
भारतीय अर्थचिन्तन : कौटिल्य से डिजिटल तक
।। सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलं अर्थः ।।
भारत को प्रायः केवल अध्यात्म और दर्शन की भूमि कहा जाता है, परन्तु यह अर्धसत्य है। भारत आर्थिक चिन्तन की भी उतनी ही समृद्ध भूमि रहा है। आज से लगभग दो सहस्र वर्ष पूर्व आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य (कौटिल्य) ने ‘अर्थशास्त्र’ नामक जिस ग्रन्थ की रचना की, वह विश्व का प्रथम व्यवस्थित आर्थिक प्रशासनिक ग्रन्थ माना जाता है। जिस काल में विश्व के अनेक भाग सभ्यता की प्रारम्भिक सीढ़ियों पर थे, उस काल में भारत में कराधान, राजकोष, मुद्रा, व्यापार, श्रम-नीति और बाजार-नियमन जैसे विषयों पर सूक्ष्म एवं व्यवस्थित चिन्तन हो चुका था। विडम्बना यह है कि आज की नयी पीढ़ी एडम स्मिथ और कीन्स को तो जानती है, परन्तु अपनी ही धरती के अर्थमनीषी कौटिल्य के सिद्धान्तों से अपरिचित् है। आवश्यकता इस गौरवशाली परम्परा को पुनः जानने और जीवन में उतारने की है।
धर्म और सुख की आधारशिला
कौटिल्य का उपर्युक्त सूत्र भारतीय अर्थचिन्तन का सार है कि सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल अर्थ। अर्थात् सम्पदा कोई त्याज्य वस्तु नहीं, अपितु धर्म, कर्तव्य और लोक-कल्याण की आधारशिला है। भारतीय मनीषा ने चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में अर्थ को सम्मानजनक स्थान दिया, किन्तु एक शर्त के साथः अर्थ का अर्जन धर्मपूर्वक हो। यही वह सन्तुलित जीवन-दृष्टि है जो आज के भोगवादी युग में सर्वाधिक प्रासंगिक है, जहाँ लाभ ही एकमात्र लक्ष्य बन गया है और साधनों की शुचिता गौण होती जा रही है। भारतीय चिन्तन कहता है कि समृद्धि अवश्य पाओ, परन्तु मर्यादा के मार्ग से।
कराधान का शाश्वत विवेक
कौटिल्य ने राजा को परामर्श दिया कि प्रजा से कर उसी प्रकार लेना चाहिये जैसे भ्रमर पुष्प से मधु लेता है, अर्थात् पुष्प को बिना क्षति पहुँचाये। सूर्य जिस प्रकार जल को धीरे-धीरे सोखकर वर्षा के रूप में लौटा देता है, उसी प्रकार राज्य को कर लेकर उसे जन-कल्याण के रूप में लौटाना चाहिये। यह सिद्धान्त आज की कर-नीति के लिये भी आदर्श है। कर इतना हो कि राजकोष समृद्ध रहे, परन्तु प्रजा पर बोझ न बने। कौटिल्य ने राजकोष को समस्त राजकीय गतिविधियों का प्राण कहा है। ‘कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः’ अर्थात् समस्त कार्यों का आरम्भकोष से ही होता है। आज जब राष्ट्र राजकोषीय अनुशासन और जन-कल्याण के मध्य सन्तुलन खोज रहा है, तब यह प्राचीन दृष्टि सटीक मार्गदर्शन करती है।
नयी पीढ़ी के लिये तीन अमूल्य सूत्र
आज का युवा डिजिटल भुगतान करता है, ऑनलाइन क्रय-विक्रय करता है और ‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ जैसे प्रलोभनों से घिरा है। क्षणिक आकर्षण में लिये गये आर्थिक निर्णय उसे अनजाने ही ऋण-जाल की ओर धकेल रहे हैं। ऐसे युग में भारतीय अर्थचिन्तन के तीन सूत्र आवश्यकता उसके लिये दीपस्तम्भ के समान हैं। प्रथम सूत्र है और इच्छा में विवेक। ईशावास्योपनिषद् का ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ संयमित एवं विवेकपूर्ण उपभोग की ही शिक्षा देता है। द्वितीय सूत्र है संचय और निवेश की संस्कृति। भारतीय परिवारों की परम्परागत बचत-प्रवृत्ति ही अनेक वैश्विक आर्थिक संकटों में हमारी अर्थव्यवस्था की ढाल सिद्ध हुई है। बूंद-बूंद से घट भरता है, यह लोकोक्ति चक्रवृद्धि के आधुनिक सिद्धान्त का ही देशज रूप है, और जिस युवा के पास समय की पूँजी है, उसके लिये छोटी नियमित बचत भी कालान्तर में विशाल सम्पदा बन जाती है। तृतीय सूत्र है ऋण के प्रति सजगता। शास्त्रों में ऋण को शत्रु के समान त्याज्य कहा गया है; बिना विचारे लिया गया ऋण व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के लिये विनाश का द्वार खोलता है।
प्राचीन दृष्टि का नवीन संस्करण
स्वदेशी, ग्राम-स्वावलम्बन और स्थानीय उत्पादन की जो भावना कभी हमारे आर्थिक जीवन का प्राण थी, वही आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प में पुनर्जीवित हो रही है। अन्तरिक्ष प्रक्षेपण से लेकर डिजिटल भुगतान प्रणाली तक भारत ने विश्व को दिखा दिया है कि हम केवल उपभोक्ता नहीं, निर्माता और नवप्रवर्तक भी है। ग्राम्य अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योग, प्राकृतिक कृषि और स्वरोजगार को प्रोत्साहन देकर हम उसी आर्थिक स्वावलम्बन की ओर लौट रहे हैं जिसकी कल्पना हमारे मनीषियों ने सहस्राब्दियों पूर्व की थी।
भारतीय अर्थचिन्तन का सन्देश स्पष्ट है कि समृद्धि और संस्कार परस्पर विरोधी नहीं, परस्पर पूरक हैं। जो व्यक्ति और समाज धर्मपूर्वक अर्जन, विवेकपूर्वक व्यय और दूरदृष्टि से संचय करता है, वही चिरकाल तक समृद्ध रहता है। नयी पीढ़ी अर्थशास्त्र को केवल परीक्षा का विषय न मानकर जीवन-दृष्टि के रूप में अपनाये, जिसमें अर्थ का अर्जन भी हो, संयम भी हो और राष्ट्र-कल्याण की भावना भी। कौटिल्य से डिजिटल युग तक की यह यात्रा अधूरी नहीं, अनवरत है। आवश्यकता केवल अपनी जड़ों को पहचानकर उनसे रस ग्रहण करने की है।