कचरे से आशियाना : प्लास्टिक की खाली बोतलों से बन रहे सस्ते और मजबूत घर

कचरे से आशियानाः प्लास्टिक की खाली बोतलों से बन रहे सस्ते और मजबूत घर
कचरे से आशियानाः प्लास्टिक की खाली बोतलों से बन रहे सस्ते और मजबूत घर

कचरे से आशियानाः प्लास्टिक की खाली बोतलों से बन रहे सस्ते और मजबूत घर

पर्यावरण प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे के वैश्विक संकट के बीच निर्माण क्षेत्र से एक बेहद अनूठी और क्रांतिकारी तकनीक सामने आई है। इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक की खाली बोतलों को अब सिर्फ लैंडफिल का कचरा नहीं, बल्कि मजबूत, किफायती और पर्यावरण अनुकूल मकानों की ईंट के रूप में ढाला जा रहा है। निर्माण लागत में लगातार हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी और बेघर आबादी के लिए सस्ते आवास की चुनौती के दौर में ‘प्लास्टिक बॉटल हाउस की यह तकनीक दुनिया भर में टिकाऊ वास्तुकला के एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।


इस तकनीक की कार्यप्रणाली बेहद सरल और वैज्ञानिक रूप से ठोस है। इसमें सामान्य प्लास्टिक की बोतलों (विशेष रूप से पीईटी बोतलों) को अच्छी तरह सुखाकर उनके भीतर सूखी रेत, मिट्टी या निर्माण अपशिष्ट को पूरी तरह ठूंस ठूंस कर भर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को इको-बिक निर्माण कहा जाता है। जब एक बोतल में रेत या मिटटी को सघनता से भर दिया जाता है, तो उसकी संरचनात्मक मजबूती सामान्य मिट्टी की पकी हुई ईंट से भी अधिक हो जाती है। इसके बाद इन बोतलों को पारंपरिक ईंटों की तरह एक के ऊपर एक सजाया जाता है और उन्हें आपस में जोड़ने के लिए सीमेंट-रेत के गारे या मि‌ट्टी और चूने के पारंपरिक मिश्रण का उपयोग किया जाता है। बोतलों को नायलॉन की मजबूत रस्सियों या तारों से आपस बांधा जाता है. जिससे दीवारों को भूकंप और बाहरी दबाव के खिलाफ अतिरिक्त लचीलापन और मजबूती मिलती है।
लागत के लिहाज से यह तकनीक आम आदमी के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। पारंपरिक निर्माण में ईंटों और भारी सामग्रियों पर होने वाले खर्च की तुलना में प्लास्टिक की बोतलों से बनने वाले मकानों की लागत लगभग चालीस से पचास प्रतिशत तक कम हो जाती है। जिन क्षेत्रों में ईंट भट्टों की कमी है या परिवहन खर्च बहुत ज्यादा है. वहां स्थानीय स्तर पर मिलने वाले प्लास्टिक कचरे और मिट्टी के जरिए बेहद कम बजट में मजबूत छत खड़ी की जा सकती है। आर्थिक लाभ के अलावा, इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण संरक्षण है। एक छोटे से कमरे के निर्माण में हजारों खाली बोतलों का पुनः उपयोग हो जाता है, जो अन्यथा सैकड़ों वर्षों तक नालियों, नदियों या मिट्टी में दबकर पर्यावरण को जहरीला बनाती रहतीं।

थर्मल इंसुलेशन यानी तापमान नियंत्रण के मामले में मी ये घर पारंपरिक मकानों की तुलना में कहीं बेहतर साबित होते हैं। बोतलों के भीतर भरी मिट्टी या रेत स्वाभाविक रूप से तापमान को संतुलित रखने का काम करती है। नतीजतन, भीषण गर्मी के मौसम में इन घरों के भीतर का तापमान सामान्य कमरों की तुलना में काफी ठंडा रहता है, जबकि सर्दियों में अंदर का वातावरण गर्म बना रहता है। इससे पंखों, कूलर और हीटरों की बिजली खपत में भी भारी कमी आती है. जो इसे ऊर्जा दक्ष आवास बनाता है। इसके अलावा, प्लास्टिक के अक्रिय स्वभाव के कारण इन दीवारों में सीलन की समस्या नहीं होती और उचित प्लास्टर के बाद यह सामान्य कंक्रीट की दीवारों जैसी ही आकर्षक और सुरक्षित दिखती हैं।

अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों में कई सफल प्रयोगों के बाद अब भारत और अन्य विकासशील देशों में भी गैर-सरकारी संगठन और पर्यावरण प्रेमी आर्किटेक्ट इस मॉडल को बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में स्कूल, सामुदायिक केंद्र और सस्ते मकान बनाने के लिए इस तकनीक का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। प्लास्टिक की खाली बोतलों से बने ये आशियाने यह साबित करते हैं कि यदि सही दृष्टि और तकनीक का मेल हो, तो पर्यावरण का सबसे बड़ा नासूर बन चुका कचरा भी किसी बेसहारा के सिर की मजबूत और टिकाऊ छत बन सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *