
गन्ने से बनी ‘बायोडिग्रेडेबल’ पानी बोतल
प्लास्टिक आज हमारी जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है। बाजार से सामान लाने से लेकर पानी पीने तक, हर जगह प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ रहा है। प्लास्टिक की बोतलें नदियों, समुद्र, झीलों और बैकवॉटर में पहुँचकर लम्बे समय तक प्रदूषण फैलाती हैं। इनसे निकलने वाला कचरा आसानी से खत्म नहीं होता। ऐसे समय में केरल के तीन दोस्तों ने प्लास्टिक की इस समस्या का अलग तरीके से समाधान खोजने की कोशिश की है।
अश्विन, एलेन और बेसिल ने मिलकर ‘बकवा’ (Bakwa) नाम की पहल शुरू की है। इसका मकसद ऐसी पानी की बोतल उपलब्ध कराना है, जो इस्तेमाल के बाद पर्यावरण पर प्लास्टिक जैसा बोझ न डाले। खास बात यह है कि इन बोतलों को गन्ने और कॉर्नस्टार्च से तैयार किये गये बायोप्लास्टिक से बनाया जाता है।
समुद्र के बैकवॉटर में दिखा प्लास्टिक का ढेर
केरल अपने खूबसूरत बैकवॉटर और प्राकृतिक सुन्दरता के लिये जाना जाता है लेकिन इन खूबसूरत जगहों पर प्लास्टिक की बोतलों का बढ़ता कचरा इन दोस्तों के लिये चिन्ता का कारण बना। उन्हें जगह-जगह पानी की इस्तेमाल की गयी बोतलें दिखायी देती थीं। अश्विन, एलेन और बेसिल ने महसूस किया कि केवल प्लास्टिक प्रदूषण की शिकायत करने से समस्या खत्म नहीं होगी। इसके लिये कोई ऐसा विकल्प तैयार करना होगा, जिसका इस्तेमाल लोग आसानी से कर सकें और पर्यावरण को भी नुकसान न पहुँचे।
यहीं से ‘बकवा’ का विचार पैदा हुआ। तीनों दोस्तों ने प्लास्टिक की बोतल का ऐसा विकल्प तैयार करने पर काम शुरू किया, जो देखने और इस्तेमाल में सामान्य पानी की बोतल जैसा हो, लेकिन इसके बाद पर्यावरण के लिये परेशानी न बने।
गन्ने व कॉर्नस्टार्च से तैयार बनती बोतल
‘बकवा’ की बोतल देखने में सामान्य प्लास्टिक की बोतल जैसी ही नजर आती है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी सामग्री है। इसमें सामान्य पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन बोतलों को मुख्य रूप से गन्ने और कॉर्नस्टार्च से बने बायोप्लास्टिक से तैयार किया जाता है। यानी ऐसी वनस्पति आधारित सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जो पारम्परिक प्लास्टिक के मुकाबले पर्यावरण के लिये बेहतर विकल्प मानी जाती है। इसका उद्देश्य लोगों को पानी की बोतल उपलब्ध कराना, लेकिन उसके इस्तेमाल के बाद पैदा होने वाले कचरे को कम करना।
मिट्टी में मिल जाने का दावा
‘बकवा’ की सबसे खास बात इसका बायोडिग्रेडेबल होना है। टीम के अनुसार, इस्तेमाल के बाद ये बोतलें करीब 180 दिनों के भीतर प्राकृतिक रूप से मिट्टी में घुल-मिल जाती हैं। पारम्परिक प्लास्टिक की बोतलों के मुकाबले यह एक बड़ा अन्तर है। सामान्य प्लास्टिक लम्बे समय तक पर्यावरण में बना रह सकता है और धीरे-धीरे छोटे-छोटे कणों में टूटकर प्रदूषण का कारण बनता है।
इसके अलावा बोतल के सिर्फ मुख्य हिस्से को ही पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया है। इसके ढक्कन और लेबल को भी कम्पोस्टेबल रखने की कोशिश की गयी है। यानी बोतल के अलग-अलग हिस्सों से पैदा होने वाले कचरे को भी कम करने पर जोर दिया गया है।
गर्म व ठण्डे पेय के लिये इस्तेमाल
बोतल को सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर ही काम नहीं किया गया, बल्कि इसकी उपयोगिता का भी ध्यान रखा गया है। टीम के अनुसार, इन बोतलों का इस्तेमाल गर्म और ठण्डे दोनों तरह के तरल पदार्थों के लिये किया जा सकता है। इसकी वजह से इसे सामान्य पानी की बोतल के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ जाती है। यानी पर्यावरण बचाने के लिए लोगों को सुविधा से समझौता करने की जरूरत नहीं पड़ती।
‘बकवा’ की पहल का एक और दिलचस्प हिस्सा इसका बिजनेस मॉडल है। टीम ने ‘फ्री वॉटर प्रोजेक्ट’ शुरू किया है। इसके तहत लोगों को पानी की बोतलें मुफ्त में उपलब्ध करायी जाती हैं। अब सवाल उठता है कि अगर बोतल और पानी मुफ्त है तो इसका खर्च कैसे निकलता है? इसके लिये स्थानीय कम्पनियों और ब्राण्ड्स को बोतलों पर विज्ञापन देने का मौका दिया जाता है। कम्पनियाँ अपने विज्ञापन के लिये भुगतान करती हैं। इसी आय से बोतलों के निर्माण और पानी से जुड़ी लागत को पूरा करने की कोशिश की जाती है। इस तरह इस मॉडल में तीन लाभएक साथ नजर आते हैं। लोगों को मुफ्त पानी मिलता है, कम्पनियों को अपने ब्राण्ड का प्रचार करने का माध्यम है और पर्यावरण के लिये
प्लास्टिक की बोतलों का विकल्प तैयार होता है। ‘बकवा’ की शुरुआत भले ही तीन दोस्तों के विचार से हुई हो, लेकिन इसे लोगों तक पहुँचाने में तेजी आयी है। टीम के अनुसार, सिर्फ छह महीनों में 10 हजार से ज्यादा बोतलें वितरित की जा चुकी हैं। यह संख्या बताती है कि पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को लेकर लोगों में रुचि बढ़ रही है। अगर ऐसे विकल्प बड़े स्तर पर उपलब्ध हों और उनकी कीमत भी लोगों की पहुँच में रहे, तो प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने में मदद मिल सकती है।