भारतीय अर्थचिन्तन : कौटिल्य से डिजिटल तक

भारतीय अर्थचिन्तन : कौटिल्य से डिजिटल तक

भारतीय अर्थचिन्तन : कौटिल्य से डिजिटल तक ।। सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलं अर्थः ।। भारत को प्रायः केवल अध्यात्म और दर्शन की भूमि कहा जाता है, परन्तु यह अर्धसत्य है। भारत आर्थिक चिन्तन की भी उतनी ही समृद्ध भूमि रहा है। आज से लगभग दो सहस्र वर्ष पूर्व आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य (कौटिल्य) ने ‘अर्थशास्त्र’…

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इंटरनेट, एआई और सोशल मीडिया के मकड़जाल में फँसता समाज

इंटरनेट, एआई और सोशल मीडिया के मकड़जाल में फँसता समाज

इंटरनेट, एआई और सोशल मीडिया के मकड़जाल में फँसता समाज आज बिना इन्टरनेट और कृत्रिम बुद्धि के जीवन की कल्पना करना असम्भव है। इन दोनों ने मिलकर सामान्य जीवन को पहले की तुलना में सरल कर दिया है। पहले जिन कामों में घण्टों लगा करते थे, वे अब एक क्लिक में हो जाते हैं। दैनिक…

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पुस्तकालय की समाज में भूमिका

पुस्तकालय की समाज में भूमिका

पुस्तकालय की समाज में भूमिका आज का लोकतान्त्रक युग समतामूलक समाज की वकालत करता है जिसमे प्रत्येक मानव को अपने विकास एवं शिक्षा के लिये बिना किसी भेदभाव के समान अवसर प्रदान होना चाहिये तथा विभिन्य तरह की सूचनाओं का उपयोग मानवीय विकास के लिये बिना भेदभाव के होना चाहिये। पुस्तकालय द्वारा पुस्तकों एवं सूचनाओ…

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