‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा

‘मैं’ से ‘हम’ तक : सेवा और धर्म की भारतीय अवधारणा मनमोहन वैद्य जी “वैष्णव जन तो तेणे रे कहिये, जे पीड़ पराई जाणे रे”। दूसरों की पीड़ा की अनुभूति कर उन्हें उस पीड़ा से मुक्त करने के सहज कर्म को ‘धर्म’ कहा गया है। राजा रंतिदेव का प्रसिद्ध वचन है – “मुझे न राज्य…

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जेन-जी का जनादेश

जेन-जी का जनादेश

जेन-जी का जनादेश विद्यार्थियों ने पुनः दिखा दिया कि वे राष्ट्रवाद के साथ हैं। प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर दिल्ली में हुए जेन-जी आन्दोलन को लेकर जो भ्रम फैलाया गया था, वह पूरी तरह साफ हो गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों, भिन्न-भिन्न प्रदेशों और सुदूरवर्ती अंचलों के अनेकानेक छात्र-छात्राएँ आकर शिक्षा…

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उम्र को मात: 96 साल के सत्यनारायण और 93 के नंदलाल की प्रेरणादायक कहानी

उम्र को मात: 96 साल के सत्यनारायण और 93 के नंदलाल की प्रेरणादायक कहानी

उम्र को मात: 96 की उम्र में नंगे पांव 16 किमी चलते हैं सत्यनारायण, 93 में भी 10 बीघे की खेती करते हैं नंदलाल सादगी, नियमित श्रम और सकारात्मक सोच के सहारे बुजुर्ग उम्र को मात दे रहे हैं। 96 वर्षीय सत्यनारायण चौहान रोज नंगे पांव करीब 16 किलोमीटर चलते हैं। वहीं 93 वर्षीय नंदलाल…

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सेवाज्ञ संस्थानम् : अँधेरे में जगमगाता एक दीपक

सेवाज्ञ संस्थानम् : अँधेरे में जगमगाता एक दीपक

सेवाज्ञ संस्थानम् : अँधेरे में जगमगाता एक दीपक लखनऊ। यदि मन में कुछ करने का संकल्प हो, लक्ष्य स्पष्ट और दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो बिना संसाधनों के भी सफलता मिल सकती है। इस तथ्य को सत्य सिद्ध किया है सेवाज्ञ संस्थानम् के संस्थापक आशीष कुमार ‘आशु’ ने। सेवाज्ञ संस्थानम् सेवा के क्षेत्र में कार्य…

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क्या महिलाओं को अभी भी संघर्ष करना होगा ?

क्या महिलाओं को अभी भी संघर्ष करना होगा ?

क्या महिलाओं को अभी भी संघर्ष करना होगा ? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नारी को सदैव शक्ति, सृजन और संस्कार का प्रतीक माना गया है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ का आदर्श हमारे समाज की आत्मा में बसता है। फिर भी वास्तविकता यह है कि महिलाओं को आज भी अपने सम्मान और समान…

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पितृपक्ष और उसका महत्व

पितृपक्ष और उसका महत्व

पितृपक्ष और उसका महत्व पितृपक्ष… क्या आपने कभी सोचा है कि वर्ष में एक ऐसा पक्ष क्यों आता है, जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके लिए तर्पण करते हैं और श्राद्ध करते हैं? क्या यह केवल हजारों वर्षों से चली आ रही कोई धार्मिक परम्परा है, या इसके पीछे भी कोई कारण…

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