद्रव फैलाने वाले बयान) : डिजिटल युग में यह धारा सबसे संवेदनशील है। नीट आन्दोलन के दौरान व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर कई भ्रामक खबरें फैलायी गयी। डिजिटल माध्यमों से ऐसी कोई भी अफवाह या उत्तेजक बयान प्रसारित करना, जो जनता में डर पैदा करें या साम्प्रदायिक नफरत भड़कायें, इस धारा के तहत गम्भीर और गैर-जमानती अपराध है। इसमें 3 से 5 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।

धारा 356 (मानहानि): किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाले बयानों के लिये इस धारा के तहत सजा दी जाती है। इस नये कानून की खास बात यह है कि इसमें जेल और जुर्माने के साथ-साथ ‘सामुदायिक सेवा’ का एक सुधारात्मक विकल्प भी जोड़ा गया है।

हाल के आन्दोलनों में जिस प्रकार प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध सोशल मीडिया पोस्ट या तीखे बयानों के आधार पर ‘जीरो एफआईआर दर्ज की गयी हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य अब केवल सड़कों पर होने वाली शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि वाणी और डिजिटल माध्यमों से प्रसारित विचारों पर भी कड़ी निगरानी रख रहा है। (Sharma, 2022, pp. 45-67)

यदि भावी पीढ़ी को नीट विवाद या पेपर लीक जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने के दौरान अनजाने में कानूनी जटिलताओं से बचाना है, तो शिक्षा व्यवस्था और नागरिक समाज के दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। (Reddy & Desai, n.d.) इसके लिये कुछ ठोस शैक्षिक सुधार आवश्यक हैं :

विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर नागरिक शास्त्र के पाठ्यक्रम में ‘संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य’, ‘विरोध के कानूनी दायरे’ और ‘साइबर कानून’ जैसे अनिवार्य मॉड्यूल सम्मिलित किये जायें।

विधि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नियमित ‘लीगल एड क्लीनिक’ स्थापित की जायें, जहाँ छात्र व्यावहारिक रूप में जनहित याचिका, रिट याचिका, एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर निःशुल्क परामर्श प्राप्त कर सकें।

विद्यार्थियों के लिए प्रत्येक सत्र में ‘मॉक ट्रायल’ और ‘विरोध की नैतिकता व कानूनी सीमाओं पर वाद-विवाद अनिवार्य किया जाये, जिससे उनकी व्यवहारिक समझ विकसित हो। सार्वजनिक विरोध, डिजिटल नागरिकता और जिम्मेदार नेतृत्व पर आधारित प्रायोगिक परियोजनाओं को मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जाए, ताकि छात्र विरोध के अधिकार का प्रयोग जिम्मेदारीपूर्वक करना सीख सकें।

आलोचना लोकतंत्र के लिये आवश्यक है; इसके अभाव में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। असन्तोष को विषाक्त होने से बचाने और युवाओं को सही दिशा देने की जिम्मेदारी केवल कानून या राज्य की नहीं है। इस दिशा में शैक्षणिक संस्थाओं के साथ-साथ परिवार एवं समाज की भी महत्वपूर्ण और साझा जिम्मेदारी है :

परिवार की भूमिका : परिवार बच्चों में बचपन से ही तर्कसंगत संवाद और भाषा की मर्यादा के संस्कार विकसित करें, ताकि वे आवेश में आकर अमर्यादित न हों।

समाज की जिम्मेदारी : नागरिक समाज और सामाजिक मंच युवाओं को यह सिखायें कि वास्तविक परिपक्वता सड़कें अवरुद्ध करने में नहीं, बल्कि विधिक और शान्तिपूर्ण सीमाओं के भीतर अपनी बात दृढ़ता से रखने में है।

इसी सन्दर्भ में, 14 अगस्त को राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू जी ने छात्रों को ‘भारत के भविष्य का वास्तुकार’ कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि युवाओं की क्षमता को सही दिशा देना केवल उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज और परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब परिवार, समाज और संस्थाएँ मिलकर अपनी जिम्मेदारी निभायेंगे, तभी देश की भावी पीढ़ी नीट विवाद या पेपर लीक जैसे गम्भीर मुद्दों पर कानूनी जटिलताओं से बचकर, जिम्मेदारीपूर्वक और गरिमा के साथ लोकतंत्र के इस ‘सेफ्टी वाल्व’ का उपयोग कर सकेगी। यथा

“जीवप्राणौ हि राष्ट्रस्य सदाचारश्च संस्कृतिः ।
तौ विनिता किं न हतं रक्षता किं न रक्षितम् ।।”

राष्ट्र का सदाचार और संस्कृति ही उसके जीव और प्राण हैं। इन्हें नष्ट करने वाले ने इसका क्या नहीं नष्ट किया और इसके सुरक्षित करने वाले ने क्या सुरक्षित नहीं किया ?

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