
ईयर फोन से बढ़ रहा बहरेपन का खतरा
लखनऊ। आधुनिक जीवनशैली, तेज आवाज में संगीत सुनने की आदत और लम्बे समय तक ईयरफोन या लीड का इस्तेमाल कम उम्र में ही सुनने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है। पहले उम्रदराज लोगों, खासकर 55 से 60 वर्ष की उम्र में सुनने की क्षमता कम होने की समस्या अधिक देखने को मिलती थी। अब 35 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में भी यह समस्या सामने आने लगी है। लोहिया संस्थान के ईएनटी विभाग के डॉ. आशीष चन्द्रा के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र के मरीजों में सुनने से जुड़ी शिकायतों में बढ़ोतरी देखी गयी है।
रोज पहुँच रहे 8 से 10 नये मरीज
डॉ. आशीष चन्द्रा ने बताया कि ईएनटी ओपीडी में रोजाना औसतन 150 मरीज इलाज के लिये पहुँचते हैं। इनमें करीब 55 से 60 मरीज युवा वर्ग के होते हैं। खास बात यह है कि इनमें प्रतिदिन करीब 8 से 10 नये मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें लम्बे समय तक कान में लीड या ईयरफोन लगाने के बाद सुनने में परेशानी, कान में आवाज आने या अन्य शिकायतें होती हैं। उनके अनुसार, पिछले करीब पाँच वर्षों में इस तरह के मामलों का ट्रेंड लगातार बढ़ा है।
कोशिकाओं को स्थायी नुकसान
लगातार तेज आवाज सुनना कान के लिये नुकसानदायक हो सकता है। कान के अन्दरूनी हिस्से में बेहद सूक्ष्म हेयर सेल्स होती हैं, जो आवाज के कम्पन को पहचानकर उसे मस्तिष्क तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लम्बे समय तक तेज आवाज के सम्पर्क में रहने से इन कोशिकाओं को नुकसान पहुँच सकता है। एक बार गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त होने के बाद इन कोशिकाओं के दोबारा सामान्य होने की क्षमता बहुत सीमित होती है। ऐसे में धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम हो सकती है और समस्या स्थायी हियरिंग लॉस में बदल सकती है।
युवाओं में शुरुआत में समस्या का पता आसानी से नहीं चलता। कई बार उन्हें लगता है कि आसपास के लोग धीमी आवाज में बोल रहे हैं या शोर में बातचीत समझने में परेशानी हो रही है। धीरे-धीरे टीवी और मोबाइल की आवाज बढ़ाने, बार-बार सामने वाले से बात दोहराने के लिये कहने या फोन पर बातचीत में परेशानी जैसे लक्षण दिखायी देने लगते हैं।
सीटी की आवाज भी चेतावनी
तेज आवाज के लगातार सम्पर्क में रहने से केवल सुनने की क्षमता ही प्रभावित नहीं होती। कुछ मरीजों में टिनिटस की समस्या भी हो सकती है। इसमें कान में लगातार या बार-बार सीटी, घण्टी, भनभनाहट या दूसरी आवाज सुनायी देती है, जबकि वास्तव में आसपास ऐसी कोई आवाज नहीं होती। लम्बे समय तक टिनिटस रहने पर मरीज परेशान रहने लगता है। नींद प्रभावित हो सकती है व दिनभर चिड़चिड़ापन व एकाग्रता की समस्या हो सकती है।
पढ़ाई व काम पर भी पड़ता असर
पर सुनने में परेशानी का असर व्यक्ति के सामाजिक और पेशेवर जीवन पर भी पड़ सकता है। बातचीत ठीक से समझ न आने के कारण व्यक्ति कई बार लोगों से दूरी बनाने लगता है। युवाओं में इसका असर पढ़ायी और नौकरी भी पड़ सकता है। ऑनलाइन मीटिंग, फोन कॉल या ऑफिस में बातचीत के दौरान बात समझने में परेशानी होने से काम प्रभावित सकता है। वहीं रात में टिनिटस या कान से जुड़ी परेशानी के कारण नींद पूरी न होने पर अगले दिन थकान और चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है।
तेज आवाज भी नुकसानदायक
विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या केवल ईयरफोन या लीड की नहीं है, बल्कि आवाज की तीव्रता और उसके सम्पर्क में रहने की अवधि भी महत्वपूर्ण है। लम्बे समय तक तेज आवाज में गाने सुनना, तेज आवाज वाले कार्यक्रमों में रहना या लगातार शोर वाले वातावरण में काम करना भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। ईयरफोन लगाकर सोने या लम्बे समय तक बिना ब्रेक के इस्तेमाल करने की आदत भी समस्या बढ़ा सकती है।
एआई और आधुनिक तकनीक से मिल रही मदद
डॉ. आशीष ने बताया कि बधिरता की पहचान और प्रबन्धन में आधुनिक तकनीकों के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। मरीज अपनी शुरुआती समस्या को एआई आधारित टूल्स में फीड करके सामान्य जानकारी और शुरुआती सुझाव प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, एआई डॉक्टर का विकल्प नहीं है। सुनने की क्षमता में कमी होने पर ईएनटी विशेषज्ञ और ऑडियोलॉजिस्ट से जाँच कराना जरूरी है।
जिन मरीजों को हियरिंग एड की जरूरत पड़ती है, उनके लिए मशीन को सुनने की क्षमता और मरीज की जरूरत के अनुसार सेट करना जरूरी होता है। समय के साथ सुनने की क्षमता में बदलाव आने पर हियरिंग एड को दोबारा री-ट्यून भी करना पड़ सकता है। इसके लिए स्थानीय ऑडियोलॉजिस्ट की मदद ली जा सकती है।
इन बातों का रखें ध्यान
विशेषज्ञों के अनुसार युवाओं को ईयरफोन का इस्तेमाल सीमित रखना चाहिये। तेज आवाज में संगीत सुनने से बचना चाहिये और लम्बे समय तक लगातार ईयरफोन लगाने के बजाय बीच-बीच में कानों को आराम देना चाहिये। कान में सीटी या घण्टी जैसी आवाज लगातार आती रहे, बातचीत सुनने में परेशानी हो, टीवी या मोबाइल की आवाज लगातार बढ़ानी पड़े या कान में दर्द जैसी समस्या हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिये। ऐसी स्थिति में ईएनटी विशेषज्ञ से जाँच कराना जरूरी है। समय रहते समस्या की पहचान होने पर सुनने की क्षमता को और खराब होने से रोकने में मदद मिल सकती है