चांद पर साथ बढ़ेंगे भारत-अमेरिका NASA ने ISRO को ‘मून बेस’ कार्यक्रम का औपचारिक निमंत्रण दिया

चांद पर साथ बढ़ेंगे भारत-अमेरिका NASA ने ISRO को 'मून बेस' कार्यक्रम का औपचारिक निमंत्रण दिया
चांद पर साथ बढ़ेंगे भारत-अमेरिका NASA ने ISRO को 'मून बेस' कार्यक्रम का औपचारिक निमंत्रण दिया

चांद पर साथ बढ़ेंगे भारत-अमेरिका NASA ने ISRO को ‘मून बेस’ कार्यक्रम का औपचारिक निमंत्रण दिया

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग अब पृथ्वी की कक्षा से आगे बढ़कर चंद्रमा की सतह तक पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने बेंगलुरु स्पेस एक्सपो 2026 में घोषणा की कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO को अपने मून बेस’ कार्यक्रम में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका चंद्रमा पर लौटने की तैयारी कर रहा है और वह चाहता है कि इस अभियान में भारत भी उसके साथ रहे। सर्जियो गोर के अनुसार, भारत और अमेरिका का अंतरिक्ष संबंध अब सामान्य सहयोग से आगे बढ़कर संयुक्त निर्माण और साझा अभियानों की दिशा में जा रहा है। दोनों देश नई तकनीक, अंतरिक्ष स्टार्टअप, अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण, यानों की डॉकिंग और भविष्य के वैज्ञानिक अभियानों में मिलकर काम करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। उन्होंने कहा कि चंद्रमा पर दीर्घकालीन मानव उपस्थिति स्थापित करने की अमेरिकी योजना में भारत की वैज्ञानिक क्षमता और अंतरिक्ष अभियानों के अनुभव की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

NASA का मून बेस कार्यक्रम उसके व्यापक आर्टेमिस अभियान का हिस्सा है। इसका उद्देश्य कई दशकों बाद मनुष्यों को दोबारा चंद्रमा पर भेजना और वहां लंबे समय तक वैज्ञानिक अनुसंधान करने योग्य आधार तैयार करना है। प्रस्तावित केंद्र को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट स्थापित करने की योजना है, जहां जमी हुई अवस्था में पानी मिलने की संभावना जताई जाती रही है। इस पानी का उपयोग भविष्य में पेयजल, ऑक्सीजन और रॉकेट ईंधन के निर्माण में किया जा सकता है।

चंद्रमा पर लंबे समय तक मनुष्य के रहने और काम करने से जुड़ी तकनीकों का परीक्षण भविष्य के मंगल अभियानों के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। वहां ऊर्जा उत्पादन, आवास, जीवन-रक्षा प्रणाली, संचार और कठिन वातावरण में काम करने वाली मशीनों को विकसित किया जाएगा। भारत की भागीदारी का वास्तविक स्वरूप दोनों देशों के बीच होने वाली आगामी बातचीत और ISRO के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा। निमंत्रण का अर्थ यह नहीं है कि किसी भारतीय अंतरिक्ष यात्री के चंद्रमा पर जाने की तारीख निर्धारित हो गई है।
भारत ने वर्ष 2023 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता शांतिपूर्ण, सुरक्षित और पारदर्शी अंतरिक्ष अन्वेषण के सिद्धांतों को बढ़ावा देता है। इसके बाद दोनों देशों के अंतरिक्ष संबंधों में तेजी आई। NASA ने अगस्त 2026 में बेंगलुरु स्थित ISRO मुख्यालय में आयोजित भारत-अमेरिका नागरिक अंतरिक्ष संयुक्त कार्यसमूह की नौवीं बैठक के दौरान मून बेस कार्यक्रम में भारत की भागीदारी की इच्छा औपचारिक रूप से जताई थी।

दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण NASA-ISRO सिंथेटिक अपर्चर रडार उपग्रह यानी NISAR है। दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित इस उपग्रह को 30 जुलाई, 2025 को भारत के GSLV-F16 रॉकेट से प्रक्षेपित किया गया था। NISAR पृथ्वी की भूमि, हिमखंडों, जंगलों और जल क्षेत्रों में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों का अध्ययन कर रहा है। इससे भूकंप, बाढ़, भूस्खलन और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक आपदाओं को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है।

भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यात्रा को भी गोर ने दोनों देशों के सफल सहयोग का उदाहरण बताया। उनके प्रशिक्षण और अभियान में अमेरिकी संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इस अनुभव से भारत के गगनयान कार्यक्रम को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में उतरने वाला पहला देश बना था। अब ISRO चंद्रयान-4 के माध्यम से चंद्रमा के नमूने पृथ्वी पर लाने और भविष्य में मानव चंद्र अभियान की तैयारी कर रहा है। ऐसे समय में NASA का निमंत्रण भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और उसकी अंतरिक्ष क्षमताओं की स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

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