
श्रीराम का कूटनीतिज्ञ स्वरूप
प्रायः ये जनप्रवृत्ति रही है कि श्रीराम को सरल, करुणावत्सल और मर्यादा रक्षक व्यक्तित्व के रूप में देखा गया जो सदैव सामाजिक और राजनैतिक मर्यादाओं की रक्षा करते हैं जबकि श्रीकृष्ण को एक चतुर, कूटनीतिज्ञ और लीलाधर के रूप में देखा गया जो धर्मस्थापना के लिये साध्य साधन औचित्य की किसी मर्यादा को मानने के लिये तैयार नहीं हैं। इसी तुलना के चलते भावुक भक्तों द्वारा चौदह और सोलह कलाओं जैसी अवधारणायें दी गयीं जबकि वास्तविकता यह है कि श्रीराम भी उतने ही घोर राजमर्मज्ञ थे जितने श्रीकृष्ण। अन्तर केवल छवि है। श्रीराम की सरल छवि के नीचे उनका धुर राजनीतिज्ञ रूप आच्छादित हो गया है जबकि कूटनीतिज्ञ रूप जनमानस में स्थापित हो गया है।
कूटनीति के चार मूल सिद्धान्त
एक वास्तविकता यह भी है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों की कूटनीतिक और रणनैतिक कार्यशैली एक जैसी ही थी जिसके चार प्रमुख सिद्धान्त थे- अपने पक्ष का सुदृढ़ संगठन व उनमें व नैतिक बल उत्पन्न करना, युद्ध पूर्व विरोधी पक्ष में अपने समर्थक उत्पन्न करना, सैन्य प्रयोग के लिये उचित समय का इन्तजार करना और कम से कम बलप्रयोग द्वारा अधिकतम परिणाम लेना।
विश्वामित्र के सिद्धाश्रम की रक्षा
प्रारम्भ से ही श्रीराम के अभियानों में उपरोक्त सिद्धान्तों का प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। उनके जीवन का प्रथम अभियान था विश्वामित्र के सिद्धाश्रम के नजदीक स्थित रावण के सैनिक स्कंधावार के विरुद्ध जिसका नेतृत्व कर रही थी यक्षिणी ताड़का व राक्षस सुन्द के जाल में फंसकर उससे उत्पन्न पुत्र मारीच और सुबाहु जो उस क्षेत्र के स्वार्थी और शक्तिशाली आर्यों को तेजी से रक्षधर्म में धर्मान्तरित कर रहे थे। नरमांस भक्षण, स्त्रीअपहरण व बलात्कार, लूट और शोषण के विरुद्ध विश्वामित्र के नेतृत्व में जनाक्रोश पहले से एकत्रित था और आवश्यकता थी केवल न्याय के लिये अधिकृत नेतृत्व की जो राम ने उन्हें प्रदान किया।
जन संगठन की नीति
इसके बाद राम ने श्रृंगवेरपुर के निषादों से स्वतंत्रता व समानता के सम्बन्ध स्थापित किये और यह विशाल क्षेत्र में फैली स्वाभिमानी जाति के लिये राम के प्रति श्रद्धावनत हो गयी। अपने पिता दशरथ द्वारा दक्षिण में शंबर के सदैव नेतृत्व में असुरों के विरुद्ध देव जाति के सैन्य अभियान की असफलता से राम ने वन्य जाति बहुल क्षेत्रों में राजकीय सैन्य अभियान की निरर्थकता को समझ लिया था। इसीलिये चित्रकूट और दण्डकारण्य में राम ने वन्य जातियों यथा शबर, भील, कोल आदि के बीच में उन्हीं जैसा जीवन जीते हुए इन जातियों का संगठन किया, उनमें जीवन सुधार व सैन्यप्रशिक्षण द्वारा नैतिकता व आत्मविश्वास का संचार किया।
शत्रु को अनुकूल भूगोल में परास्त करना
शूर्पणखा प्रसंग से अपने समर्थकों में अपने चरित्र के प्रति अगाध विश्वास उत्पन्न किया। सम्यक रणनीति द्वारा खर-दूषण को अपने अनुकूल भूगोल में युद्ध करने के लिये उकसाया और दण्डकवन में रावण की सैन्य उपस्थिति को समूल नष्ट कर दिया।
सुग्रीव, बालि और जन-समर्थन
वानरों के सन्दर्भ में भी यही हुआ। उन्होंने दुर्बल परन्तु पीड़ित सुग्रीव का पक्ष लिया जिससे उन्हें स्वतः ही सुग्रीव के प्रति सहानुभूति रखने वाली अधिसंख्य वानर प्रजा का नैतिक समर्थन प्राप्त हो गया जिसके कारण द्वंद्वयुद्ध के नियमों के विपरीत हस्तक्षेप कर बालि का वध करने पर भी वानर जाति ने उन्हें अपना मुक्तिदाता माना, आक्रान्ता नहीं।
