
प्राकृतिक खेती में कम लागत में ज्यादा कमायी
देश में बढ़ती खेती की लागत और घटते मुनाफे के बीच अब किसान कम लागत वाली खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। रासायनिक खाद, महँगे बीज और कीटनाशकों पर बढ़ते खर्च ने किसानों की चिन्ता बढ़ा दी है। ऐसे में प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रयोग किसानों के लिये राहत का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान सही योजना, आधुनिक तकनीक और बाजार की माँग के अनुसार खेती करें, तो कम लागत में भी अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार कम लागत की खेती केवल खर्च कम करने का तरीका नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, उत्पादन सुधारने और खेती को लम्बे समय तक टिकाऊ बनाने का माध्यम भी है। यही कारण है कि अब देश के कई राज्यों में किसान प्राकृतिक खेती, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और सहफसली खेती जैसी तकनीकों को तेजी से अपना रहे हैं।
जैविक खेती की ओर बढ़ा रुझान
रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों के दुष्प्रभाव सामने आने के बाद किसान अब प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। किसान देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत, घन जीवामृत और बीजामृत का उपयोग कर रहे हैं। इसके अलावा गोबर खाद, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट और नीम आधारित उत्पादों का प्रयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवामृत मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाता है और फसल की वृद्धि में मदद करता है। वहीं वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ उत्पादन क्षमता भी बढ़ाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसान इन जैविक खादों को अपने खेत या घर पर ही कम लागत में तैयार कर सकते हैं।
सहफसली खेती से अतिरिक्त आय
कम लागत में अधिक कमाई के लिये सहफसली खेती को सबसे प्रभावी मॉडल माना जा रहा है। इस पद्धति में किसान मुख्य फसल के साथ दूसरी फसलें भी उगाते हैं। इससे खेत खाली नहीं रहता और एक साथ कई फसलों से आय प्राप्त होती है।
उदाहरण के तौर पर किसान टमाटर के साथ धनिया, गन्ने के साथ सब्जियाँ, आलू के साथ काहू या धनिया तथा पपीते के साथ खीरा या तरबूज की खेती कर रहे हैं। इससे खेती का जोखिम भी कम होता है और किसानों को लगातार आमदनी मिलती रहती है।
मल्चिंग तकनीक से बच रहा पानी
मल्चिंग तकनीक आज सब्जी और फल उत्पादक किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है। इस तकनीक में खेत की मिट्टी को प्लास्टिक शीट, पराली या सूखी पत्तियों से ढक दिया जाता है। इससे मिट्टी की नमी लम्बे समय तक बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मल्चिंग तकनीक से पानी की बचत होती है और उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। टमाटर, मिर्च, खीरा और तरबूज जैसी फसलों में यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हो रही है।
ड्रिप सिंचाई बन रही वरदान
पानी की कमी को देखते हुए किसान अब ड्रिप सिंचाई यानी टपक सिंचाई तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं। इस पद्धति में पानी बूंद-बूंद करके सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचाया जाता है। इससे पानी की 40 से 60 प्रतिशत तक बचत होती है और पौधों को जरूरत के अनुसार नमी मिलती रहती है। ड्रिप सिंचाई के माध्यम से खाद भी आसानी से दी जा सकती है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है। सरकार भी इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिये किसानों को सब्सिडी उपलब्ध करा रही है। विशेष रूप से फल और सब्जी की खेती में यह तकनीक काफी लाभदायक मानी जा रही है।
पॉलीहाउस या शेडनेट खेती से लाभ
पॉलीहाउस और शेडनेट खेती आधुनिक कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं। नियंत्रित वातावरण में की जाने वाली इस खेती में मौसम का प्रभाव कम पड़ता है और सालभर फसल उत्पादन सम्भव होता है। विशेषज्ञों के अनुसार पॉलीहाउस में उगायी गयी सब्जियाँ और फूल बाजार में अधिक कीमत पर बिकते हैं। हालाँकि इसमें शुरुआती निवेश थोड़ा अधिक होता है, लेकिन इससे होने वाला मुनाफा सामान्य खेती की तुलना में दो से चार गुना तक अधिक हो सकता है।
कम लागत वाली फसलें पहली पसन्द
कम खर्च और जल्दी उत्पादन देने वाली फसलों की ओर किसानों का रुझान बढ़ रहा है। खीरा, लौकी, भिण्डी और टमाटर जैसी सब्जियाँ 30 से 60 दिनों में उत्पादन देना शुरू कर देती हैं और बाजार में इनकी माँग हमेशा बनी रहती है। इसके अलावा तुलसी, अश्वगंधा, एलोवेरा और सर्पगंधा जैसी औषधीय फसलों की खेती भी तेजी से बढ़ रही है। आयुर्वेद और हर्बल उत्पादों की बढ़ती माँग के कारण इन फसलों की बाजार में अच्छी कीमत मिल रही है।