जेन-जी का जनादेश

जेन-जी का जनादेश
जेन-जी का जनादेश

जेन-जी का जनादेश

विद्यार्थियों ने पुनः दिखा दिया कि वे राष्ट्रवाद के साथ हैं। प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर दिल्ली में हुए जेन-जी आन्दोलन को लेकर जो भ्रम फैलाया गया था, वह पूरी तरह साफ हो गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों, भिन्न-भिन्न प्रदेशों और सुदूरवर्ती अंचलों के अनेकानेक छात्र-छात्राएँ आकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, अर्थात् सम्पूर्ण भारत के युवाओं और विद्यार्थियों का एक व्यापक प्रतिनिधित्व दिखता है। यहाँ छात्र संघ के चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) द्वारा शानदार सफलता प्राप्त किया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की तरुणाई राष्ट्रवादियों के साथ है। कांग्रेस और राहुल गांधी की झूठ की गूँज को देश का युवा नकार रहा है और वह सच की हुंकार के साथ खड़ा है। टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले देश विरोधी वामपंथी छात्र संगठन भी साफ हो गये हैं। पहले पंजाब विश्वविद्यालय, मंगलुरु विश्वविद्यालय और अब दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों ने सिद्ध कर दिया है कि इस देश की युवा शक्ति अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ध्येय वाक्य के अनुसार, “ज्ञान, शील और एकता” के साथ है, अज्ञान, पूर्ण अश्लील अराजकता के साथ नहीं है।


कॉलेजों में भी एबीवीपी का परचम

दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकांश कॉलेजों में भी भगवा जेन-जी ब्रिगेड का जलवा दिखा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के यश डबास अध्यक्ष, रिया छाबड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव चुने गये। उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीता। इस तरह कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई चारों केन्द्रीय पदों में से कोई भी हासिल नहीं कर सकी। यश डबास को 24,576 वोट मिले, जबकि एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। अध्यक्ष पद पर जीत का अन्तर 2,053 वोट रहा। कुल मतदान प्रतिशत 40.46 रहा, जो पिछले तीन वर्षों में इस चुनाव का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत बताया गया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का प्रदर्शन इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संगठन लम्बे समय से दिल्ली विवि की छात्र राजनीति की प्रमुख ताकतों में रहा है। इस बार भी उसने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद जीतकर अपनी दमदार स्थिति कायम रखी। यहाँ कॉलेज स्तर के चुनावों में भी एबीवीपी को कई महत्वपूर्ण सफलताएँ मिलीं। अदिति महाविद्यालय, श्री अरविन्दों कॉलेज, डॉ. बी.आर. आम्बेडकर कॉलेज, भारती कॉलेज और शिवाजी कॉलेज में उसने चारों प्रमुख पद जीते। रामजस कॉलेज में भी एबीवीपी उम्मीदवारों ने अध्यक्ष, सचिव और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर जीत दर्ज की। केशव महाविद्यालय में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव पद एबीवीपी के खाते में गये। यह आँकड़े बताते हैं कि एबीवीपी की सफलता केवल केन्द्रीय पैनल तक सीमित नहीं रही, बल्कि विश्वविद्यालय के अनेक कॉलेजों में उसका संगठनात्मक नेटवर्क प्रभावी रहा।


मंगलुरु व पंजाब विवि में भी राष्ट्रवादियों की जीत

कर्नाटक के मंगलुरु यूनिवर्सिटी कॉलेज (हम्पांकट्टा) में हुए छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद समर्थित उम्मीदवारों ने सभी पदों पर शानदार जीत हासिल की। मुख्य पदों पर चुने गए पदाधिकारियों में सृजन (अध्यक्ष) और अक्षय आर (सचिव) शामिल हैं। यह चुनाव इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि हाल ही में कर्नाटक सरकार ने राज्य के डिग्री और प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में करीब 37 साल के लंबे अंतराल के बाद छात्रसंघ चुनावों को फिर से बहाल करने का फैसला किया था। उधर पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में भी छात्रों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को विजय दिलायी। अध्यक्ष पद पर अंकित बिढान 3,149 वोट पाकर विजयी रहे। उन्होंने अपने निकट प्रतिद्वंद्वी आदिल बरार को 512 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में उन्हें स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया का भी समर्थन प्राप्त था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने लगातार दूसरी बार इस प्रतिष्ठित पद पर अपना कब्जा जमाया। इस जीत को पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले अहम संकेत के रूप में माना जा रहा है।


