
सम्पूर्ण समाज को करना होगा पुरुषार्थ : सरसंघचालक जी
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परमपूज्य डॉ. मोहन भागवत ने भारत की राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और सन्तुलित विकास को देश के भविष्य के लिये अनिवार्य बताते हुए कहा है कि भारत को विश्वगुरु बनाने का लक्ष्य केवल नारों से पूरा नहीं होगा। इसके लिये समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा। भारत का परम वैभव और विश्वगुरु का स्थान कोई वरदान या उपहार नहीं है, बल्कि इसके लिये पूरे समाज को संगठित होकर पुरुषार्थ करना पड़ेगा।
विजयादशमी उत्सव के अवसर पर अपने सम्बोधन में भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पिछले 100 वर्षों से चल रहा कार्य भारतीय समाज में आत्मबोध, राष्ट्रीय अस्मिता और संगठन की भावना जगाने का प्रयास है। संघ का उद्देश्य समाज को संगठित, सामर्थ्यवान और परस्पर सद्भाव से युक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि भारत की विविधताओं को स्वीकार करते हुए आन्तरिक एकता को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। देश की भाषाओं, पन्थों, जातियों, खानपान और रीति-रिवाजों में भिन्नता होने के बावजूद भारतीय समाज की मूल सांस्कृतिक चेतना एक है। उन्होंने कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष में देशभर में आयोजित कार्यक्रमों का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचना, संवाद बढ़ाना और राष्ट्रीय जीवन में नागरिकों की सहभागिता को मजबूत करना था।
10 करोड़ परिवारों तक पहुँचा संघ
संघ प्रमुख ने शताब्दी वर्ष के दौरान चलाये गये सम्पर्क अभियान के आँकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि देश के 4,61,527 गाँवों में कार्यकर्ता पहुँचे। नगरीय क्षेत्रों में 10-10 हजार की आबादी वाली लगभग 41 हजार बस्तियों में भी सम्पर्क किया गया। इस अभियान के अन्तर्गत 10,19,88,511 घरों तक पहुँचने का प्रयास किया गया। उन्होंने बताया कि देश के 1,117 जिलों में प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियाँ आयोजित की गयीं, जिनमें महिला और पुरुष मिलाकर 4,26,497 लोगों ने भाग लिया। सामाजिक सद्भाव बढ़ाने के उद्देश्य से 5,036 विकासखण्डों में विभिन्न जातियों और समुदायों के प्रमुखों की बैठकें हुईं। भागवत ने अपेक्षा जताई कि ऐसी बैठकें आगे भी नियमित रूप से आयोजित हों, ताकि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और सहयोग का वातावरण विकसित हो। उन्होंने बताया कि 10 से 20 गाँवों के समूह वाले 34,187 मण्डलों में हिन्दू सम्मेलन आयोजित किये गये। युवा सम्मेलनों में 39 लाख 25 हजार 225 युवाओं की भागीदारी रही। उनके अनुसार, इन कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि समाज में आत्मीयता, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करना था।
डॉ. भागवत जी ने कहा कि शताब्दी वर्ष के दौरान विदेशों में भी भारत, हिन्दू समाज और संघ के बारे में सही जानकारी पहुँचाने के लिये कार्यक्रम आयोजित किये गये। भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के साथ दुनिया में भारतीय विचार और जीवन-पद्धति को लेकर जिज्ञासा बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि विश्व आज ऐसी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है, जिनका समाधान केवल भौतिक प्रगति से सम्भव नहीं है। परिवार व्यवस्था में गिरावट, नयी पीढ़ी के संस्कारों का क्षरण, पर्यावरण संकट, आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव जैसी समस्याएँ व्यापक चिन्ता का विषय हैं। उनके अनुसार, भारतीय परम्परा में इन समस्याओं के समाधान के लिये एक व्यापक दृष्टिकोण मौजूद है।
सन्त रविदास, स्वामी श्रद्धानन्द और महात्मा फुले का स्मरण
कि भागवत ने अपने सम्बोधन में सन्त रविदास, स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती, महात्मा ज्योतिराव फुले और बंगाल के राजनारायण बसु का उल्लेख करते हुए कहा। इन महापुरुषों के जीवन और कार्यों से समाज को आत्मबोध, स्वधर्मनिष्ठा और संगठन की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने कहा कि संत रविदास ने कठिन परिस्थितियों में भी स्वधर्मनिष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का सन्देश दिया। उनके जीवन ने समाज को धैर्य और साहस प्रदान किया।
स्वामी श्रद्धानन्द ने आर्य समाज, शिक्षा और शुद्धि आन्दोलन के माध्यम से समाज में जागरण का कार्य किया। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती ने ओडिशा के वनवासी क्षेत्रों में रहकर सेवा और धार्मिक चेतना के लिये अपना जीवन समर्पित किया। भागवत ने महात्मा फुले के सामाजिक योगदान और राजनारायण बसु के स्वदेशी तथा सामाजिक संगठन सम्बन्धी प्रयासों को भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि ऐसे महापुरुषों का स्मरण इसलिये महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका जीवन समाज में आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना जगाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य भी इसी स्वबोध को जागृत करने से जुड़ा है।