भगवान बुद्ध के उपदेश में राष्ट्रीयता का भाव

दीर्घकाल तक जब धर्मानुष्ठान करने वालों के अन्तःकरण में काम के उद्भव हो जाने से विवेक विज्ञान का क्षय और अधर्म की वृद्धि होने लगती है। ऐसी स्थिति मे अकारण दुःख हरण इच्छा रखने वाले परम कारुणिक भगवान विष्णु प्रजा की रक्षा करने के लिये ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व की रक्षा के लिये अवतरित होते है। ऐसे ही शुद्ध-बुद्ध ब्रह्मस्वरूप भगवान बुद्ध का आविर्भाव वैशाख पूर्णिमा को कीकट क्षेत्र मे हुआ था। सम्प्रति लोकमान्यता और अन्य साक्ष्यों के अनुसार उनका जन्म नेपाल के लुम्बिनि मे माना जाता आ रहा है परन्तु श्रीमद्भागवत्पुराण के टीकाकार श्रीधरस्वामी कीकट क्षेत्र को वर्तमान बिहार के गया जी को मानते है।

ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्।
बुद्धो नाम्नाञ्जनसुतः कीकटेषु भविष्यति ।।


बुद्ध का स्वरूप :

भगवान बुद्ध के स्वरूप का वर्णन अग्नि पुराण और महाभारत में भी मिलता है, जिनके आधार पर उनकी प्रतिमाओं का स्वरूप प्रचलित हुआ। अग्नि पुराण में उनका वर्णन इस प्रकार है-

शान्तात्मा लम्बकर्णश्च गौराङ्गश्चाम्बरावृतः ।
ऊर्ध्वपद्मस्थितो बुद्धो वरदाभयदायकः ॥

अर्थात् वे शान्त स्वभाव वाले, लम्बे कानों वाले, गौर वर्ण, वस्त्र धारण किये हुए, खिले हुए कमल पर विराजमान तथा वरदान और अभय देने वाले हैं। इसी प्रकार महाभारत में उल्लेख मिलता है-

काषायवस्रसंवीतो मुण्डितः शुक्लदन्तवान्।
शुद्धोदनसुतो बुद्धो मोहयिष्यामि मानवान् ।।

अर्थात् वे काषाय वस्त्र धारण करेंगे, मुण्डित (मुण्डित मस्तक) होंगे, उज्ज्वल दाँतों वाले होंगे और राजा शुद्धोधन के पुत्र के रूप में जन्म लेकर मानवों को अपने उपदेशों से आकर्षित करेंगे।


बुद्ध के त्रिपिटक :

भगवान बुद्ध ने मानव समाज के कल्याण से जुड़े जितने भी महत्वपूर्ण आयाम हो सकते थे, उन सभी का उपदेश सारनाथ में देना प्रारम्भकिया। उनके ये उपदेश ही आगे चलकर ‘धम्म’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिन्हें बाद में त्रिपिटक ग्रंथों में संकलित किया गया।

बुद्ध के त्रिपिटक

शान्ति संदेश की प्रासंगिकता :

आज विश्व के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। इन युद्धों के कारण न केवल लाखों लोगों का जीवन संकट में पड़ रहा भगवान बुद्ध के उपदेश में राष्ट्रियता का भावहै, बल्कि सभ्यताओं, संस्कृतियों और मानव मूल्यों का भी विनाश हो रहा है। जहाँ एक ओर विज्ञान और प्रगति की बातें होती हैं, वहीं दूसरी ओर हिंसा और विनाश मानवता पर गहरा प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। ऐसे समय में भगवान बुद्ध के अहिंसा करुणा और शान्ति के उपदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।


उन्होंने सिखाया था कि द्वेष कभी द्वेष से समाप्त नहीं होता, बल्कि प्रेम और करुणा से ही उसका अन्त सम्भव है। यदि आज का मानव समाज उनके इन सिद्धान्तों को अपनाये, तो युद्ध और विनाश की जगह शान्ति और सह-अस्तित्व का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
कई छद्म बौद्धों का मानना है भगवान बुद्ध वेद निन्दक थे, उन्होने वैदिक धर्म का विरोध किया परन्तु ज्ञान की तलाश में सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलारा कालाम और उद्दक रामपुत्त के पास पहुँचे। जो की सांख्य दर्शन के बहुत बड़े विद्वान थे उनसे उन्होंने योग-साधना सीखी। उससे भी सन्तुष्ट न होकर वो आगे तपस्या करने लगे और आगे गया जी में ही पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हे ज्ञान की प्राप्ति हुई जहाँ से वो सिद्धार्थ के जगह विश्व को बुद्ध स्वरूप में नजर आये उनके उपदेश विख्यात हुए। भगवान् बुद्ध के ये उपदेश उनके शिष्यों ने चार प्रकार से प्रचारित किया जो माध्यमिक, योगाचार, सौत्रांतिक एवं वैभाषिक के नाम से प्रसिद्ध हुए। भगवान् बुद्ध ने वस्तुतः निखिल वैदिक वाङ्गमय के सार ॐ का ही परोक्ष रूप से प्रतिपादन किया यथा जगत के अनित्यत्व को सर्व क्षणिक कह करके प्रतिपादित किया एवमेव अगर चार आर्य सत्यों के सिद्धान्त की बात करे या अष्टाङ्गिकमार्ग की, यह सभी वेदों से ही प्रसूत है।


राष्ट्रीयता के संदेश :

राष्ट्रीयता के भाव को उन्होनें अपने आष्टाङ्गिकमार्ग मे अनुस्यूत किया हुआ है- बौद्ध धर्म का अष्टांगिक मार्ग केवल व्यक्तिगत मुक्ति का साधन नहीं है, बल्कि एक आदर्श समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण का आधार भी है। उनके 8 मार्गों का विवेचन करने यह और भी स्फुटित होता हैं। सम्यक दृष्टि हमें यह समझने की शक्ति देती है कि यह संसार दुःखमय है अतः दुःख से निवृत्ति हेतु प्रयासरत रहना चाहिये जब इस विचार को राष्ट्रवाद से जोड़ा जाता है, तब इसका अर्थ और व्यापक हो जाता है। सम्यक दृष्टि एक आदर्श नागरिक को यह समझने की क्षमता देती है कि राष्ट्र की उन्नति केवल भौतिक विकास से नहीं, बल्कि नैतिकता, न्याय और सामाजिक सन्तुलन से होती है।

सम्यक संकल्प हमें अपने देश और समाज के प्रति ईमानदार, सकारात्मक और कल्याणकारी सोच विकसित करने की प्रेरणा देता है। यह केवल व्यक्तिगत मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा नहीं है, बल्कि राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्यबोध को भी सुदृढ़ करता है। सम्यक वाक आपसी भाईचारे और एकता को बढ़ाता है, जिससे समाज में विभाजन और घृणा कम होती है। सम्यक कर्म यह सुनिश्चित करता है कि हमारे कार्य राष्ट्र और समाज के हित में हों, न कि केवल व्यक्तिगत लाभ के लिये। सम्यक जीविका हमें ऐसे कार्य चुनने की प्रेरणा देता है, जो देश के विकास में योगदान दें और किसी को हानि न
पहुँचाए।

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