
वह विभाजन जिसने उपमहाद्वीप का नक्शा बदल दिया ~
1947 में भारत का बँटवारा सिर्फ़ एक नई सीमा रेखा खींचने से कहीं ज़्यादा था। यह इतिहास में ज़बरदस्ती किए गए सबसे बड़े और सबसे दर्दनाक विस्थापनों में से एक था, जिसने पंजाब, बंगाल, सिंध, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और कई अन्य इलाकों में लाखों लोगों की ज़िंदगी बदल दी।
सदियों के साझे इतिहास से फले-फूले शहर, कस्बे और गाँव अचानक बँट गए, जिससे परिवार अलग हो गए, समुदाय उजड़ गए और जानी-पहचानी जगहें हमेशा के लिए बदल गईं।
दर्द भरा पलायन
करीब 60 लाख गैर-मुस्लिम उस क्षेत्र से निकलने के लिए मजबूर हो गए, जिसे बाद में पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया। वहीं, लगभग 65 लाख मुस्लिम पंजाब, दिल्ली और भारत के अन्य हिस्सों से पश्चिमी पाकिस्तान चले गए। भारत के पूर्वी हिस्से में भी विस्थापन का यही सिलसिला चला। अनुमान है कि करीब 20 लाख गैर-मुस्लिम पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से निकले, और 1950 के आसपास 20 लाख और पश्चिम बंगाल में शरण लेने पहुंचे। उसी दौरान, लगभग 10 लाख मुस्लिम पश्चिम बंगाल से पलायन कर गए। इस पूरे दौर में मारे गए लोगों की संख्या का अनुमान 5 लाख से लेकर 10 लाख या उससे अधिक तक जाता है।

विभाजन से पहले का भारत
बदलता हुआ राजनीतिक परिदृश्य (1905-1919)
एक अहम मोड़
बीसवीं सदी की शुरुआत भारत के संवैधानिक इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुई। बंगाल के विभाजन (1905) ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक लामबंदी को जन्म दिया और शासन, प्रतिनिधित्व तथा भारत के राजनीतिक भविष्य पर सार्वजनिक बहस को तेज़ कर दिया।
राजनीति में नई आवाज़ों का उदय
ऑल-इंडिया मुस्लिम लीग (1906) के गठन ने संगठित राजनीतिक प्रतिनिधित्व में एक नया आयाम जोड़ा। जैसे-जैसे राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, विभिन्न संगठनों ने भारत के संवैधानिक भविष्य के लिए अपनी-अपनी सोच को और अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा।
प्रतिनिधित्व का बदलता स्वरूप
इंडियन काउंसिल एक्ट (1909) ने मुस्लिमों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों (Separate Electorates) की व्यवस्था की, जिससे धार्मिक पहचान के आधार पर अलग-अलग चुनावी क्षेत्र बने। ब्रिटिश शासन के तहत प्रतिनिधि सरकार के विकसित होते ढांचे में यह एक बड़ा बदलाव था।
सुधार तथा प्रतिनिधित्व
बाद के संवैधानिक सुधारों ने विधान परिषदों का विस्तार किया एवं राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया। इन उपायों ने अधिक संख्या में भारतीयों को राजनीतिक प्रक्रिया से जोड़ा। इसी के साथ-साथ इन उपायों ने प्रतिनिधित्व, शासन और संविधान के संरक्षण पर होने वाली बहसों को भी नया रूप दिया।
एक नया संवैधानिक दौर
इन घटनाक्रमों ने भारत की संवैधानिक यात्रा को बदल दिया। जैसे-जैसे प्रतिनिधि राजनीति का विकास हुआ, पहचान, सत्ता-साझाकरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल संवैधानिक चर्चा के केंद्र में आते गए-ये ऐसे मुद्दे थे जिन्होंने आने वाले दशकों में भारत के भविष्य को आकार दिया।