बालि के पश्चात राम ने राक्षसों के शोषण के विरुद्ध वानर जाति के आक्रोश को उभारा और सीता अनुसंधान के समय का सदुपयोग कर साथ-साथ समस्त जानकारियाँ जुटाते रहे जिसका परिणाम था श्रीराम के नेतृत्व के प्रति असाधारण रूप से निष्ठावान सेना तथा हनुमान, जाम्बवान, नल, नील और सुहोत्र जैसे यूथपतियों की अगाध श्रद्धा। केवल अंगद की निष्ठा पर उन्हें आशंका थी जिसे लंका में रावण के दरबार में उसे दूत के रूप में भेजकर जाँच लिया गया।
शत्रु-पक्ष में समर्थक और चरम कूटनीतिक चातुर्य
लंका में विभीषण के विद्रोह व पलायन तथा उसे लंकापति के रूप में मान्यता देकर उन्होंने न केवल रावण की कमजोरियों को जान लिया बल्कि संधिप्रस्ताव भेजकर अपने व रावण दोनों पक्षों में अपने नैतिक बल को मजबूत कर लिया और इसके बाद ही उन्होंने युद्ध प्रारम्भ किया। युद्ध के दौरान भी उन्होंने अपनी सतर्कता बनाये रखी और विभीषण को सुरक्षा के नैतिक उत्तरदायित्व का हवाला देकर सदैव केन्द्र में अपने नजदीक रखा। क्या पता कब भाई के प्रति मोह जाग जाये ? और जब विभीषण की सहायता से मेघनाद का वध हो गया तो उन्होंने विभीषण को रावण से टकराने की छूट दे दी क्योंकि अब रावण द्वारा विभीषण को पुनः अपनाने की सारी सम्भावनायें नष्ट हो चुकी थीं।
सुग्रीव के राज्याभिषेक के साथ-साथ अंगद के युवराज्याभिषेक व अंगद के दूतकर्म के पश्चात विभीषण के प्रसंग में श्रीराम के चरम कूटनीतिक चातुर्य के दर्शन होते हैं और यह तीन प्रसंग ही उनके राजनैतिक व्यक्तित्व को स्पष्ट करने के लिये काफी हैं।
अयोध्या वापसी और राज्याभिषेक पश्चात की राजनीतिक सतर्कता
वनवास से लौटने के पश्चात हनुमान को अयोध्या व भरत की मनःस्थिति को भाँपने के लिये अग्रिम दूत के रूप में भेजना उनकी राजोचित सतर्कता का उदाहरण है। राज्याभिषेक के पश्चात सीतात्याग के उपरान्त भी भारतवर्ष के राजनैतिक संगठन का उनका अभियान जारी रहा।
लंका में विभीषण और दक्षिण भारत में सुग्रीव दोनों उनकी मैत्रीपूर्ण अधीनता स्वीकार करते ही थे और दोनों शक्तियों में विजित और विजेता सम्बन्ध का विवाद कभी भी उत्पन्न न हो सके और दोनों के मध्य सन्तुलन बना रहे, इसके लिये विभीषण के गुप्त अनुरोध पर उन्होंने अपने ही बनाये रामसेतु को मध्य से इतना भंग करवा दिया कि वानर सेनायें कभी भी लंका पर और लंकानिवासी राक्षस, जो अब आर्य संस्कृति को स्वीकार कर चुके थे, दक्षिण भारत पर आक्रमण न कर सकें।
लवणासुर का दमन व मथुरा की स्थापना
राज्याभिषेक के पश्चात राम के समक्ष सबसे पहली और नजदीकी मुसीबत थी यमुना पार मधुवन में लवणासुर के रूप में और पूर्व में प्राग्ज्योतिष में बाणासुर के रूप में स्थापित प्राचीन असुरों की पीठें। मधुवन की लवणासुर की पीठ अयोध्या के लिये विशेष रूप से सिर दर्द थी। इस क्षेत्र के असुरों ने न केवल यदुओं को सौराष्ट्र की ओर धकेल दिया था बल्कि सूर्यवंश के ही प्रतापी चक्रवर्ती नरेश मांधाता की हत्या तक युद्ध में कर दी थी।
