निराश्रित बचपन की छाँव बनीं मनन

manan chaturvedi
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निराश्रित बचपन की छाँव बनीं मनन

जयपुर। वैसे तो समाज में सामाजिक संस्थाओं की कोई कमी नहीं जो सामाजिक अव्यवस्थाओं और निराशाओं को दूर करने के लिए प्रयासरत है और ना ही ऐसे लोगों का अकाल है जो मानवीय संवेदनाओं से भरपूर है और जिन्होंने अपने जीवन को एक निश्चित उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया है। लेकिन कुछ ऐसे जीवन भी हैं जो अपने आलोक से ना केवल समाज को प्रेरित कर रहे हैं अपितु सामाजिक चेतना को जाग्रत करने का मार्ग भी प्रशस्त कर रहे है। ऐसे सभी लोग समाज की ऐसी धरोहर है जिनके बारे में समय-समय पर आंदोलित होने की आवश्यकता है।



जीवन समर्पित


जयपुर की श्रीमती मनन चतुर्वेदी एक ऐसा ही व्यक्तित्व है जिन्होंने निराश्रित और परित्यक्त बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिये अपने जीवन को समर्पित कर दिया। व्यवसाय से फैशन डिजायनर रही मनन चतुर्वेदी के जीवन को एक घायल बालिका के उपचार ने ऐसा मोड़ दिया कि वे अपनी फैशन की दुनिया को छोड़कर बच्चों के जीवन को सँवारने में लग गयीं। आज वे जयपुर में सुरमन संस्थान के नाम से दो बाल आश्रम संचालित करती है जिसमें १२५ बच्चे अपने जीवन को नई दिशा दे रहे हैं। इसके साथ ही परिवार से बिछुड़े ७५० से अधिक बच्चों को उनके परिवार से मिला चुकी हैं। इसके अतिरिक्त ग्यारह बेटियों की अब तक शादी कर चुकी हैं।
अपनी जीवनयात्रा के बारे में वे कहती है कि मैंने ये सोचा कि लोगों के परिधान और जीवनशैली को संवारने से ज्यादा अच्छा था कि मैं उस जीवन को संवारूँ जो बिना किसी गलती के सामाजिक अव्यवस्थाओं या भाग्य के कारण जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित रह गए हैं।

मनन बताती है कि उन्होंने सुरमन संस्थान में चार नियम बना रखे है जिसमें पहला है सरकारी अनुदान नहीं लेना, दूसरा बच्चे गोद नहीं देना बच्चों को किसी के उतरे हए कपड़े नहीं पहनाना और चौथा बाहर का खाना नहीं खिलाना। इसका सीधा सा अर्थ यही था कि समाज का काम समाज के सहयोग और अपने पुरुषार्थ से हो। इसलिए बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे थियेटर शो करती है। एक पत्रिका बोगन वेलिया प्रकाशित करती है, दशहरा मेला आयोजित करती है और सबसे अनूठा काम लाइव पेंटिंग शो करती है।


जीवन का उद्देश्य

वे कहती है, करुणा हर व्यक्ति के मन में होती है लेकिन कोई उसको निखार कर अपने जीवन का उद्देश्य बना लेता है और कोई उसको अनदेखा कर अपना एकांगी जीवन जीता जाता है। वह याद करते हुए कहती हैं कि २००२ में वह एक पिछड़ी बस्ती में बच्चों के लिए कॉपी, किताब, रंग, पेंसिल बॉटने गयी थीं वहीं उनको एक बच्ची मिली जो घायल थी। उसकी माँ को होश नहीं था, वह शराब के नशे में ही रहती थी। बस्ती वालों ने कहा कि बिना इलाज के यह मर जाएगी. इसका इलाज करा दो। सिर में चोट लगी होने के कारण उसका काफी खून बह चुका था. यह बहुत कमजोर हो गयी थी। उस बच्ची को लेकर वे जयपुर के जैके लॉन हॉस्पिटल गई और अच्छे इलाज और डॉक्टरों की मेहनत से यह बच्ची बच गयी। मनन बताती हैं कि उस बच्ची के स्वस्थ होने के बाद जब उस बस्ती में पहुँची तो बस्ती वालों ने कहा कि इसे आप ही पाल लो, यहाँ तो इसकी माँ वापस इसे घायल कर देगी क्योंकि घायल बच्चों को दिखाकर भीख अच्छी मिलती है। मनन ने उन्हें बताया कि उनके स्वयं के तीन बच्चे हैं तो वहाँ उपस्थित महिलाओं ने कहा कि जहाँ तीन हैं, वहीं चार सही।


वे बताती है कि उस महीने उनके पास विभिन्न मामलों में आठ बच्चे ऐसे आए जिन्हें तुरंत सहारे की जरूरत थी। उसके बाद उन्होंने बाल आश्रम की शुरुआत की और तब से यह यात्रा आज तक जारी है।


वे बताती हैं कि २०१२ में दिल्ली में जब निर्भया बलात्कार कांड हुआ था तब देशभर में महिला अत्याचारों के विरुद्ध गहरा गुस्सा और आक्रोश था, लाखों लोग सड़कों पर मोमबत्तियाँ और तख्तियाँ लेकर आंदोलित थे तब उन्होंने एंजिल ऑफ लव विचार के साथ कैनवास और रंगों को पकड़ा। तब उन्होंने जयपुर में लगातार ७२ घंटों तक अपनी हथेलियों से पेंटिंग्स बनायी। २६ दिसम्बर, २०१२ की शाम पाँच बजे शुरू हुआ यह अभियान १ जनवरी, २०१३ की शाम पाँच बजे तक चला, बाद में उनके इस प्रयास को वर्ल्ड रिकॉर्ड बुक में भी दर्ज किया गया। उसके बाद राजस्थान और गुजरात के लगभग हर प्रमुख शहरों में उन्होंने २४ घंटे तक पेंटिंग शो किए हैं और इन सबका उद्देश्य सिर्फ इतना है कि समाज बच्चों के लिए संवेदनशील बने, क्योंकि बच्चे खेलने के लिए नहीं समझने वाले फूल हैं। पेंटिंग शो और थियेटर की यात्रा अभी भी जारी है।

मनन चतुर्वेदी को इस कार्य के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा राष्ट्रीय युवा पुरस्कार, वीर सावरकर पुरस्कार प्रमुख हैं। उन्हें २०१५ में राजस्थान सरकार ने राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का अध्यक्ष भी नियुक्त किया था।
वे कहती हैं बच्चे इसलिए उपेक्षित हैं क्योंकि उनकी आवाज दूर तक नहीं जाती है, वे नन्हें हैं, इसलिए उन पर दृष्टि नहीं जाती। उनके पास पैसे और वोट की ताकत नहीं है, इसलिए वे अनसुने और अनदेखे कर दिए जाते हैं। सरकार और हम अपनी कही यह बात भूल जाते हैं कि बच्चे हमारा भविष्य हैं।

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