
शांति की भारतीय धरोहर सारनाथ को वैश्विक प्रणाम !
भपवान बुद्ध की प्रथम उपदेश आपली सारनाथ को यूनेस्को की विश्व बरोर सूची में शामिल किया जाना केवल एक पुरातात्विक स्थल की अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं बल्कि भारत की उस सनातन ज्ञान-परम्पका सम्मान है जिसने विश्व को शाति करुणा और मध्धाम मार्ग का संदेश दिया। दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित विश्व धरोहर समिति के स्कों सत्र में यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया जिसको साथ ही सारनाथ भारत का 45वीं विश्व धरोहर स्थलतमा उत्तर प्रदेश का चौथा विश्व धरोहर स्थल बन गया। यह उपलब्धि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति धरोहरण और वैश्विक विरासत के प्रति चसकी प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण है। बाराणगी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ वह पनि भूनि है जहाँ बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान गौतम बुद्ध ने अपने पाच पूर्व साथियों को प्रथम उपदेश दिया था। बौद्ध परंपरां में इस घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। यहीं से बौद्ध धर्म एक व्यक्तिगत साधना से आगे बढ़कर समठित धार्मिक एवं दार्शनिक आदोलन के रूप में विकसित हुआ। यही कारण है कि सारनाथ बौद्ध धर्म के धार प्रमुख तीर्थस्थलों में विशेष प्रधान रखता है। लुबिन में बुद्ध का जन्म बोधगया में जान प्राप्ति सारनाथ में प्रथन उपदेश और कुशीनगर में महापरिनिर्वाण, ये चारों स्थल बौद्ध जगत की आध्यात्मिक घुरी माने जाते हैं। अब इनमें से लुबिनी, बोधगया और सारनाथ यूनेस्को-विश्व धरोहर सूची में शामिल हो चुके हैं। सारनाथ का इतिहास ढाई हजार वर्षों से भी अधिक पुराना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा पिछले डेढ़ सौ वर्षों में यहाँ व्यापक उत्खनन किया गया जिससे पाँचवीं बौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर बारहवीं शताब्दी तक की निरंतर सांस्कृतिक परक्त के प्रमाण प्राप्त हुए। मिले यह सिद्ध करते है कि सारनाथ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बरिक शिक्षा कला वास्तुकला दर्शन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी एक महत्वपूर्ण द्रः था। मौदं शुंग कुराण गुप्त और पाल काल तक यह स्थल निस्तर विकसित होगा रहा और अनेक विहारों भदि स्मारकों से समृद्ध हुआ। सारनाथ की पहचान सम्राट अशोक में की गहराई से जुड़ी हुई है। बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर अशोक ने यहाँ भव्य स्तूपों और स्तभों का निर्माण कराया। यहीं से प्राप्त अशोक का सिंह स्तंभ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है जबकि उसके शीर्ष पर अंकित धर्मचक्र भारतीय राष्ट्र ध्वज का अभिन्न अंग है। यह केवल एक पुरातात्विक खोज नहीं बल्कि आधुनिक भारत की राष्ट्रीय पहचान का आधार भी है। इसी प्रकार गुप्तकालीन प्रसिद्ध धर्मवक प्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिनी जाती है। ये दोनों अमूल्य धरोहरे सबसे पुराने साइट संग्रहालयों में गिना जाता है। यूनेस्को द्वारा किसी भी स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए उसकी ‘असाधारण सार्वभौमिक मूल्य’ (आउटस्टैंडिंग यूनिवर्सल वैल्यू) का मूल्यांकन किया जाता है। सारनाथ को मानदंड (3) और मानदंड (4) के अंतर्गत यह सम्मान प्रदान किया गया। मानदंड (3) के अनुसार यह स्थल एक ऐसी सांस्कृतिक परपरा का अद्वितीय साक्ष्य प्रस्तुत करता है जिसने सदियों तक करोड़ों लोगों के आध्यात्मिक जीवन को प्रभावित किया। यहाँ निर्मित असंख्य स्तूप, विहार, मदिर और स्मारक बौद्ध तीर्थ परंपरा के विकास के जीवंत प्रमाण हैं। वहीं मानदंड (4) के अंतर्गत सारनाथ उन ऐतिहासिक घटनाओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है, जिनका मानव सभ्यता पर गहरा प्रभाव पड़ा, विशेषकर भगवान बुद्ध का प्रथम उपदेश, प्रथम संघ की स्थापना तथा करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग के सार्वभौमिक संदेश का प्रसार। सारनाथ को यह सम्मान सहज रूप से प्राप्त नहीं हुआ। वर्ष 1998 में इसे यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल किया गया था। इसके बाद लगभग 28 वर्षों तक वैज्ञानिक अध्ययन, दस्तावेजीकरण, संरक्षण- योजनाएँ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन की प्रक्रिया चलती रही। जनवरी 2025 में भारत ने आधिकारिक नामांकन प्रस्तुत किया। इसके पश्चात् लगभग 18 महीने तक आईसीओएमओएस सहित विभिन्न विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा तकनीकी परीक्षण, स्थल निरीक्षण और संरक्षण व्यवस्था का मूल्यांकन किया गया। अंततः विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में सर्वसम्मति से इसे विश्व घरोहर सूची में शामिल करने का निर्णय लिया गया जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, संस्कृति मंत्रालय तथा संरक्षण विशेषज्ञों के दीर्घकालीन प्रयासों की सफलता का परिणाम है।