
भारतीय सनातन परम्परा में त्योहार केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि प्रकृति-चक्र, ऋतुओं और मानवीय जीवन के सामंजस्य के जीवन्त उदाहरण हैं। हरेला, रक्षा बन्धन, दिवाली, होली और तीज जैसे उत्सव पर्यावरण संरक्षण की प्राचीन भारतीय चेतना को दर्शाते हैं। इनमें से तीज का विशेष महत्व है क्योंकि यह सीधे मानसून, हरियाली और जल-चक्र से जुड़ा है।
तीज मुख्य रूप से श्रावण मास में मनाया जाता है, जब मानसून अपनी पूर्णता पर होता है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल और उत्तराखण्ड में यह त्योहार महिलाओं द्वारा बड़े उत्साह से मनाया जाता है। हरियाली तीज, कजरी तीज और तीजा-तीज के रूप में यह विविध रूपों में प्रसिद्ध है। इसमें महिलाएँ निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं, शिव-पार्वती की पूजा करती हैं और झूलों पर बैठकर प्रकृति का आनन्द लेती है।
पर्यावरण से गहरा नाता
तीज का पर्यावरणीय सम्बन्ध गहरा और वैज्ञानिक है। श्रावण का महीना पेड़-पौधों की वृद्धि, नदियों के उफान और भूमि की उपजाऊ शक्ति का प्रतीक है। इस समय महिलाएँ पीपल, बरगद, तुलसी और अन्य पवित्र वृक्षों की पूजा करती हैं। हरियाली तीज में घरों को हरे पत्तों, फूलों और गेंदों से सजाया जाता है, जो जैव विविधता और हरित क्षेत्र को बढ़ावा देता है।
प्राचीन काल से सनातन संस्कृति में वन देवता, नदी देवी और पृथ्वी माता की पूजा का विधान है। तीज के गीतों में ‘नीलाम्बर धारिणी’ या ‘बरसन लागी सावन’ जैसे छंद व लोकगीत जीवन में मानसून की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हैं। व्रत-उपवास से शरीर की शुद्धि होती है तो वातावरण की शुद्धि के लिये पेड़ लगाने और जल संरक्षण की प्रक्रिया अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित होती है। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान भी यही कहता है कि मानसून के दौरान हरित क्षेत्र बढ़ाने से मिट्टी का कटाव रुकता है, भूजल स्तर सुधरता है और जैविक सन्तुलन बना रहता है। सनातन त्योहार इस सन्तुलन को सांस्कृतिक रूप से मजबूत करते हैं।
सनातन विद्रोही’ विचारधारा
दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आज कुछ ‘सनातन’ विरोधी’ कार्यकर्ता इन उत्सवों को ‘अन्धविश्वास’, ‘पितृसत्ता’ या ‘महिलाओं का शोषण’ बताकर मजाक उड़ाते हैं। सोशल मीडिया पर तीज के झूले, व्रत और गीतों पर तीखे व्यंग्य किये जाते हैं। वे कहते हैं, ‘महिलाएँ भूखी रहकर शिव की पूजा क्यों करती हैं?’, ‘पति की लम्बी आयु की कामना महिलाएँ ही क्यों करें?’ आदि-इत्यादि। काश, वे समझा पाते कि यह दाम्पत्य जीवन में प्रेम को परिभाषित करने का एक पर्याय है, जिसमें महिलाएँ प्रकृति को भी भोजन और जीवन देने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करती हैं।
ये सनातन विरोधी वामपंथी मानसिकता के लोग अक्सर पश्चिमी आधुनिकता की नकल करते हुए सनातन को ‘पिछड़ेपन का परिचायक’ बताते हैं, लेकिन वे खुद प्रकृति से अलगाव की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। यद्यपि सनातन में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ जैसे सिद्धान्त प्रकृति को पूज्य मानते हैं, वहीं आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति प्लास्टिक, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को जन्म दे रही है।
तीज पर तंज करने वाले स्वयंभू ज्ञानियों को याद दिलाना चाहिये कि सनातन उत्सवों में प्लास्टिक का कम उपयोग, स्थानीय फूल-पत्तों का प्रयोग और सामुदायिक उत्सव पर्यावरण अनुकूल हैं। वैश्विक स्तर पर वर्तमान में ‘इको-फेस्टिवल’ की चर्चा हो रही है, वहीं भारत के प्राचीन त्योहार सदियों से इको-फ्रेण्डली रहे हैं।
तीज क्यों मनाते हैं?
तीज महिलाओं को सामाजिक बन्धनों से मुक्ति, प्रकृति से जुड़ाव और स्वास्थ्य सन्तुलन का अवसर प्रदान करता है। व्रत से डिटॉक्सिफिकेशन होता है, झूले से व्यायाम और सामूहिक गीतों से मानसिक स्वास्थ्य बेहतरीन होता है। यह एक दिन का पर्व उत्साह जीवन में सकारात्मक विचारधारा को बल देता है। पर्यावरण की दृष्टि से यह त्योहार मानसून संरक्षण, वृक्षारोपण और जल चेतना का माध्यम है।
जो अतिज्ञानी तीज का मजाक उड़ाते हैं, वे सांस्कृतिक आत्म-विरोध में जी रहे हैं। वे उन परम्पराओं पर हँसते हैं जिन्होंने हजारों वर्षों तक पर्यावरण सन्तुलन बनाये रखा जबकि पश्चिम में अब ‘फॉरेस्ट थेरेपी’ और ‘नेचर कनेक्टेडनेस’ की बात हो रही है, सनातन धर्म ने इसे सदियों पहले संस्थागत रूप दिया। जो आज भी हर सनातनी का जीवन दर्शन है।
तीज केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का पर्यावरणीय प्रतिबिंब है। यह हमें सिखाता है कि आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। ‘सनातन विद्रोहियों’ को चाहिये कि वे परिहास करने पहले इन गहरे सम्बन्धों को समझें। आज जब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता ह्रास की चुनौतियाँ हैं, सनातन उत्सवों को मजाक का विषय बनाने के बजाय उन्हें पर्यावरण संरक्षण के सशक्त माध्यम के रूप में अपनाना चाहिये। तीज की हरियाली हमें याद दिलाती है, ‘धरती माता’ की सेवा ही सच्ची पूजा है। साथ ही, धरती के श्रृंगार रूपी प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण हमारा दायित्व है।