प्राचीन असुरों की यह पीठ इतनी शक्तिशाली थी कि रावण तक लवणासुर से कन्नी काट गया था। परन्तु भृगुओं की एक शाखा के कुलपति च्यवन पर आक्रमण कर असुरों ने भीषण गलती कर दी। ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति के कारण श्रीराम सदैव उचित समय का इंतजार करते थे। अब असुरों द्वारा आक्रामक पहल करने से उनकी अपनी प्रजा और सेना का नैतिक बल प्राप्त हो गया और महर्षि च्यवन के नेतृत्व में भृगुओं के रूप में एक जबरदस्त सहायक मिल गया, तो उन्होंने शत्रुघ्न के नेतृत्व में सेनायें तुरन्त भेज दीं।

तत्कालीन लवणासुर मारा गया, असुर सेनाओं को छिन्न-भिन्न कर दिया गया और श्रीराम ने मधुवन के नाम पर ‘मधुरा’ को सैन्य केन्द्र बनाकर वहाँ नियुक्त किया शत्रुघ्नो और यही मधुरा आगे जाकर कहलाई मथुरा। शत्रुघ्न ने श्रीराम की आज्ञा पर दक्षिण की ओर बढ़कर विदिशा पर भी अधिकार कर लिया और वहाँ नियुक्त किया अपने पुत्र शत्रुघाती को।
भाइयों में एकता व राजनीतिक विवेक
उन्होंने लक्ष्मण की राजसूय यज्ञ करने की सलाह के विरुद्ध भरत के मत के कारण भाइयों में मतभेद को टालने के लिये राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान के विचार को तज कर अपने पूर्वज रघु की भाँति पूरे भारत के पुनः राजनैतिक एकीकरण और ‘चक्रवर्ती’ उपाधि धारण करने का विचार तो छोड़ दिया परन्तु राजनैतिक स्थिरता के लिये सम्पूर्ण भारत को एक दृढ़ संगठित रूप देने की कोशिश अवश्य की।
अश्वमेध और रुद्रों से संधि
अश्वमेध के दौरान संधि संरक्षित राज्य के पक्ष में सहायता को आये महारुद्र शिव से एक संक्षिप्त युद्ध और संधि के पश्चात उत्तर की दिशा सुरक्षित हो गयी जिससे अयोध्या साम्राज्य रुद्रों के अधीन कश्मीर में बसे ‘यक्ष’, ‘नाग’ और ‘पिशाच’ जातियों की अराजकता से सुरक्षित हो गया। यक्षराज कुबेर यों भी श्रीराम के प्रति अत्यन्त श्रद्धा
रखते ही थे।
तक्षशिला व पुष्कलावती की स्थापना
सर्वाधिक समस्या थी उत्तर पश्चिम में और उसके मूल में थे ‘गंधर्व’। उन्होंने पूरे पश्चिमोत्तर क्षेत्र में आतंक मचा रखा था और यहाँ तक कि उन्होंने आनव नरेश और भरत के मामा युधाजित की हत्या कर दी। अवसर की तलाश में बैठे श्रीराम ने तुरन्त भरत और उनके पुत्रों तक्ष व पुष्कल के सेनापतित्व में एक विशाल सेना बाह्रीक प्रदेश में भेज दी जिनका स्वागत मुक्तिदायिनी सेना के रूप में आनवों ने किया। गन्धर्वों को वापस हिमालय व पामीर की ओर भागना पड़ा।
भरत ने आनवों और दुह्युओं की सहायता से सुदूर पश्चिम में सबसे अग्रिम सैन्य चौकी के रूप में अपने ज्येष्ठ पुत्र पुष्कल के नाम पर पुष्कलावती और उसके पीछे सिन्धु के पूर्वी तट पर तक्ष के नाम पर तक्षशिला की स्थापना की। सम्भवतः वे स्थानीय गणक्षत्रियों में समाहित हो गये परन्तु उनके नाम पर बसे ये सैन्यकेन्द्र आगे चलकर वैभवशाली नगरों के रूप में विकसित हुए।
लाहौर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कालान्तर में सिन्धु के नीचे रावी के तट पर राम ने अपने कनिष्ठ पुत्र लव के प्रभार में लवपुर बसाया जो मद्रों व कठों के कारण विशेष विस्तृत न हो सका लेकिन वह एक छोटी बस्ती या गाँव के रूप में किसी तरह बना रहा और 9वीं शताब्दी में दुर्ग रूप में लोहकोट और नगरीकृत रूप में ‘लवपुर’ या लाहौर के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जहाँ किसी काल में इसके संस्थापक लव की स्मृति में बनाया गया ‘लव मन्दिर’ जीर्ण-शीर्ण दशा में आज भी स्थित है।