क्रान्तिवीर पं. राम प्रसाद बिस्मिल

काकोरी के क्रान्तिवीरों में पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल का नाम अग्रणी रूप से लिया जाता है। इनके पूर्वज मध्य प्रदेश के निवासी थे किन्तु इनका परिवार उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में आकर बस गया। रामप्रसाद बचपन में अत्यन्त चंचल स्वभाव के थे। उनका मन पढ़ायी में कम और खेल कूद में अधिक लगता था। उनकी शिक्षा मिशन हाईस्कूल शाहजहाँपुर में हुई। इसी विद्यालय में अशफाक उल्लाह खाँ भी पढ़ते थे और यहीं दोनो में मित्रता हुई। राम प्रसाद जी के व्यक्तित्व पर आर्य समाज के संन्यासियों के भाषणों का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उस समय आर्य समाजी शिक्षा सामाजिक व राजनीतिक रूप से क्रान्ति की ही शिक्षा थी अतः युवा होते-होते रामप्रसाद कई क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आ चुके थे। दिसम्बर 1916 में लखनऊ में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में गरम दल के नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जब लखनऊ चारबाग रेलवे स्टेशन पर पहुँचे तब कुछ लोग उन्हें कार से बिठाकर चुपचाप ले जाना चाहते थे पर वहाँ पर उपस्थित कुछ युवा अड़ गये कि वह तिलक जी को जुलूस के रूप में ले जायेंगे। युवकों की इच्छा पूर्ण हुई और वो तिलक जी को एक खुली बग्घी में ले गये। जिन युवकों ने उस बग्धी को खींचा उसमें राम प्रसाद बिस्मिल भी शामिल थे। फरवरी 1919 के विख्यात मैनपुरी केस में महान क्रान्तिकारी गेंदालाल दीक्षित के सहयोगियों में रामप्रसाद बिस्मिल भी थे। इसी केस में राम प्रसाद बिस्मिल पहली बार फरार हुए और वह तभी प्रकट हुए जब अंग्रेज सरकार द्वारा देशभर में आम माफी की घोषणा की गयी। फरारी जीवन से प्रकट होने के बाद बिस्मिल उत्तर प्रदेश में सक्रिय गुप्त क्रान्तिकारी संस्था हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सम्पर्क में आये और उसके प्रमुख सदस्य बन गये। इस दल में बिस्मिल ने अपने मित्रों अशफाक व ठाकुर रोशन सिंह को भी शामिल कर लिया। बिस्मिल ने काकोरी ट्रेन एक्शन के साथ बमरौली, शिवपुरी व द्वारकापुर की घटनाओं में भी बिस्मिल ने प्रमुख भूमिका निभायी।


काकोरी की घटना

7 अगस्त 1925 को बिस्मिल के घर पर एक आपात बैठक हुई। इस बैठक में अशफाक, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद, शचींन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्ता, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी शर्मा तथा बनवारी लाल शामिल थे। इस बैठक। में सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में लूटने की योजना बनायी गयी। यह सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार ट्रेन पर जर्मनी के बने चार माउजर पिस्तौल के साथ सवार हो गये। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी क्रान्तिकारियों ने उसे चेन खींचकर रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। उसे खोलने का प्रयास किया गया किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्ता को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्से को तोड़ने में जुट गये। तभी मन्मथनाथ गुप्ता का माउजर दब गया जिससे टूटी गोली अहमद अली नामक एक यात्री लगी और उसकी तत्काल मौत हो गयी। चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बान्धकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गयी। अंग्रेज सरकार ने इस घटना को गम्भीरता से लिया और तत्कालीन स्कॉटलैण्ड पुलिस को इस घटना की जाँच की जिम्मेदारी दी। उस समय स्कॉटलैण्ड पुलिस सबसे तेज तर्रार मानी जाती थी व उसका पूरी दुनिया में नाम था।


गिरफ्तारी और अभियोग

पुलिस ने मामले की गम्भीर छानबीन करके सरकार को बताया कि काकोरी ट्रेन लूट क्रान्तिकारियों ने दल ने करी है। पुलिस ने घटना में शामिल क्रान्तिकारियों की गिरफ्तारी के लिये पुरस्कार की घोषणा कर दी और जगह-जगह विज्ञापन लगवा दिये। पुलिस घटनास्थल पर मिली चादर में धोबी के निशान से शाहजहाँपुर तक पहुँच गयी। शाहजहाँपुर के धोबियों से पता चला कि यह चादर बनारसी लाल की है। बनारसी लाल बिस्मिल के घर पर हुई बैठक में शामिल थे। बनारसी लाल पुलिस से मिल गये और बयान दे दिया बताया कि काकोरी लूट के असली मुखिया रामप्रसाद बिस्मिल ही थे। 26 सितम्बर 1925 की रात बिस्मिल के साथ सम्पूर्ण हिन्दुस्तान से 40 क्रान्तिवीर गिरफ्तार कर लिये गये। इनमें काकोरी घटना में केवल 10 ही शामिल थे अतः उन्हीं को नामजद किया गया और मुकदमा चलाया गया।
जवाहरलाल नेहरू के करीबी वकील जगतनारायण “मुल्ला” इस केस में सरकारी वकील बने और अपने ही देश को स्वतंत्र करने वालों के विरुद्ध खड़े हुए। काकोरी केस का ऐतिहासिक मुकदमा लखनऊ में चला। अदालत ने राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी और अशफाक उल्ला खाँ को फाँसी की सजा सुनायी। यह समाचार जंगल की आग की तरह पूरे भारत में फैल गया। रामप्रसाद व उनके सहयोगियों को फांसी से बचाने के लिये पण्डित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में देशभक्त वकीलों ने पूरी ताकत लगा दी। यह लोग लन्दन जाकर वायसराय से भी मिले किन्तु अंग्रेज सरकार ने तय कर लिया था कि यह फांसी नहीं रोकी जायेगी। उनकी प्रिवी काउंसिल में भेजी गयी क्षमादान याचिका भी खारिज कर दी गयी।

रामप्रसाद बिस्मिल की अपने माता-पिता से अन्तिम भेंट 18 दिसम्बर 1927 को हुई और सोमवार 19 दिसम्बर को उन्हें फांसी दे दी गयी। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बहुत बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गयी थी। जनता के दबाव में बिस्मिल का शव उनके परिजनों को दिया गया। रामप्रसाद बिस्मिल की शवयात्रा में लाखों लोग शामिल हुए। राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया।

रामप्रसाद जी की फाँसी व बलिदान पर भगत सिंह ने एक अत्यन्त भावुक और सारगर्भित लेख लिखा। बिस्मिल एक बहुत अच्छे लेखक व शायर भी थे, उन्होंने देश के युवाओं को क्रान्ति के लिये प्रेरित करने हेतु कई पुस्तकें लिखीं। ये पुस्तकें थीं बोल्शेविकों की करतूत, मन की लहर, कैथेराइन, स्वदेशी रंग और क्रान्तिकारी जीवन (जो प्रकाशित न हो सकी)। उन्होंने कई अंग्रेजी और बंगला पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद भी किया। राम तथा अज्ञात नाम से कई मासिक पत्रिकाओं में लेख लिखे जो अत्यन्त लोकप्रिय हुए। राम प्रसाद जी की सबसे उत्कृष्ट कृति उनकी आत्मकथा है जिसे फाँसी लगने के तीन दिन पूर्व अंग्रेज अधिकारियों की नजर से बचाकर सुरक्षित
किया गया था।

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