उत्तराखण्ड में भी एबीवीपी का दबदबा

उत्तराखण्ड के छात्रसंघ चुनावों में भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रदेश के 110 से अधिक महाविद्यालयों में प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। अध्यक्ष, महासचिव और अन्य पदों पर संगठन के प्रत्याशियों की सफलता से छात्र राजनीति में एबीवीपी की मजबूत मौजूदगी सामने सामने आयी। राजधानी देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में एबीवीपी के नवदीप राणा अध्यक्ष चुने गये। उन्होंने एनएसयूआई के सौरभ सेमवाल को 96 वोटों से हराया। चुनाव के दौरान मतदान और मतगणना को लेकर एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने बवाल करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने समझाकर स्थिति को शान्त कराया।

उत्तराखण्ड में भी एबीवीपी का दबदबा


मसूरी के एमपीजी कॉलेज में भी एबीवीपी ने अध्यक्ष, महासचिव और विश्वविद्यालय प्रतिनिधि समेत तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। SGRR PG कॉलेज में एबीवीपी के तीन प्रत्याशी निर्विरोध चुने गये थे। प्रदेश के 119 राजकीय और 14 सहायता प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों एवं परिसरों में छात्रसंघ चुनाव कराये गये। गढ़वाल मण्डल के 55 कॉलेजों में अध्यक्ष पद के परिणामों में एबीवीपी ने 23, एनएसयूआई ने 17 और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 15 पदों पर जीत दर्ज की। टिहरी के 13 महाविद्यालयों में एबीवीपी ने छह, एनएसयूआई ने चार और निर्दलीयों ने तीन अध्यक्ष पद जीते। उत्तरकाशी में छह कॉलेजों के परिणामों में एनएसयूआई और ओम-आर्यन ग्रुप को दो-दो, जबकि एबीवीपी और निर्दलीयों को एक-एक अध्यक्ष पद मिला।


केरल में भी भगवा लहर

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव परिणामों के बीच राष्ट्रवादियों के लिये केरल से भी शुभ समाचार सामने आया है। त्रिपुनिथुरा गवर्नमेन्ट संस्कृत कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने सभी छह प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। इस जीत के साथ कॉलेज में करीब 45 साल से चले आ रहे वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई के वर्चस्व का अन्त हुआ है। यह परिणाम की छात्र राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है। कोच्चि के त्रिपुनिथुरा में गवर्मेंट कॉलेज में पिछले 40 साल से एसएफआई का कब्जा था और इस बार के चुनाव में राष्ट्रवादी संगठन एबीवीपी ने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री सहित सभी 12 पदों पर जीत दर्ज की है। ध्यान देने वाली बात है कि इससे पहले भाजपा ने इसी त्रिपुनिथुरा नगरपालिका के चुनाव में वामपंथी संगठन एलडीएफ के 45 साल पुराने वर्चस्व को तोड़कर अपना बोर्ड बनाया था। इससे भी पहले भाजपा ने केरल में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 3 विधानसभा सीट दर्ज की। 2024 में केरल में भाजपा ने एक लोकसभा सीट भी जीती है। पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की शुरुआत 3 सीट से ही हुई थी आज 200 से ज्यादा हैं। हिन्दुत्व की लहर देश के उन हिस्सों तक भी पहुँच चुकी है जहाँ हिन्दू शब्द बोलना भी अपराध माना जाता था। केरल में 55 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या है। मुसलमान 27 और ईसाई 19 प्रतिशत हैं। निष्कर्ष ये कि जहाँ वामपंथ राष्ट्रवादियों के गढ़ उत्तर भारत में सेंध लगाने में असफल रहा। वहीं राष्ट्रवादियों ने वामपंथ के गढ़ केरल का दुर्ग भेद दिया है। ऐसा लग रहा है कि केरल बाहें फैलाये भगवा क्रान्ति का स्वागत कर रहा है।


परिणामों के राजनीतिक अर्थ

राजनीतिक विश्लेषकों ने छात्र संघ के चुनाव परिणामों को युवाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और भाजपा की नीतियों के प्रति विश्वास की अभिव्यक्ति बताया है। वहीं विपक्ष खास तौर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी के प्रति युवाओं के गुस्से को भी यह परिणाम प्रदर्शित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि विपक्षी नेता एक लम्बे समय से युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। जब दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव परिणाम आये तो राहुल गांधी छात्रों की गूँज नामक कार्यक्रम कर रहे थे। ऐसे में यह परिणाम उनके लिये काफी शर्मिन्दगी भरे रहे। वामपंथी दलों के छात्र संगठन भी काफी जोर लगाये हुए थे लेकिन उन्हें भी घोर निराशा हाथ लगी।

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